West Bengal Election: पीरजादा ने बदला बंगाल का चुनावी समीकरण, कांग्रेस-लेफ्ट के साथ किया गठबंधन

Webvarta Desk: कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट (Congress Left United in West Bengal Election) ने मंगलवार को भारतीय सेक्युलर फ्रंट (ISF) के साथ चुनावी गठबंधन किया। अब तीनों पार्टियां मिलकर पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ेंगी। सेक्युलर फ्रंट, पिछले महीने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी (Pirzada Abbas Siddiqui) ने बनाई थी। पीरजादा, जो पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में फुरफुरा शरीफ के प्रभावशाली मौलवी माने जाते हैं।

माना जा रहा है कि कांग्रेस और लेफ्ट का पीरजादा (Pirzada Abbas Siddiqui) की पार्टी के साथ गठबंधन के बाद उन्हें सीटों पर बढ़त नजर आ रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-लेफ्ट को मात्र दो सीटें मिली थीं और उनका वोट प्रतिशत सिर्फ 12 था। पार्टियां को उम्मीद है कि उन्हें आईएसएफ के समर्थन से कम से कम वे सीटें वापस मिल जाएंगीं जो उन्होंने बीते कुछ वर्षों में खोई हैं।

AIMIM की सीटों से पड़ेगा प्रभाव

इस डील के बाद अब पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव (West Bengal Election) TMC, BJP और लेफ्ट-कांग्रेस-ISF गठबंधन के बीच त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है। हालांकि अभी यह देखा जाना बाकी है कि असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है और तृणमूल के मुस्लिम वोटों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।

ममता को रहा है मुसलमानों का भारी समर्थन

खासकर, 2011 से, जब से टीएमसी सत्ता में है, तब से उसे दक्षिण बंगाल में भारी मुस्लिम समर्थन मिलता रहा है। धार्मिक नेताओं और प्रभावशाली मौलवियों ने मुस्लिम मतदाताओं से ममता बनर्जी की सरकार का समर्थन करने की अपील की और ममता बनर्जी को समर्थन मिला भी। मुस्लिम बहुल इलाके मालदा, मुर्शिदाबाद, और उत्तर बंगाल में उत्तर दिनाजपुर, हालांकि, बड़े पैमाने पर कांग्रेस का गढ़ रहे हैं।

तीन-स्तरीय होगा मुकाबला

अब्बास सिद्दीकी की ISF संभावित रूप से बंगाली भाषी मुस्लिम वोटों को बिना AIMIM के समर्थन से, TMC, कांग्रेस-लेफ्ट के बीच तीन तरीकों से विभाजित कर सकती थी। अब जबकि ISF ने कांग्रेस-वाम के साथ गठबंधन कर लिया है, ऐसे में TMC के अब संभावित रूप से कम मुस्लिम वोट मिल सकते हैं।

AIMIM को माना जाता है वोट कटवा

पिछले साल के बिहार विधानसभा चुनावों में AIMIM को पांच सीटें मिली थीं। उनके इस प्रदर्शन को वोट कटर के रूप में देखा गया और दावा किया गया कि इससे बीजेपी को फायदा मिला। बंगाल चुनाव लड़ने के उनके फैसले के बाद यह चर्चा शुरू हो गई कि उनकी पार्टी टीएमसी का वोट काटकर उसके लिए बड़ी चुनौती खड़ी करेगा और इससे बीजेपी को फायदा मिलेगा।

पीरजादा ने ओवैसी की किया दरकिनार

यह महसूस करते हुए कि बंगाल में पर्याप्त हिंदी भाषी मुसलमान नहीं हैं, हालांकि, ओवैसी ने अपने दम पर चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया और इसके अब्बास सिद्दीकी का समर्थन किया। लेकिन मौलवी ने अपनी पार्टी बनाने का फैसला किया, और कांग्रेस-लेफ्ट तक पहुंच गए। कांग्रेस-लेफ्ट ने पीरजादा से यह शर्त रखी कि वह ओवैसी के साथ संबंध तोड़ लें।

विरोधी लहर

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार भाजपा को ममता सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी की सबसे बड़े दल के रूप में देखा जाता है। राज्य की राजनीति में तीसरे ध्रुव का मजबूत होना सत्ता-विरोधी वोट के विभाजन की संभावना को दर्शाता है। कांग्रेस-लेफ्ट-आईएसएफ गठबंधन ने टीएमसी और भाजपा दोनों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बनाने का आरोप लगाया है, और खुद को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मोर्चे के रूप में पेश करने की मांग की है ताकि आम आदमी को चिंता के मुद्दों को उजागर किया जा सके।