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Sunday, December 4, 2022

Morbi bridge tragedy: मोरबी नगर पालिका ने चेतावनी के बाद भी नहीं दिया ध्यान, सभी पुलों की जांच के आदेश, कोर्ट ने कहा- मुआवजा बहुत कम

अहमदाबाद: गुजरात के मोरबी केबल पुल हादसे पर सुनवाई करते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने प्रदेश सरकार को सभी पुलों का सर्वेक्षण कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रदेश सरकार यह सुनिश्चित करे कि राज्य में कितने पुल ठीक स्थिति में है। हाई कोर्ट ऐसी सभी पुलों की लिस्ट चाहता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिपोर्ट प्रमाणित होनी चाहिए। इसके अलावा कोर्ट ने हादसे में जान गंवाने और घायलों को और मुआवजा देने की भी बात की। कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की राशि बढ़नी चाहिए। घायलों के लिए 50,000 रुपए बहुत कम है। हाई कोर्ट यह भी कहा कि मोरबी नगर पालिका ने मोरबी ब्रिज की गंभीर स्थिति के बारे में निजी ठेकेदार (एम/एस अजंता) की चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति आशुतोष जे. शास्त्री की पीठ ने आगे कहा कि टिकटों की कीमतों पर ज्यादा ध्यान दिया गया। पुल की स्थिति ठीक नहीं थी। नगर पालिका ने इसके संकेत भी दिए थे। मच्छू नदी पर एक सदी से भी पहले बना मोरबी पुल जिसे झूलता पुल के नाम से जाना जाता है, 30 अक्टूबर को टूट गया जिसकी वजह से 130 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और कई गंभीर रूप से घायल हो गये।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट ने पाया कि अनाथ हो गए लोगों के लिए 3,000 रुपए प्रति माह कुछ भी नहीं है और कहा कि इस राशि से ड्रेस और किताबों की लागत भी नहीं निकल पाएएगी। अदालत ने कहा 3,000 रुपए प्रति माह अत्यधिक कम है। अदालत ने यह भी कहा कि भुगतान किया गया मुआवजा संतोषजनक नहीं है और राज्य सरकार को कम से कम मुआवजे को दोगुना करना चाहिए या कम से कम 10 लाख रुपये देना चाहिए। राज्य सरकार को उन लोगों का पूरा विवरण प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था जो दुर्घटना के पीड़ितों पर निर्भर थे। अदालत ने अब राज्य सरकार से एक विस्तृत हलफनामा दायर करने और दुर्घटना से प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देने के लिए एक नीति बनाने को कहा है। मृतकों की जारी सूची में पीड़िताओं की जाति के उल्लेख पर भी आपत्ति जताई।

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21 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट से समय-समय पर मोरबी पुल ढहने की जांच की निगरानी करने और यह भी पूछा कि क्या पीड़ितों के परिवार को गरिमापूर्ण मुआवजा दिया गया था। शीर्ष अदालत की एक खंडपीठ ने मौखिक रूप से कहा था कि यह एक बहुत बड़ी त्रासदी है और इसके लिए साप्ताहिक निगरानी की आवश्यकता होगी। हाईकोर्ट ने कार्यभार संभाल लिया है, वरना हम नोटिस जारी कर देते। पीठ ने कहा कि गुजरात उच्च न्यायालय निश्चित रूप से यह सुनिश्चित करेगा कि एक उचित नियामक तंत्र स्थापित किया जाए ताकि ऐसी घटनाएं फिर से ना हों।

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