Chhattisgarh News : हसदेव में कोल परियोजनाओं का विरोध, 30 गांवों के ग्रामीण हुए एकजुट, 350 लोग कर रहे पदयात्रा

हाइलाइट्स

  • हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोल परियोजनाओं का विरोध
  • कोरबा और सरगुजा जिले के 30 गांवों के ग्रामीण कर रहे विरोध
  • रायपुर में विरोध जताने के लिए 300 किमी की पदयात्रा कर रहे
  • 13 अक्टूबर को रायपुर में राज्यपाल और सीएम के सामने रखेंगे अपनी बात

रायपुर
कोयला खनन परियोजनाओं (Coal Projects In Chhattisgarh) के विरोध में छत्तीसगढ़ के सरगुजा और कोरबा जिले के 30 गांवों के 350 ग्रामीण पैदल मार्च कर रहे हैं। राजधानी रायपुर में पहुंचकर विरोध जताने के लिए ये लोग नौ दिन से पैदल चल रहे हैं। इनका आरोप है कि कोल परियोजनाओं के लिए अवैध रूप से भूमि का अधिग्रहण हो रहा है। आदिवासियों ने इसका नाम हसदेव बचाओ पदयात्रा दिया है। रायपुर पहुंचकर ये लोग विरोध जताएंगे।

पैदल मार्च में शामिल एक महिला शकुंतला एक्का ने एक अंग्रेजी अखबार से बात करते हुए कहा कि अगर हम नहीं चलेंगे, तो हमारे बच्चों को रहने के लिए घर नहीं बचेगा। सरगुजा जिले के अंबिकापुर में फतेहपुर से यह मार्च तीन अक्टूबर को शुरू हुआ है। 13 अक्टूबर को खत्म होने की उम्मीद है। रायपुर में प्रदर्शनकारी राज्यपाल अनुसुइया उइके और सीएम भूपेश बघेल से मुलाकात करेंगे और अपनी मांगों को रखेंगे।

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ग्रामीण हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही और प्रस्तावित कोयला खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, जिसके बारे में उनका कहना है कि इससे राज्य के वन पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा है। यह क्षेत्र जैव विविधता में समृद्ध है और हसदेव और मांड नदियों के लिए जलग्रहण क्षेत्र है, जो राज्य के उत्तरी और मध्य मैदानी इलाकों की सिंचाई करते हैं।

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हसदेव अरण्य बचाओं संघर्ष समिति के अनुसार, दो जिलों के प्रदर्शनकारियों का एक संयुक्त मंच है, इनके विरोध के बावजूद इस क्षेत्र में छह कोल ब्लॉक आवंटित किए गए हैं। इनमें से दो में खनन चालू हो गया है। परसा पूर्व और केटे बसन ब्लॉक और चोटिया के ब्लॉक 1-2 है। इसके साथ ही परसा के दूसरे कोल ब्लॉक को पर्यावरण मंत्रालय से क्लियरेंस मिल गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण का काम बिना ग्राम सभा की अनुमति की गई है। साथ ही भूमि अधिग्रहण का काम भी जारी है। संघर्ष समिति के प्रमुख सदस्य उमेश्वर सिंह आर्मो ने आरोप लगाया है कि परसा में पर्यावरण मंजूरी के लिए जाली दस्तावेज का प्रयोग किया गया है। साथ ही मंत्रालय को गलत जानकारी दी गई है।

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केंद्र सरकार की तरफ से 24 दिसंबर, 2020 को कोयला असर क्षेत्र अधिनियम, 1957 की धारा 7 के तहत एक अधिसूचना जारी की थी, जिसमें क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों को अधिकारों पर आपत्तियां, यदि कोई हो, प्रस्तुत करने के लिए 30 दिन की अवधि दी गई थी। आठ फरवरी को केंद्रीय कोयला मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि मंत्रालय को 470 से अधिक आपत्ति पत्र मिले हैं, जिनमें राज्य सरकार के पत्र भी शामिल हैं। जोशी ने कहा कि 1957 के कानून के तहत, ग्राम सभा से किसी भी सहमति के संबंध में कोई प्रावधान नहीं है।

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उन्होंने कहा था कि भूमि अधिग्रहण, पनुर्वास और पुनर्वास अधिनियम, 2013 में उचित मुआवजा और पारदर्शिता के अधिकार और छत्तीसगढ़ आदर्श पुनर्वास नीति 2007 के नियमों के तहत वैध मुआवजे का भुगतान किया जाएगा।

वहीं, संघर्ष समिति में शामिल आर्मो ने कहा कि मुआवजा पर्याप्त नहीं है। पैसा और हमारी मातृभूमि समान नहीं हैं। कोई भी राशि अंतत: समाप्त हो जाती है, लेकिन हमारे घर यहां वर्षों से हैं।