‘चुनावी फायदे के लिए बटला हाउस एनकाउंटर को बताया था फर्जी’, करनैल सिंह बोले- हम सही साबित हुए

Webvarta Desk: 2008 से ही विवादों में रहे बटला हाउस एनकाउंटर (Batla House Encounter) को 13 साल बीत गए। कोर्ट ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए आरिज खान उर्फ जुनैद को दोषी करार दिया।

‘बटला हाउस एनकाउंटर’ (Batla House Encounter) किताब में कई राज खोलने वाले ईडी के पूर्व डायरेक्टर और इस एनकाउंटर के दौरान जॉइंट कमिश्नर रहे करनैल सिंह (Karnail Singh) ने बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि बेशक कुछ लोगों ने अपनी दिमागी उपज से एनकाउंटर पर जानबूझकर सवाल खड़े किए थे। मगर, कोर्ट का फैसला फैक्ट्स पर आधारित है। पुख्ता प्रमाण थे, ठोस जांच थी।

करनैल सिंह (Karnail Singh) ने कहा कि एनकाउंटर (Batla House Encounter) में दो लोग मौके से भागे थे। एक शहजाद और दूसरा आरिज। इन्होंने पुलिस टीम पर फायरिंग भी की थी, जिसमें हमारे जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद शहीद हुए थे। एक हेड कॉन्स्टेबल बलवंत को हाथ में फ्रैक्चर हुआ था।

आरिज को 2018 में नेपाल बॉर्डर से पकड़ा गया था, जिसका दोष साबित हुआ है। इससे पता चलता है कि स्पेशल सेल की कार्रवाई एकदम सही दिशा में थी जिसमें तब के एसीपी संजीव यादव, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा व पूरी टीम ने बहुत ही मेहनत से इनपुट जुटाकर एक्शन लिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) को लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया। यह इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि ठोस जांच की बदौलत और उसके आधार पर ही कोर्ट का फैसला सामने आया है।

चुनाव पास थे, इसलिए कहा ‘फर्जी’

सिंह के मुताबिक, चूंकि घटना के वक्त विधानसभा और लोकसभा के चुनाव नजदीक थे। ऐसे में कुछ राजनेताओं ने पूरे एनकाउंटर को राजनीति से जोड़ने की कोशिश की थी। बयानबाजी कर बिना तथ्यों के आधार पर एनकाउंटर पर सवाल खड़े करने लगे। उस समय ऐसी बयानबाजी से स्पेशल सेल के खिलाफ माहौल पैदा कर दिया गया था। लेकिन बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की इन्क्वायरी हुई। यह मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी गया। कोर्ट ने भी यही माना कि एनकाउंटर असली है। इसके बावजूद कुछ लोग एनकाउंटर को फर्जी बोलते रहे।

उन्होंने कहा- मेरे साथ-साथ बहुतों को दुख पहुंचा, क्योंकि एनकाउंटर में एक तो हमारे इंस्पेक्टर शहीद हुए, दूसरी तरफ ऐसी राजनीतिक बयानबाजी। आप रेकॉर्ड चेक कीजिए कि उस एनकाउंटर के बाद देश में कहीं भी इंडियन मुजाहिदीन ब्लास्ट जैसी आतंकी घटना को अंजाम नहीं दे पाया। इससे साबित होता है कि स्पेशल सेल ने बड़ा कैच किया था। लेकिन आतंक के खिलाफ काम करने वाली एजेंसियों को लंबे समय तक बेवजह बनाया गया माहौल झेलना पड़ा।

दो दिशा में हुई मुठभेड़ की जांच

दरअसल, इस केस में दो दिशा में जांच हुई। एक, एनकाउंटर को लेकर। दूसरी, आतंकवाद को लेकर। एनकाउंटर की जांच क्राइम ब्रांच ने बहुत ही वैज्ञानिक सबूतों के साथ की। आज का आदेश क्राइम ब्रांच की इनवेस्टिगेशन पर आधारित है। दूसरी जांच आईएम ने जो बम विस्फोट अहमदाबाद, जयपुर, बेंगलुरु, दिल्ली, यूपी में किए उसे लेकर हुई।

उसमें से अभी तक दो केस में जजमेंट फाइनल हुआ है। जबकि 2008 से अब तक 13 साल हो गए। इस जांच में कमी यह है कि जिन अलग-अलग जगहों पर ब्लास्ट हुए, वहां की अदालतों में ट्रायल चल रहा है। जबकि सभी में आरोपी लगभग कॉमन हैं। इस पूरे प्रोसेस में ट्रायल लेट हो जाता है। जबकि इसका सेंट्रलाइज्ड ट्रायल होना चाहिए था जिससे त्वरित फैसला आता।