मेजर ध्यानचंद के नाम पर होगा खेल रत्न का नाम, जानें इस महान खिलाड़ी के बारे में सब कुछ

मेजर ध्यानचंद के नाम पर होगा खेल रत्न का नाम, जानें इस महान खिलाड़ी के बारे में सब कुछ

तोक्यो
भारत की पुरुष और महिला हॉकी टीम ने तोक्यो ओलिंपिक में कमाल का खेल दिखाया। पुरुष टीम ने जहां 41 साल बाद ओलिंपिक में मेडल जीता वहीं महिला टीम ने ब्रॉन्ज मेडल मैच तक जगह बनाई। ऐसे मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘राजीव गांधी खेल रत्न’ का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर कर दिया है। ‘हॉकी का जादूगर’ कहे जाने वाले ध्यानचंद ने अपने खेल से दुनियाभर को हैरान किया।

अपनी हॉकी की कलाकारी से उन्होंने दुनियाभर को हैरान किया। गेंद उनकी स्टिक पर आती तो ‘चिपक’ सी जाती। ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को प्रयागराज (तब के इलाहाबाद) में श्रद्धा सिंह और समेश्वर सिंह के यहां हुआ था। ध्यानचंद ब्रिटिश आर्मी में सैनिक थे और हॉकी में उनका रुझान बचपन से ही था। 16 साल की उम्र में वह ब्रिटिश सेना से जुड़ गए थे।

1922 से 1926 के बीच वह कई रेजिमेंट गेम्स और हॉकी टूर्नमेंट में खेलते रहे। इससे उनके खेल के हुनर में सुधार आता गया। उन्हें हॉकी से इतना प्यार था कि वह रात को ड्यूटी खत्म करने के बाद भी इसे खेला करते। इसी वजह से उनके नाम के आगे चंद (चांद) जुड़ गया।

1926 में भारतीय सेना ने न्यूजीलैंड का दौरा किया। भारतीय टीम ने न्यूजीलैंड को करारी मात दी। उन्होंने वहां 18 मैच जीते, दो ड्रॉ हुए और एक ही मैच हारा। इस दौरे के बाद ध्यानचंद को काफी सराहना मिली। इसके बाद उन्हें ब्रिटिश इंडियन आर्मी में लांस नाइक बना दिया गया।

इसके बाद वह 1928 के एम्सटरडम ओलिंपिक में भारतीय टीम के साथ गए। हॉकी ओलिंपिक में पहली बार शामिल किया गया था। भारतीय हॉकी फेडरेशन इस खेल के लिए अपनी बेस्ट टीम भेजना चाहता था। ओलिंपिक की टीम चुनने के लिए राज्यों के बीच मुकाबले करवाए गए। पंजाब, बंगाल, राजपूताना और यूनाइटेड प्रोविंस (यूपी) और सेंटर प्रोविंस ने इसमें भाग लिया। आर्मी की टीम क्योंकि इसमें नहीं खेल रही थी इसलिए ध्यानचंद को यूपी के लिए खेलने की इजाजत दी गई। उन्होंने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और अपने खेल से सिलेक्टर्स को काफी परेशान किया।

ओलिंपिक में सिलेक्शन तो हो गया। अब सवाल था एमस्टरडम पहुंचने का। इसके लिए बहुत आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा। भारतीय हॉकी टीम हालांकि शानदार फॉर्म में थी और उसने वहां कमाल की हॉकी खेली।

ध्यानचंद ने कमाल का प्रदर्शन किया और 5 मैचों में 14 गोल किए। भारत ने पहली बार में गोल्ड मेडल जीता। ध्यानचंद ने इसके बाद अपने खेल को और ऊंचाइयों तक पहुंचाया। 1932 के लॉस एजेंलिस ओलिंपिक में भारत ने फिर एक बार गोल्ड मेडल जीता। यह ओलिंपिक थोड़ा खास था। ध्यानचंद के भाई रूप सिंह भी उनके साथ थे। उन्होंने अमेरिका के खिलाफ मुकाबले में 10 गोल किए। भारत ने यह मैच 24-1 से जीता था। इस बार भी गोल्ड मेडल भारत के पास आया।

फिर आया 1936 का साल
पिछले दो ओलिंपिक में ध्यानचंद खिलाड़ी के तौर पर थे। लेकिन 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में ध्यानचंद टीम के कप्तान थे। उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। भारतीय टीम ने टूर्नमेंट में कुल 38 गोल किए जबकि उसके खिलाफ सिर्फ एक गोल हुआ वह भी फाइनल में। लेकिन मैच भारत के नाम रहा और गोल्ड मेडल भी।

हिटलर से सामना
15 अगस्त 1936 को भारतीय टीम जर्मनी के खिलाफ फाइनल मैच खेल रही थी। हालांकि फाइनल से पहले भारतीय कैंप में उत्साह का नहीं बल्कि डर और चिंता का माहौल था। इसकी वजह जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर था। हिटलर 40 हजार दर्शकों के साथ यह मैच देखने आने वाला था।

भारतीय हॉकी टीम के पू्र्व कोच सैयद अली सिबतैन नकवी ने बताया था, ‘यह दादा ध्यान चंद थे, जिन्होंने 1936 के ओलिंपिक फाइनल में 6 गोल किए और भारत ने मैच 8-1 से जीता। हिटलर ने दादा को सैल्यू किया और उन्हें जर्मन सेना जॉइन करने का ऑफर दिया।’

नकवी ने बताया था, ‘पुरस्कार वितरण के मौके पर दादा कुछ नहीं बोले। पूरे स्टेडियम में सन्नाटा था। सब इस बात को लेकर डर रहे थे कि अगर ध्यान चंद ने ऑफर ठुकरा दिया तो तानाशाह उन्हें गोली मार सकता है। दादा ने मुझे बताया था कि उन्होंने हिटलर को भारतीय सैनिक की तरह एक बुलंद आवाज में जवाब दिया था ‘भारत बिकाऊ नहीं है।’

स्टेडियम में मौजूद 40 हजार दर्शक उस समय हैरान रह गए जब हिटलर ने उनसे हाथ मिलाने के बजाय सैल्यूट किया। हिटलर ने ध्यान चंद से कहा, ‘जर्मन राष्ट्र आपको अपने देश भारत और राष्ट्रवाद के लिए सैल्यूट करता है। हिटलर ने ही उन्हें हॉकी का जादूगर का टाइटल दिया था। ऐसे खिलाड़ी सदियों में एक बार पैदा होते हैं।’

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार
बर्लिन से लौटने के बाद ध्यानचंद ने खुद को रेजिमेंट हॉकी तक सीमित कर लिया। हालांकि उसके बाद भी काफी समय तक भारतीय हॉकी का वर्चस्व कायम रहा। 1956 में वह सेना से रिटायर हो गए। उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1979 में 74 साल की उम्र में उनका निधन हुआ।

देश में 29 अगस्त यानी ध्यानचंद के जन्मदिन के अवसर पर राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है। और इसी दिन खेल पुरस्कार दिए जाते हैं।