सीएम बदलने की परंपरा को फिर मिली हवा!

सीएम

-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट-

उत्तराखंड में राजनीतिक घटनाक्रम कब बदल जाए कहा नही जा सकता। सरकार की अकर्मण्यता व विधायको की नाराजगी सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को ले बैठी।वे इस्तीफा देने राजभवन पहुंच गए हैं। कल रात तक वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात के बाद से त्रिवेंद्र सिंह रावत डैमेज कंट्रोल में जुटे रहे।लेकिन विरोधियों को संतुष्ट नही कर पाए। जिसकारण उन्हें निराश होकर दिल्ली से देहरादून लौटना पड़ा।

जौलीग्रांट एयरपोर्ट पहुंचने पर उन्होंने किसी से बात नहीं की। चुपचाप निकल लिए। चर्चा है कि उनके इस्तीफा देने के बाद नए सीएम की घोषणा भाजपा की औपचारिक बैठक में होगी। सीएम के लिए भी अब चौंकाने वाला नाम सामने आ रहा है। तभी तो सीएम की दौड़ में शामिल एक वरिष्ठ भाजपा नेता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के फोन के बाद चुप बैठ गए । जौलीग्रांट एयरपोर्ट पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के स्वागत के लिए गिनती के कार्यकर्ता तो पहुंचे, लेकिन एक भी विधायक नहीं पहुंचा।

दिल्ली में उत्तराखंड भाजपा के प्रवक्ता एवं विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने दावा किया कि किसी भी भाजपा नेता की सीएम को लेकर नाराजगी नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ हैं।लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वे सीएम बने रहेंगे तो उनका कहना था कि इस बारे में कुछ नहीं कह सकता हूं। यह फैसला पार्लियामेंट्री बोर्ड का होता है। पांच राज्यों में चुनाव के चलते भाजपा फूंक फूंक कर कदम रख रही है। यदि सीएम बदले जाते हैं तो उसका ये संदेश न चला जाए कि विधायकों में विद्रोह के चलते ऐसा किया गया है।

ऐसे में एक रास्ता यह नजर आ रहा है कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम की जिम्मेदारी से मुक्त कर पार्टी संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी जाए और किसी दूसरे को सीएम बनाया जाए। ताकी मुख्यमंत्री बदलने पर भाजपा की बदनामी न हो। छह मार्च को ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण में विधानसभा का बजट सत्र चल रहा था। उसी दौरान अचानक सीएम सहित अन्य विधायकों को देहरादून पहुंचने का फरमान जारी हुआ था। इस बैठक के चलते विधानसभा का बजट सत्र भी बीच में छोड़कर सीएम सहित कोर कमेटी के सदस्य और विधायक देहरादून कूच कर गए थे।

असम चुनाव के लिए लिस्ट फाइनल होते ही भाजपा के पार्लियामेंट्री बोर्ड ने पर्यवेक्षक के रूप में वरिष्ठ भाजपा नेता व छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को उत्तराखंड भेजा था। उन्होंने कोर ग्रुप की बैठक भी ली थी। इस बैठक में भाजपा के प्रदेश प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम भी मौजूद रहे। बाद में ये दोनों नेता पार्टी व सरकार की फीडबैक लेकर दिल्ली रवाना हो गए थे। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक को यूपी के विमान से देहरादून आना पड़ा, लेकिन वे देर से देहरादून पहुंच पाए थे। जिसकारण बैठक में शामिल नहीं हो सके थे । उन्होंने जौलीग्रांट एयरपोर्ट में पर्यवेक्षक और प्रदेश प्रभारी से बातचीत की।

भाजपा के महामंत्री संगठन अजय को भी कोलकाता से विशेष विमान से देहरादून बुलाया गया था। इससे संकेत मिल रहे थे कि कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है।तभी तो दिल्ली में उत्तराखंड का सीएम बदलने की चर्चाओं के बीच सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत विधायक मुन्ना सिंह चौहान, कुछ विधायकों और महापौर सुनील उनियाल गामा के साथ दिल्ली गए थे। ये नेता भाजपा के आला नेताओं मिलने का दिन भर प्रयास कर रहे थे। देर शाम रात उनकी गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात हो पाई। इसके बाद वे बगैर किसी सुरक्षा के एक कार से सांसद अनिल बलूनी से मिलने गए। दोनों में करीब आधे घंटे तक बात हुई। इसके बाद सीएम ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मुलाकात की।

मुख्यमंत्री रात में ही डैमेज कंट्रोल के लिए पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता विजय बहुगुणा से फोन पर बात की। इसके बाद पूर्व सीएम बहुगुणा का पुत्र सौरभ बहुगुणा सीएम त्रिवेंद्र से मिला। रात को ही सीएम त्रिवेंद्र की विधायक पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात हुई। लेकिन बात न बनने पर सीएम को राजभवन के लिए कूच करना पड़ा।

डैमेज कंट्रोल के लिए भाजपा ने 12 से 14 मार्च तक चिंतन शिविर आयोजित करने की योजना भी बनाई थी।लेकिन उससे पहले ही रायता बिखर गया। मुख्यमंत्री सात मार्च को चमोली जिले के गैरसैंण में पहुंचे थे। वहां उनका सोमवार आठ मार्च को भी कार्यक्रम था। लेकिन वे वहां से दो घंटे के बाद ही देहरादून को रवाना हो गए थे। महिला दिवस के मौके पर भी सीएम के गैरसैंण में कार्यक्रम तय थे। देहरादून लौटने के बाद वे रात भर फाइल निपटाते रहे। मंगलवार तड़के ही करीब तीन बजे वह सोने गए और फिर सुबह साढ़े दस बजे दिल्ली के लिए निकल गए। दिल्ली में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि उनका दिल्ली दौरा सामान्य दौरा है।

उन्हें आला कमान से कुछ मुद्दों पर बात करनी है।किसी भी दल के पर्यवेक्षक का काम नेता चुनने में मदद करना होता है। जब कोई नेता बदलना होता है, या फिर पार्टी संगठन में कोई संकट आता है, तभी पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाता है। ऐसे में अचानक पर्यवेक्षक भेजना और विधानसभा सत्र को छोड़कर बीच में ही बैठक करना बदलाव की चर्चाओं को जन्म दे गया ।चर्चा के मुताबिक भाजपा के करीब 22 विधायक विद्रोह की स्थिति में हैं। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से बगावत करने वाले पूर्व कांग्रेसी व वर्तमान भाजपा विधायक भी शामिल हैं।विदित हो सीएम त्रिवेंद्र रावत के खिलाफ हाईकोर्ट के सीबीआइ जांच के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में स्टे है। इस पर दस मार्च को सुनवाई होनी है। ऐसे में भाजपा हाई कमान आगामी चुनाव को देखते हुए कोई रिस्क नहीं लेना चाहती ।

विद्रोही विधायकों का आरोप है कि सीएम उन्हें तव्वजो नहीं देते । भाजपा विधायक कई बार विधानसभा सत्र में भी सरकार के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं।

गैरसैंण मंडल बनाने से भी है नाराजगी है।इस मंडल में में चमोली, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा और बागेश्वर जिले को शामिल किया जा रहा है। इससे अभी तक गढ़वाल और कुमाऊं की अलग-अलग राजनीति करने वाले नेताओं का दायरा कम होने की संभावना है। विरोध करने वालों का कहना है कि बोली व सस्कृति के आधार पर गढ़वाल और कुमाऊं मंडल थे। दोनों मंडल के दो दो जिले आपस में मिलने से उनकी पहचान खत्म हो जाएगी। साथ ही अल्मोड़ा जिला सबसे पुराना शहर है। इसकी अपनी संस्कृति व पहचान है जिसे बड़ा खतरा हो सकता है।

भाजपा में मुख्यमंत्री बदलने की परंपरा उत्तराखंड के गठन से बाद से ही रही है। पहले नित्यानंद स्वामी को हटाकर उनके स्थान पर भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया था। फिर मेजर जनरल (अ.प्रा.) भुवन चंद्र खंडूड़ी के को हटाकर रमेश पोखरियाल निशंक को सीएम बनाया गया। इसके बाद का चुनाव खंडूड़ी के नाम पर लड़ा गया। इसी तरह अब त्रिवेंद्र सिंह रावत को सीएम बने चार साल पूरे हो गए हैं।उन्हें बदलने की बार बार चर्चा चर्चा होती रही। लेकिन हर बार त्रिवेंद्र विरोधियों को मात देने में कामयाब होते रहे हैं।

अभी यह तय नहीं है कि उत्तराखंड में नए मुख्यमंत्री के रूप में कौन शपथ लेगा।इसके लिए कई नाम सामने आ रहे हैं। इनमें पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज, राज्यसभा सदस्य अनिल बलूनी, सांसद अजय भट्ट व राज्यमंत्री धन सिंह रावत के नाम शामिल हैं।भाजपा आला कमान किसके सिर पर ताज रखता है। या फिर त्रिवेंद्र ही सीएम रहते हैं।यह वक्त ही बताएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की डांट के बाद एक नेता सीएम की दौड़ से बाहर हो गए और उनके समर्थकों ने भी चुप्पी साध ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उक्त नेता को फोन पर कड़ी फटकार लगाई। इसके बाद उक्त नेता के समर्थकों ने चुप्पी साध ली।