असली कवि कभी सरकार का चापलूस नहीं हो सकता : अंजुम रहबर

Anjum Rahbar

भारत जैसे देश में अपने दर्द, भाव, एहसास को छलकाने के लिए कविताओं या शेरो-शायरी का प्रयोग बडे स्तर पर किया जाता है। हिन्दी के साथ जब उर्दू की जुंबा का ताममेल होता है तो सुनने व सुनाने वालों को मजा आ जाता है। राजनीति व आशिकी के ऊपर तमाम कवियों ने लाखों कविताएं बोली व लिखी है लेकिन इस कवित्रि ने महिलाओं के लिए हर उस पहलू को मध्यनजर रखते हुए कविता पढ़ी जहां कभी कोई जिक्र ही नही करता। अपनी भारी आवाज से दुनिया तो दीवाना बनाने वाली अंजुम रहबर से योगेश कुमार सोनी की एक्सक्लूसिव बातचीत के मुख्य अंश…

आपकी कविता में महिलाओं को ही प्राथमिकता दी जाती है। कोई विशेष कारण?

मेरी कविताएं क्या, पूरी दुनिया ही महिलाओं को प्राथमिकता देती है। और बात रही मेरी कविताओं की तो मैं स्वयं महिला होकर यदि उनके एहसास को नही बता पाई तो क्या फायदा। दरअसल एशियाई देशों में आज भी औरतों की स्थिति दयनीय है। हम महिला सशक्तिकरण की चर्चा बहुत जोरो शोरों से करते हैं लेकिन धरातल पर सब शून्य लगता है। रेप के आकडों से यह तय होता है कि महिलाएं आज भी सुरक्षित नही हैं। बाकी मैं हर बात का एससास कराना चाहती हूं जो सच व सही है।

आप हिन्दुस्तान के अलावा अन्य तमाम देशों में भी कविताएं पढ़ती हैं। क्या आपको यहां की तरह बाहर के लोग भी प्यार देते हैं?

मुहब्बत और दर्द की जुंबा समझने वाले पूरी दुनिया में मिल जाते हैं। भाषा, रंग, जाति व धर्म अलग होता है लेकिन भावनाओं को समझने के लिए हर इसांन का दिल एक जैसा होता है। मैं अमेरिका, पाकिस्तान, दुबई, औरम, कतर के अलावा तमाम देशों में जाती हूं और आवाम का भरपूर प्यार मिलता है। मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों तक अपनी बात पहुंचा पाउं।

आज के दौर में कविताओं में राजनीति रंग चढने लगा है। कुछ कवियों की कविताओं में स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है कि वह राजनितीक दलों का पक्ष लेने लगे हैं। इस विषय में आपका क्या मानना है?

मैं उस कवि को कवि नही मानती जो किसी भी घटना को बेचे। कवि या पत्रकार वो ही जो सरकार की कमियों को अपने माध्यम से बताए लेकिन आज के दौर में सब विपरित होने लगा है। आज हम देखते हैं कि एक घटना के रुप बताए जाते हैं। कोई उसका सकारात्मक रुप दिखाने में लगा है तो कोई नकारात्मक रुप। आवाम यह समझ ही नही पा रही की सही और सच क्या है। किसी भी कवि यह फर्ज व धर्म होता है कि वह अपनी कविता या शेरो-शायरी वह संदेश दें जिससे समाज का भला हो।

आपकी सबसे मशहूर कविता ‘होठों की भी क्या मजबूरी रहती है, सब कुछ कहकर बात अधूरी रहती है’। हर किसी ने इस कविता का अर्थ अपने अपने मुताबिक समझ लिया। यह क्या दर्शाती है आप ही बता दीजिए।

कुछ बात ऐसी होती है जिसको हम बिना कहे समझ जाते हैं और कुछ बात ऐसी होती है कहकर भी नही समझ पाते। लेकिन मुह से निकली हर बात का अर्थ होता है और कुछ समझकर भी अनजान बन जाते हैं। इसके अलावा कुछ लोग दूसरों पर बहुत आसानी से आरोप लगा देते हैं और भाषण देने लगते हैं लेकिन वो कभी अपने गिरेबां में झाककर नही देखते।

युवा कवियों व पाठकों के लिए कोई संदेश?

दुनिया बहुत बडे परिवर्तन की ओर जा रही है और इसके सबसे बडे गवाह व साक्षी हम हैं। अपने समय और बुजुर्गों की कीमत जरुर समझो क्योंकि दोनों ही आपके गुरु हैं। तरक्की करना अपराध नही हैं लेकिन तरक्की के चलते रिश्तों को छोड देना जरुर अपराध है। ईमानदारी के पथ पर चलें व सही को सही और गलत को गलत कहने की हिम्मत रखें। जो डटा नही वो लडा नही वो लडा नही और जो लडा नही वो जीतता नही। इसलिए किसी भी काम करने से पहले हार नही माननी चाहिए।