manufacturing hub

मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की डगर

-डा. जयंतीलाल भंडारी-

हाल ही में अमरीका के विख्यात संगठन एडवोकेसी ग्रुप सहित कई वैश्विक संगठनों के द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया है कि कई देशों की एक हजार से अधिक दिग्गज कंपनियां चीन से अपना निवेश समेटकर और उत्पादन बंद कर भारत आकर मैन्युफैक्चरिंग करना चाहती हैं। खासतौर से जापान, अमरीका, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन की कई कंपनियां भारत को प्राथमिकता देते हुए दिखाई दे रही हैं। ये चारों देश भारत के टॉप-12 ट्रेडिंग पार्टनर्स में शामिल हैं। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे चीन पर अपने देशों की कंपनियों की निर्भरता खत्म करने के अगुवा बन गए हैं।

गौरतलब है कि पांच मई को ख्यात वैश्विक कंपनी ब्लूमबर्ग के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी के कारण चीन के प्रति नाराजगी से चीन में कार्यरत कई वैश्विक कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग का काम पूरी तरह या आंशिक रूप से चीन से बाहर स्थानांतरित करने की तैयारी कर रही हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन से बाहर निकलती कंपनियों को आकर्षित करने के लिए भारत इन्हें बिना किसी परेशानी के जमीन मुहैया कराने पर काम कर रहा है। भारत सरकार ने इन कंपनियों के कारखानों को स्थापित करने के लिए देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में 461589 हेक्टेयर जमीन की पहचान की है।

यह भी उल्लेखनीय है कि चार मई को गुटनिरपेक्ष देशों के वर्चुअल सम्मेलन को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कोरोना संकट के समय दुनिया में भारत को मददगार देश माना जा रहा है। कोरोना की चुनौतियों के बीच भारत ने दवाई की मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाकर दुनिया के 120 से ज्यादा देशों को दवाइयां निर्यात की हैं। ऐसे में भारत को दुनिया की नई फार्मेसी के रूप में देखा जा रहा है। निःसंदेह जहां कोरोना संकट से परेशानियों का सामना कर रहे कई देशों को भारत ने दवाइयों और खाद्य पदार्थों सहित कई वस्तुओं का निर्यात करके कई देशों के उपभोक्ताओं को बड़ी राहत दी है, वहीं भारत के लिए नई मैन्युफैक्चरिंग संभावनाओं को भी आगे बढ़ाया है।

पिछले दिनों 30 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोविड-19 के खिलाफ अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने, वैश्विक निवेश को आकर्षित करने की रणनीतियों पर चर्चा करने के लिए एक व्यापक बैठक की। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड-19 की वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अफरा-तफरी है और चीन में निवेश करने वाली कंपनियां इसके विकल्प की तलाश में हैं। ऐसे में सरकार ने देश में मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए प्रमुखतया 10 सेक्टरों की पहचान की है। इनमें इलेक्ट्रिकल, फार्मा, मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स, हैवी इंजीनियरिंग, सोलर उपकरण, लेदर प्रोडक्ट, फूड प्रोसेसिंग, केमिकल और टैक्सटाइल शामिल हैं। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत के वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की नई संभावनाओं को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री ने प्लग एंड प्ले मॉडल को साकार करने हेतु केंद्र और राज्य सरकारों के शीघ्र रणनीतिक कदमों की आवश्यकता बताई है। इस परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार के कुछ विभागों ने पहल करना शुरू भी कर दी है।

उद्योग और वित्त मंत्रालय ने चीन से निवेश निकालकर अन्य देशों में ले जाने की कोशिश कर रही विदेशी कंपनियों से विशेष संपर्क भी शुरू किया है। इसी तरह पिछले दिनों केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के साथ बैठक आयोजित की, जिसमें कोरोना वायरस का संकट खत्म होने के बाद भारत को पूरी दुनिया की सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनाने की बेहतर संभावनाओं को मुठ्ठी में करने की योजना पर काम शुरू करने का निर्णय लिया गया। इसी तारतम्य में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के ‘प्लग एंड प्ले’ मॉडल को साकार करने के मद्देनजर मोडिफाइड इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर अपग्रेडेशन स्कीम (एमआईआईयूएस) में बदलाव करने तथा औद्योगिक उत्पादन के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में गैर-उपयोगी खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल करने के संकेत दिए हैं।

प्लग एंड प्ले व्यवस्था में कंपनियों को सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार मिलती है और उद्योग सीधे उत्पादन शुरू कर सकता है। इसी तरह सरकार विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में खाली पड़ी करीब 23 हजार हेक्टेयर से अधिक जमीन का इस्तेमाल नए उद्योगों के लिए शीघ्रतापूर्वक कर सकती है। सेज में सभी बुनियादी ढांचा सुविधाएं मसलन बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। निश्चित रूप से कोविड-19 के कारण दुनियाभर में चीन के प्रति बढ़ती नकारात्मकता के बीच भारत ने कोरोना से लड़ाई में सबके प्रति सहयोग पूर्ण रवैया अपना कर पूरी दुनिया में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाई है। ऐसे में भारत में वैश्विक निवेश, वैश्विक कारोबार और वैश्विक निर्यात बढ़ने की नई संभावनाएं उभरकर दिखाई दे रही हैं।

चीन से बाहर निकलते निवेश और निर्यात के मौके भारत की ओर आने की संभावना के कई बुनियादी कारण भी चमकते हुए दिखाई दे रहे हैं। कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्रों में सबसे तेजी से उभरता हुआ देश भी है। भारत की श्रमशक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है। भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की दुनिया की सबसे बड़ी जनसंख्या है। दुनिया में सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले भी भारत में ही हैं, ये सब विशेषताएं भारत को चीन से निकलने वाले निवेश और कारोबार के मद्देनजर दूसरे देशों की तुलना में अधिक उपयुक्त और अधिक आकर्षक बनाते हुए दिखाई दे रही हैं।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक सुधारों को तेजी से आगे बढ़ाया है। वाणिज्य-व्यापार के क्षेत्र में सुधार किए हैं, निर्यात बढ़ाने तथा करों एवं ब्याज दरों में बदलाव जैसे अनेक क्षेत्रों में रणनीतिक कदम उठाए हैं। ग्रामीण क्षेत्र में बुनियादी ढांचा विकसित करने का जोरदार काम भी किया है। उत्पादकों और श्रमिकों के हितों को देखते हुए श्रम कानूनों में संशोधन किए गए हैं। निवेश और विनिवेश के नियमों में परिवर्तन भी किए गए हैं। इन सबके साथ-साथ विगत सितंबर 2019 में कारपोरेट कर में भारी कमी की गई हैं। चूंकि इस समय दुनिया में दवाओं सहित कृषि, प्रोसेस्ड फूड, गारमेंट, जेम्स व ज्वैलरी, लेदर एवं लेदर प्रोडक्ट, कारपेट और इंजीनियरिंग प्रोडक्ट जैसी कई वस्तुओं के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं, अतएव ऐसे निर्यात क्षेत्रों के लिए सरकार के रणनीतिक प्रयत्न लाभप्रद होंगे। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारतीय फार्मा उद्योग पूरी दुनिया में अहमियत रखता है। इस तरह भारत के पास अच्छे अवसर हैं।

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