Parama Ekadashi 2020: आज है परमा एकादशी.. जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत और महत्व

New Delhi: 13 अक्टूबर यानि आज अधिक मास की अंतिम एकादशी (Parama Ekadashi 2020) है, हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। अधिक मास या मल मास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशी होती है।

अधिक मास में दो एकादशी होती है। जो परमा (Parama Ekadashi 2020), पद्मिनी और परम एकादशी के नाम से भी जानी जाती है। सभी एकादशी में यह एकादशी विशेष है। माना जाता है कि परम एकादशी पर व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

मलमास को भगवान विष्‍णु की पूजा के लिए सर्वोत्‍तम माना गया है, भगवान विष्‍णु ने ही इस मास को अपना नाम दिया है। जिससे कारण इसे पुरुषोत्‍तम के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि सभी व्रतों में एकादशी (Parama Ekadashi 2020) का महत्व सबसे ज्यादा फल देने वाला होता है। ये मलमास की आखिरी एकादशी है।

क्यों की जाती है भगवान विष्णु जी की पूजा?

ये एकादशी (Parama Ekadashi 2020) अधिक मास में पड़ी है, और मलमास में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है कि जो लोग भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करते हैं। भगवान विष्णु उनके सारे दुखों को हर लेते हैं। इसके साथ ही इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है।

ऐसी मान्यताएं हैं कि इस एकादशी (Parama Ekadashi 2020) का व्रत करने से आपके घर में सौभाग्य और धन आता है। परम एकादशी के दिन व्रत करने के साथ विद्या दान, अन्न दान, भूमि दान और गोदान करने की मान्यता है, इसके साथ ही इस दिन आप ब्राह्मणों को भोजन भी करा सकते हैं।

परम एकादशी व्रत की विधि

परम एकादशी को व्रतों में सबसे कठिन व्रत में से एक माना जाता है। बहुत से लोग इसे निर्जला भी रखते हैं। जिस दिन से एकादशी की तिथि शुरु होती है उसी दिन से व्रत के नियमों का पालन करना होता है।

इस दिन व्रत का संकल्प लेने से पहले स्नान करें और अच्छे और साफ वस्त्र पहन कर पूजा स्थान पर बैठकर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा शुरु करें, इस दिन भगवान विष्णु के साथ भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। व्रत के पारण के बाद दान आदि का कार्य भी करना अच्छा माना गया है।

परम एकादशी का शुभ मुहूर्त
  • 12 अक्टूबर शाम 04 बजकर 38 मिनट
  • 13 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 35 मिनट तक समाप्त
  • व्रत का पारण समय 14 अक्टूबर को सुबह 06 बजकर 21 मिनट से सुबह 08 बजकर 40 मिनट तक है।
परम एकादशी व्रत कथा

प्राचीन काल में सुमेधा नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री का नाम पवित्रा था। वह परम सती और साध्वी थी। वे दरिद्रता और निर्धनता में जीवन निर्वाह करते हुए भी परम धार्मिक थे और अतिथि सेवा में तत्पर रहते थे। एक दिन गरीबी से दुखी होकर ब्राह्मण ने परदेश जाने का विचार किया, किंतु उसकी पत्नी ने कहा- ‘स्वामी धन और संतान पूर्वजन्म के दान से ही प्राप्त होते हैं, अत: आप इसके लिए चिंता ना करें।’

एक दिन महर्षि कौडिन्य उनके घर आए। ब्राह्मण दंपति ने तन-मन से उनकी सेवा की। महर्षि ने उनकी दशा देखकर उन्हें परमा एकादशी का व्रत करने को कहा। उन्होंने कहा- ‘दरिद्रता को दूर करने का सुगम उपाय यही है कि, तुम दोनों मिलकर अधिक मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत तथा रात्रि जागरण करो। इस एकादशी के व्रत से यक्षराज कुबेर धनाधीश बना है, हरिशचंद्र राजा हुआ है।’

ऐसा कहकर मुनि चले गए और सुमेधा ने पत्नी सहित व्रत किया। प्रात: काल एक राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आया और उसने सुमेधा को सर्व साधन, संपन्न, सर्व सुख समृद्ध कर एक अच्छा घर रहने को दिया। इसके बाद उनके समस्त दुख दर्द दूर हो गए।

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