सत्ता का विभाजनकारी एजेण्डा अर्थात आग से खेलने का प्रयास

-निर्मल रानी-

केंद्र सरकार के नए कृषि क़ानूनों का विरोध अब आंदोलन के साथ साथ सत्ता व किसानों के बीच हिंसक टकराव की ओर बढ़ता जा रहा है। पिछले दिनों मुज़फ़्फ़रनगर के लिसाड़ और भैंसवाल गांव में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान का ज़बरदस्त विरोध व उनके विरुद्ध हुई नारेबाज़ी और बाद में सोरम गांव में हुई हिंसक घटना तो कम से कम इसी तरफ़ इशारा कर रही हैं। ग़ौर तलब है कि भाजपा आला कमान द्वारा दिल्ली,पश्चिमी उत्तर प्रदेश,हरियाणा,पंजाब व राजस्थान के जाट समुदाय से संबंध रखने वाले अपनी पार्टी के नेताओं को यह ज़िम्मेदारी सौंपी थी कि वे अपने समुदाय की खाप पंचायतों के प्रमुखों व जाट समुदाय के किसानों के बीच जाकर उन्हें  केंद्र सरकार के नए कृषि क़ानूनों से होने वाले कथित फ़ायदे के बारे में जाकर बतायें। केंद्र सरकार की इसी मंशा के तहत स्वयं को जाट समुदाय का नेता समझने वाले  केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने मुज़फ़्फ़रनगर व शामली में उपरोक्त गांव का दौरा किया था। इनमें कुछ गांव में तो ट्रैक्टर ट्रॉली का अवरोधक बनाकर ग्रामीणों ने  केंद्रीय मंत्री का रास्ता रोका तो किसी गांव में उनको यह कहकर वापस कर दिया गया कि पहले मंत्री पद व भाजपा से त्याग पात्र दें फिर किसानों के धरने में शामिल होने के बाद ही अपने विचार रखें। जबकि इन्हीं  गांव में लोग यह कहते भी सुने गए कि मंत्री जी को कृषि क़ानूनों के बारे में जो कुछ भी कहना या समझाना है वह दिल्ली में धरने पर बैठे हमारे (किसान ) नेताओं को ही समझायें। कई खाप प्रमुखों ने तो मंत्री जी से मिलना भी मुनासिब नहीं समझा। बहरहाल लिसाड़ और भैंसवाल गांव में हुए विरोध व अपने ‘मुर्दाबाद’ व ‘वापस जाओ’ के नारों से जब संजीव बालियान के अहम को ठेस पहुंची तो अगले ही दिन सोरम गांव में हो रहे एक तेरहवीं के आयोजन में वे अपने साथ कुछ बाहुबली समर्थक लेकर पहुंच गए। यहां किसानों ने जब  बालियान का विरोध किया तो उनके समर्थकों ने लाठियां चला दीं जिससे कई लोग घायल भी हो गए। औरतों तक से बदसुलूकी किये जाने के समाचार हैं। इस घटना ने जलती आग में घी डालने का काम किया। ठीक उसी तरह जैसे ग़ाज़ीपुर बार्डर पर एक भाजपाई विधायक के नेतृत्व में किसानों पर हुए हमले के बाद किसान आंदोलन और अधिक मज़बूत होता नज़र आया था ।

इस घटनाक्रम में एक बात तो साफ़ नज़र आई कि  भाजपा के रणनीतिकारों ने जाट नेताओं को सरकार का पक्ष रखने की ज़िम्मेदारी देकर एक बार फिर किसान आंदोलन को जातीय रंग देने की कोशिश की जबकि ठीक इसके विपरीत किसानों का यह कहना था कि वे पहले किसान हैं उसके बाद जाट,दलित या हिन्दू अथवा मुसलमान। किसानों के इस विरोध तथा सरकार की असफल कोशिशों से स्पष्ट हो गया कि जहां इस आंदोलन को कमज़ोर करने के लिए सरकार की विभाजनकारी नीतियां अभी भी जारी हैं वहीँ ऐसी हर कोशिशों के बाद किसान आंदोलन बार बार और अधिक मज़बूत होता जा रहा है। सिख आंदोलन,पंजाब के किसानों का आंदोलन,बड़े किसानों का आंदोलन,आढ़तियों व दलालों का आंदोलन,विदेशी फ़ंडिंग से चलने वाला,नक्सली,अर्बन नक्सली आंदोलन,राजनैतिक दलों के बहकावे  जाने वाला आंदोलन आदि सत्ता द्वारा आंदोलन पर लगाए जाने वाले टैग जब कामयाब नहीं हुए तो 26 जनवरी की लाल क़िले की दुर्भाग्यपूर्ण घटना की आड़ में इसे राष्ट्रविरोधी  आंदोलन बताने व उसके बहाने सिख समुदाय के विरुद्ध लोगों में क्रोध पैदा करने की भी मीडिया के सहयोग से साज़िश गयी मगर सत्ता प्रतिष्ठान को इसमें भी कोई सफलता नहीं मिली।

हां किसान आंदोलन में जाट समुदाय के लोगों को समझाने की सरकार की कोशिश के जवाब में किसानों ने भी 1907 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि क़ानूनों के विरोध में शहीद भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह के नेतृत्व में ‘पगड़ी संभाल जट्टां ‘ नामक चलाई गई उस मुहिम को एक बार फिर से ज़रूर याद किया जिसने अंग्रेज़ हुकूमत को उस समय भारतीय किसानों पर थोपे जा रहे क़ानूनों को वापस लेने  मजबूर कर दिया था। जहां तक जाट नेताओं को मैदान में उतार कर जाट समुदाय के किसानों को समझने का प्रश्न है तो भाजपा में ही हरियाणा के सबसे प्रमुख जाट नेता तथा सर छोटू राम के परिवार के सदस्य चौधरी वीरेंद्र सिंह को सरकार क्यों नहीं समझा सकी ? क्या वजह है कि भाजपा में होते हुए भी चौधरी वीरेंद्र सिंह किसानों के पक्ष में आ खड़े हुए। इसी तरह हरसिमरत कौर न केवल किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रही हैं बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इस तरह भाजपा के ही कई नेता किसानों के  पक्ष में अपनी आवाज़ कहीं खुलकर तो कहीं दबे स्वर में उठाते रहे हैं। परन्तु सरकार को किसानों के हितों के बजाय शायद उनका हित सर्वोपरि नज़र आ रहा है जिन्हें इन क़ानूनों का वास्तव में लाभ पहुंचना है।

मोदी सरकार भले ही बहुमत में ज़रूर है परन्तु किसान आंदोलन से निपटने के जो तरीक़े सरकार ने अपनाये हैं वह सभी दांव सरकार पर उलटे पड़ते जा रहे हैं।सरकार किसानों को जितना ही विभाजित करना चाहती है किसानों की एकता उतनी ही सुदृढ़ होती जा रही है।यहाँ तक कि किसान सत्ता की ओर से की जा रही ऐसी सभी कोशिशों को अब अपने विरुद्ध अपनाए जा रहे ‘हथकंडों’  के रूप में देखने लगे हैं। यहां तक कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक उन्माद फैला कर वोट बटोरने और दंगे में अग्रणी रहे लोगों को चुनाव मैदान में उतरने व उन्हें मंत्री बनाकर ‘सम्मानित’ करने जैसे सभी हथकंडे अब किसानों के समक्ष बेनक़ाब हो चुके हैं। किसानों की विभिन्न पंचायतों में भी इस विषय पर किसानों का दर्द छलक चुका है और उन्हें अपनी ग़लतियों का एहसास भी हो रहा है। परन्तु सरकार जिसे देश में आपसी एकता व सद्भाव को बढ़ावा देना चाहिए वह किसान आंदोलन को तोड़ने के लिए बार बार विभाजनकारी एजेंडा चला रही है। इसी तरह  पिछले दिनों 21 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्त्ता दिशा रवि को एक टूल किट मामले में यह कहकर गिरफ़्तार किया गया कि वह किसान आंदोलन में चल रही विदेशी साज़िश की हिस्सेदार है। मगर दिल्ली की एक अदालत ने दिशा रवि को ज़मानत देते हुए साफ़ कहा कि ‘टूल किट में कहीं भी हिंसा का आवाह्न नहीं किया गया और इसमें देशद्रोह जैसी कोई बात सामने नहीं आई’।अदालत ने यह भी कहा कि ‘दिशा के अलगाववादी विचारों से जुड़ने के भी कोई सुबूत नहीं’। बल्कि अदालत ने अपनी इस टिपण्णी से सत्ता को भी आईना दिखाया कि ‘एक उदासीन और बेहद विनम्र जनता के मुक़ाबले जागरूक और मुखर जनता एक स्वस्थ और मज़बूत लोकतंत्र का संकेत है। और भारतीय सभ्यता अलग अलग विचारों की कभी विरोधी नहीं रही’। ऐसे में सरकार को अब भी अपनी ऑंखें खोलनी चाहिये और यह समझना चाहिये कि किसान आंदोलन के विरुद्ध चलाया जाने वाला इस तरह का विभाजनकारी एजेण्डा समाधान का नहीं बल्कि सत्ता का आग से खेलने का प्रयास ही कहा जा सकता है।