सरकार का सीधे किसानों से बातचीत करना ही बेहतर है

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-डॉ. वेदप्रताप वैदिक-

किसान आंदोलन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप असाधारण है लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसके फैसले से किसान संतुष्ट होंगे। अदालत ने यह तो बड़ी राहत दी है कि तीनों कृषि-कानूनों को लागू करने पर फिलहाल रोक लगा दी है लेकिन उसने जिन चार विशेषज्ञों की कमेटी बनाई है, क्या किसान नेता उनसे बात करने के लिए तैयार होंगे?

अदालत के फैसले पर सारे आंदोलनकारी नेता बैठकर शांतिपूर्वक बात करेंगे। उसके बाद ही उनका आधिकारिक दृष्टिकोण सामने आएगा लेकिन अभी तक जितने भी किसान नेताओं ने अपनी व्यक्तिगत राय जाहिर की है, वे सब इस फैसले से सहमत नहीं हैं।किसान नेता इस बात से तो खुश हैं कि इन तीनों कानूनों पर फिलहाल रोक लगा दी गई है लेकिन वे विशेषज्ञों की इस कमेटी पर गहरे प्रश्न चिन्ह खड़े कर रहे हैं।

जो किसान नेता सरकार से सहयोग करना चाहते हैं, वे भी चकित हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन चार लोगों की कमेटी किस आधार पर बना दी है? क्या इन चार में से दो लोग किसानों के पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं? क्या वे किसान हैं या किसान नेता हैं? कुछ किसान नेताओं ने मुझसे कहा कि कमेटी के ये चारों लोग किसानों के नहीं, सरकार के पक्षधर हैं। उन्होंने कहा कि ये तो पहले से ही सब कुछ समझे हुए हैं। उन्हें हम क्या समझाएंगे?

एक पूर्व कृषि मंत्री ने किसी टीवी पर सर्वोच्च न्यायालय की इस पहल का खुले तौर पर स्वागत किया लेकिन तब तक इस कमेटी के सदस्यों के नाम प्रकट नहीं हुए थे लेकिन ज्यों ही उनके नाम सामने आए, उन्होंने क्षमा मांगते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला अब अधर में लटक जाएगा और उस पर किसानों को तरह-तरह के संदेह करने का मौका भी मिल जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर बहस के दौरान जितनी सख्ती से सरकार की आलोचना की थी और सरकारी पक्ष की वकालत करनेवालों को फटकारा था, उससे ऐसा अंदाज लग रहा था कि उसके हस्तक्षेप से यह सारा मामला सुलझ जाएगा लेकिन किसानों को हम लोग कितना ही बे-पढ़ा-लिखा समझें लेकिन उनकी समझ बड़े खुर्राट नेताओं और बौद्धिकों से कहीं अधिक गहरी निकली।

जब कृषि मंत्री ने आठवें दौर की वार्ता में उनसे कहा था कि आप अपनी मांगों के लिए अदालत की शरण में जाइए। तभी कई किसान नेताओं ने साफ़-साफ़ कह दिया था कि हम अदालत की नहीं सुनेंगे। जब तक ये तीनों कानून वापिस नहीं होंगे, हम धरने पर बैठे रहेंगे।

ये किसान नेता अदालत के इस तेवर से ज़रा भी प्रभावित नहीं हुए कि वह भयंकर ठंड में बुजुर्गों और बच्चों की तकलीफों के प्रति सहानुभूति बता रही थी। यह प्रशंसा भी उन्हें नहीं हिला सकी कि वे कितने अनुशासित और अहिंसक हैं।

जजों ने सरकार की जो कड़ी आलोचना की, वह भी उनके दिल में अदालत के प्रति आस्था नहीं जगा सकी। अदालत के फैसले को नहीं मानने के बयानों से ऐसी ध्वनि निकल रही थी कि किसान स्वयंभू हो गए हैं, अहंकारग्रस्त हो गए हैं और अब निरंकुश हो गए हैं। लेकिन अब पता चल रहा है कि किसान लोग फैसला आने के पहले ही इस फैसले को समझ गए थे।

अब किसान नेता एक नया सवाल भी उठा रहे हैं। जब जजों ने सरकारी वकील से पूछा कि सरकार ने कृषि-कानून बनाने के वक्त पर्याप्त परामर्श और सोच-विचार क्यों नहीं किया तो अब किसान लोग अदालत से पूछ रहे हैं कि आपने चार आदमियों की कमेटी बनाते वक्त क्या हमसे पूछा? जैसे सरकार ने एकतरफा कानून बना दिया, वैसे ही यह एकतरफा कमेटी बन गई।

किसान नेताओं की यह शिकायत भी है कि पिछले डेढ़ महिने से सरकार जो बातचीत चला रही है, उसी द्रौपदी के चीर को अदालत ने और भी लंबा खींच दिया है। किसान पहले मंत्रियों से बात कर रहे थे। अब वह इन विशेषज्ञों से बात करेंगे। यह बात पता नहीं, कितने माह तक चलती रहेगी।

इस बीच किसान थक-हार कर घर बैठ जाएंगे और किसान आंदोलन बेमौत मर जाएगा। अदालत ने अपनी बहस में किसानों के धरने से जनता को होनेवाली घनघोर असुविधा का भी खुलकर जिक्र किया है। अदालत ने इशारे-इशारे में अपनी यह इच्छा भी जाहिर कर दी कि धरने और प्रदर्शन जल्दी से जल्दी खत्म किए जाने चाहिए। अदालत ने यह संकेत भी दे दिया कि ये धरने खूनी शक्ल भी अख्तियार कर सकते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला इस हद तक तो सराहनीय है कि उसने फिलहाल इन तीनों कानूनों को लागू होने से रोक दिया है लेकिन वह इस रोक को कभी भी हटा सकती है। क्या ही अच्छा होता कि वह यह मध्यस्थ कमेटी बनाने में किसानों की राय भी ले लेती।

अदालत के इस फैसले ने संसद और सरकार, इन दोनों की छवि को धुंधला किया है, क्योंकि उसने ऐसे कानून पर रोक लगाई है, जिसे न तो उसने असंवैधानिक बताया है और न ही जिससे किसी मानव अधिकार का उल्लंघन होता है। मैं तो अभी भी बेहतर यही समझता हूं कि किसानों से सरकार सीधी बातचीत करे और राज्यों को छूट दे दे कि जिन्हें मानना हो, वे इन कानूनों को मानें और जिन्हें न मानना हो, वे न मानें। इसके अलावा सिर्फ 23 उपजों के ही नहीं, दर्जनों फलों और सब्जियों के भी न्यूनतम मूल्य घोषित किए जाएं। देश के छोटे किसानों को ज्यादा से ज्यादा राहत मिले ताकि वे समृद्ध हों और देश के आम आदमी को उचित दामों पर पौष्टिक आहार मिले। किसान भारत का और भारत दुनिया का अन्नदाता बने।