पेंशन की टेंशन से जूझते सरकारी कर्मचारी

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-राकेश शर्मा-

बेरोजगारी के थपेड़ों की मार को झेलते हुए जब प्रदेश का युवा एक सरकारी कर्मचारी बनकर प्रदेश की सेवा के लिए सरकारी नौकरी में प्रवेश करता है तो उस सेवा के अनुबंध काल के रूप में उसकी दूसरी अग्नि परीक्षा शुरू हो जाती है। अनुबंध के इस सेवाकाल में यह कर्मचारी तीन वर्ष तक आधे से भी कम वेतन पर केवल इसी एहसास के सहारे गुजार देता है कि वह अब एक सरकारी कर्मचारी है और आने वाले समय में सरकार उसको स्थायित्व और पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करेगी।

तीन वर्ष का यह अनुबंध काल एक लंबे कर्मचारी संघर्ष का परिणाम है अन्यथा पहले यह अवधि भी आठ वर्ष की थी। जब तीन-साढ़े तीन वर्षों के बाद कर्मचारी का नियमितीकरण होता है तो उसको नई पेंशन योजना (एनपीएस) के अंतर्गत पंजीकृत किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत पंजीकृत होते ही कर्मचारी के संघर्ष का यह तीसरा दौर शुरू हो जाता है। पुरानी पेंशन योजना के अंतर्गत मिलने वाली सुरक्षा की तुलना में यह नई पेंशन योजना कर्मचारियों के भविष्य के लिए किसी भी प्रकार की सुरक्षा की गारंटी नहीं देती है। इसीलिए अब कर्मचारियों को अपने नियमितीकरण के बाद पुरानी पेंशन बहाली के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह कटु सत्य है कि आज का सरकारी कर्मचारी न तो नौकरी से पहले संतुष्ट था और न ही नौकरी पाने के बाद संतुष्ट हो पाया है। नौकरी की संतुष्टि पर आज तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई अध्ययन किए जा चुके हैं जो ये बताते हैं कि नौकरी से कर्मचारी के संतुष्ट होने के बहुत से लाभ संगठन को मिलते हैं।

संतुष्ट कर्मचारी से संगठन को मानवतावादी और वित्तीय लाभ दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। जब कर्मचारी संतुष्ट होते हैं तो उनके काम की गुणवत्ता एक असंतुष्ट कर्मचारी से कहीं अधिक होती है। वे अपने संगठन के प्रति अधिक प्रतिबद्ध होते हैं और उनकी उत्पादकता में भी गजब की बढ़ोतरी होती है। हिमाचल प्रदेश के एनपीएस के अंतर्गत आने वाले कर्मचारियों में भी असंतुष्टता का भाव देखा जा रहा है। कर्मचारियों में नई पेंशन योजना के प्रति आक्रोश समय बीतने और उनका संख्या बल बढ़ने के साथ और गहराता जा रहा है। जोखिमों से भरे भविष्य की चिंता से असंतुष्टता का होना स्वाभाविक है।

इस प्रकार की असंतुष्टता से कर्मचारियों की उत्पादकता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव का आकलन और उसके दुष्परिणामों के बारे में अभी किसी भी स्तर पर न तो ध्यान दिया गया है और न ही इस विषय को किसी स्तर पर संबोधित किया जा रहा है। सरकारी नौकरी के प्रति युवाओं में आकर्षण का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा तत्त्व ही है। पुरानी पेंशन योजना के बंद होने से सरकारी नौकरी में सुरक्षा की कमी और जोखिम में वृद्धि हुई है। पुरानी पेंशन बहाली के लिए प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा वर्ग पिछले कुछ समय से पूरे प्रदेश में संघर्षरत है।

छह मार्च को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा प्रदेश हित में पेश किए गए बजट से इन कर्मचारियों को बहुत बड़ी निराशा हाथ लगी है। सरकार द्वारा इन कर्मचारियों की मांग के लिए एक भी शब्द बजट में नहीं कहा गया। नई पेंशन योजना के अंतर्गत कार्यरत ये कर्मचारी अपने बुढ़ापे की सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं। सेवानिवृत्ति के बाद अपनी सुरक्षा की गारंटी के प्रति संघर्षरत इन कर्मचारियों की मांग जायज और तर्कसंगत भी है। एनपीएस के अंतर्गत आने वाले ये कर्मचारी अनुबंध सेवाकाल के बाद जब नियमित होते हैं तो उनकी नियमित सेवा की अवधि ज्यादा नहीं हो पाती है, इसलिए इस योजना में उनके द्वारा किया जाने वाला अंशदान भी उतना अधिक नहीं हो पाता है।

इस दशा में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन केवल नाममात्र की होती है, जिसको बुढ़ापे में आर्थिक सहारे के रूप में देखना बिल्कुल भी जायज नहीं है। सेवानिवृत्ति पर एक एनपीएस कर्मचारी को उसके खाते में जमा हुई कुल राशि का केवल चालीस प्रतिशत हिस्सा ही नकद मिलता है। बाकी बची हुई साठ प्रतिशत राशि से उसको किसी कंपनी द्वारा चलाई जा रही पेंशन बीमा पॉलिसी में निवेश करना पड़ता है। कर्मचारी अपनी पूरी नौकरी के दौरान एनपीएस के माध्यम से जो भी जोड़ता है, उसका एक बड़ा हिस्सा बीमे के रूप में कंपनी को अदा कर देता है और इस बीमे से मिलने वाली नाममात्र पेंशन से गुजारा करने पर मजबूर हो जाता है।

बीमा करने वाली कंपनी भी मार्केट की चाल पर निर्भर करती है और यदि भविष्य में कभी बीमा करने वाली कंपनी डूब जाती है तो भी जोखिम केवल कर्मचारी को ही सहन करना पड़ेगा। इस प्रकार के प्रावधान सचमुच चिंता को बढ़ाने वाले हैं। बीमे से पेंशन के रूप में कर्मचारी को मिलने वाला आर्थिक लाभ नाममात्र है, लेकिन उसकी मृत्यु से उसके परिवार को एक बड़ा लाभ मिलना जरूर तय है। यह सही है कि कर्मचारी अपनी मृत्यु से ही परिवार का भला कर सकता है तो यह भी संभव है कि बीमे के लाभ पाने के लिए कर्मचारी के साथ बुढ़ापे में किसी प्रकार की दरिंदगी भी की जाए। यानी यह कहा जा सकता है कि एक एनपीएस कर्मचारी के लिए हर मोड़ पर खतरा है और नियुक्ति से लेकर सेवानिवृत्ति के बाद तक भी किसी भी प्रकार की सुरक्षा का तत्त्व मौजूद नहीं है। यह पेंशन योजना आज कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ी टेंशन बन चुकी है।

यह एक ऐसा लड्डू है जो कर्मचारी से न तो निगलते बन रहा है और न ही उगलते। इतना ही नहीं, पिछले माह इन कर्मचारियों को पिछले एक वित्तीय वर्ष के दौरान सरकार द्वारा दिए गए नियोक्ता अंशदान को भी इनके सकल वेतन में जोड़ दिया गया। इसकी जानकारी कर्मचारियों को उनकी ई-सैलरी ऐप के माध्यम से पता चली है। सरकार के द्वारा इस संदर्भ में अभी तक कोई भी स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। यदि सरकार द्वारा दिए जाने वाले इस अंशदान को सकल वेतन में जोड़कर अगले वित्तीय वर्ष में इसको टैक्स के दायरे में लाया जाता है तो यह इन कर्मचारियों के ऊपर सबसे बड़ा कुठाराघात होगा।

एक ऐसी आय जोकि न तो कर्मचारी निकाल कर प्रयोग कर सकता है और जिससे मिलने वाले लाभ भी भविष्य की गर्त में छुपे हुए हैं, उनको वेतन का हिस्सा मान लेना बिल्कुल भी जायज नहीं है। इस संदर्भ में भी सरकार को जल्द से जल्द स्पष्टीकरण देकर इन कर्मचारियों को सता रही चिंता और अनिश्चितता को दूर करना चाहिए। कर्मचारी देश और प्रदेश के विकास में अपना अहम योगदान देते हैं। सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में कर्मचारियों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए इन सेवारत कर्मचारियों को संतुष्ट करके इनसे प्रदेश के विकास में श्रेष्ठ योगदान प्राप्त करने के लिए सरकार को पुरानी पेंशन बहाली के लिए समय पर कदम उठाना बहुत आवश्यक है।