सरकार के नरम रवैये से शांत होंगे किसान

farmers protest

-सुखदेव सिंह-

कृषि कानूनों के खिलाफ  दिल्ली में लामबंद चल रहे किसानों की सुविधाएं हटाया जाना जलती आग में पेट्रोल डालने के समान है। अब गुस्साए उपद्रवी किसान इस आंदोलन को जन आंदोलन बनाने की फिराक में हैं जिसके चलते वे छह फरवरी को तीन घंटे तक राष्ट्रीय राजमार्ग बंद करने का ऐलान कर चुके हैं।

राजधानी दिल्ली में चल रहे इस किसान आंदोलन के नेता केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय तक की बात नहीं मान रहे तो ऐसे में राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रखने का क्या औचित्य समझा जाए? सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक याचिका की सुनवाई करते हुए साफ  कहा कि अब किसानों की समस्याओं का समाधान सिर्फ केंद्र सरकार को निकालना है। गणतंत्र दिवस की बेला पर अगर कंटीली तार से घेराबंदी सहित लोहे के खूंटे सड़कों पर गाड़े होते तो शायद कुछेक उपद्रवी किसान राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने की हिमाकत नहीं कर सकते थे।

किसानों की ओर से केंद्र सरकार को फोन किए जाने पर ही इस समस्या का हल निकाले जाने की बातें हो रही हैं, दूसरी तरफ पुलिस द्वारा की जा रही बाड़बंदी से किसान भड़कते जा रहे हैं। राज्यसभा, लोकसभा और विधानसभा में जनता माननीयों को चुनकर इसलिए भेजती है ताकि जनहित के फैसलों सहित विकास कार्यों की रूपरेखा तय की जा सके। यह भारतीय लोकतंत्र का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि जहां जनहित के फैसले लिए जाने जरूरी हैं, वहीं नेतागण आपस में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर समय की बर्बादी करते हैं।

आजादी के बाद सरकारें किसी भी राजनीतिक दल की बनी हों, विपक्षी दलों ने हमेशा सत्तापक्ष पर आरोप ही दागे हैं। देश किस दिशा की ओर जा रहा है, कोई सोचने को तैयार नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से संसद का बजट सत्र बुलाने पर मंगलवार को भी विपक्षी दलों ने सिर्फ  विरोध करके समय की बर्बादी की है। माननीयों को मिलने वाले वेतन-भत्ते जनता की ओर से चुकाए जाने वाले टैक्स की वजह से मिलते हैं। माननीयों को यह भली-भांति समझ रखनी होगी कि जनता के पैसों और समय की बर्बादी न की जाए। आंदोलन में विरोध कृषि कानूनों का कम, जबकि केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार का जमकर हो रहा है।

26 जनवरी के बाद यह आंदोलन विपक्षी दलों के नेताओं का केंद्र सरकार के खिलाफ भड़ास निकालने का मंच बनता जा रहा है। विपक्षी नेता आंदोलनकारी नेताओं को पर्दे के पीछे पहले उकसाते रहे, ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्या किसी नेता ने, देश की छवि पर इसका क्या असर पड़ रहा है, यह चिंतन-मनन किया है। किसान नेता हर दिन भाषणबाजी करके देश की एकता को तोड़ने की भरपूर कोशिशों में लगे हुए हैं। किसानों पर आरोप दागे जा रहे हैं कि वे तलवार, भालों सहित इस आंदोलन में कूदे हैं।

यह शस्त्र ही जिनका दशकों से गहना रहे हों, उन्हें आतंकवादी कहना भी उचित नहीं है। किसानों का हुक्का-पानी बंद किए जाने से इस विकराल बनती जा रही समस्या का हल नहीं निकलने वाला है। आज किसानों का मददगार बनकर अपनी राजनीति चमकाने वाले नेताओं की कमी नहीं, यह बात केंद्र सरकार को समझनी होगी। किसान गुस्से से कहीं अधिक भावुकता से पिघलेंगे, यह समझने की जरूरत है।

आंदोलन भड़काने में सोशल मीडिया भी बराबर का जिम्मेदार है। किसानों के खिलाफ  भ्रामक प्रचार किया जा रहा है तो मीडिया को भी दलाल कहने से गुरेज नहीं किया जा रहा है। किसान आंदोलन की आड़ में छुटभैया नेता भी अपना सिक्का जमाने की कोशिशों में लगे हुए हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को भी गोदी मीडिया का खिताब दिया जा रहा है जो कि लोकतंत्र की सफलता के लिए घातक है।

मीडिया की भूमिका पर समाज का विश्वास धीरे-धीरे उठता जा रहा है। किसान बिलों का प्रचार-प्रसार मीडिया ने इतना नहीं किया, जितना किसानों के आंदोलन का किया जा रहा है। पल-पल की सुर्खियां बनाकर किसान आंदोलन अब धर्म का अखाड़ा बनता जा रहा है। केंद्र सरकार को जल्द किसानों की समस्याओं का निदान करना होगा अन्यथा विरोध की यह चिंगारी बुझती नजर नहीं आ रही है। सोशल मीडिया पर आपसी एकता और भाईचारे में दरार डालने वाले असामाजिक तत्त्वों के खिलाफ  कड़ी कार्रवाई किए जाने की जरूरत है।

केंद्र सरकार के लिए यह समय किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से बौखलाए विपक्षी दलों के नेताओं ने किसानों को भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना शुरू कर रखी हैं। सरकार को अब बड़ी सूझबूझ से किसानों को समझाकर देशहित में यह आंदोलन बंद करवाना होगा। यह आंदोलन तभी बंद होगा, जब किसानों की समस्याएं सुलझ जाएंगी। किसान एक ऐसा वर्ग है जिसकी सदियों से समस्याएं रही हैं। समय-समय पर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए तत्कालीन सरकारों ने काफी काम भी किया, किंतु लगता है जैसे गरीबी किसानों से हमेशा चिपकी रहेगी। इसलिए आज की जरूरत यह है कि खेतीबाड़ी को लाभ का सौदा बनाना होगा।

खेती की लागत को कम करना होगा, साथ ही किसानों की ओर से उगाए जाने वाले उत्पादों को लागत से अधिक मूल्य दिलाना होगा। वैसे केंद्र सरकार भी दावा कर रही है कि किसानों को खुला बाजार मिलने से उनके उत्पादों को वाजिब दाम मिलना सुनिश्चित हो जाएगा। फिर भी किसान यह बात क्यों नहीं समझ पा रहे हैं, इस विषय पर चिंतन होना चाहिए। सरकार किसानों के हित में ही काम कर रही है, इस बात को किसानों को समझाना भी सरकार का ही काम है। किसानों और सरकार में बातचीत जारी रहनी चाहिए, यही इस समस्या के समाधान का एकमात्र उपाय है। आशा है कि किसान और सरकार दोनों समझदारी का परिचय देंगे और यह समस्या जल्द ही सुलझ जाएगी।