Vijay Diwas: सैम ‘बहादुर’ के नाम से खौफ खााती थी इंदिरा, 1000 रुपए के बदले कब्जाया आधा पाकिस्तान

Webvarta Desk: गठीला बदन, लंबी नाक, तनी हुई मूछें और चौड़ा सीना… यह उस शख्स (Sam Bahadur) की कहानी है, जिसने सिर्फ 1000 रुपए के बदले आधे पाकिस्तान पर कब्जा कर लिया था। विजय दिवस (Vijay Diwas) पर आज हम आपको बताने जा रहे भारतीय सेना के सैम ‘बहादुर’ (Sam Manekshaw) की कहानी, जिससे इंदिरा गांधी भी खौफ खाती थी।
कौन है सैम बहादुर

सैम बहादुर (Sam Bahadur) कोई और नहीं बल्कि भारतीय सेना के पांच सितारा अधिकारी सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ (Sam Manekshaw) हैं, जो 1971 की जंग में भारतीय सेना की अगुवाई कर रहे थे। अमृतसर के एक पारसी परिवार में सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल, 1914 को हुआ। सैम मानेकशॉ इकलौते ऐसे सैन्य अधिकारी थे, जिन्हें उनके जीवित रहते हुए फील्ड मार्शल का पद दिया गया। आसान शब्दों में समझें तो फील्ड मार्शल, सेना प्रमुख से भी बड़ा पद होता है।

क्यों कहे जाते हैं सैम बहादुर

सैम मानेकशॉ का गोरखा रेजीमेंट से करीबी नाता रहा है। उन्हें ‘सैम बहादुर’ नाम भी गोरखा रेजिमेंट से ही मिला। एक बार सैम मानेकशॉ ने हरका बहादुर गुरुंग नाम के एक गोरखा सिपाही से पूछा, “मेरा नाम के हो?” यानि मेरा नाम क्या है? उस गोरखा सिपाही ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया, “सैम बहादुर, साब!” और बस तभी से लोग उन्हें सैम बहादुर कहने लगे।

खून में ही थी देशभक्ति

सैम मानेकशॉ के पिता होर्मूसजी मानेकशॉ ने अंग्रेजी सेना में बतौर डॉक्टर सेवा दी थी। सैम भी डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन उन्हें लंदन जाकर पढ़ने के लिए इजाजत नहीं मिली। बगावत पर उतरे सैम ने उसी वक्त देहरादून की इंडियन मिलेट्री अकादमी (आईएमए) में दाखिला ले लिया।

सैम मानेकशॉ ने दूसरे विश्व युद्ध के साथ कुल 5 युद्धों में हिस्सा लिया। दूसरे विश्व युद्ध के वक्त सैम पैगोडा हिल में जापानियों का सामना करते हुए बुरी तरह घायल हो गए। कहते हैं कि सैम को 9 गोलियां लगी थी। हालत इतनी खराब थी कि उनके सीने पर मिलिट्री क्रॉस रख दिया गया। मिलिट्री क्रॉस का मैडल मरने के बाद नहीं दिया जा सकता।

सैम ने आदेश दिया कि घायलों को ले जाने में रफ्तार धीमी न की जाए। मगर उनके गोरखा सिपाही उन्हें लेकर मिलिट्री बेस तक ले आए। वहां डॉक्टर ने बताया कि इन्हें जिगर, फेफड़ों और सीने में गोलियां लगी है। ये नहीं बचेंगे, इसलिए इनका इलाज नहीं होगा। गोरखा ने डॉक्टर पर राइफल तान दी और कहा हम अपने अफसर को इसलिए पीठ पर यहां तक लाद कर लाए हैं। अगर इलाज नहीं किया तो डॉक्टर को गोली मार देंगे।

डॉक्टर ने उनकी गोलियां निकाल कर उनकी आंत का एक हिस्सा काट दिया। सबकी आशंकाओं को धता बताते हुए वो बच गए। मानेकशॉ से जब पूछा गया कि क्या हुआ था? तो वो बोले गधे ने लात मार दी थी।

एक मोटरसाइकिल के बदले कब्जा लिया आधा पाकिस्तान

सैम मानेकशॉ से जुड़ा एक और किस्सा मशहूर है। दरअसल, 1971 युद्ध के दौरान याहया खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति थे। सैम मानेकशॉ और याहया खान पुराने दोस्त थे और आजादी से पहले एक साथ सेना में थे। उस वक्त मानेकशॉ के पास एक महंगी अमेरिकी मोटरसाइकिल थी। याहया खान को वह बाइक काफी पसंद थी।

बंटवारे के वक्त याहया खान ने मानेकशॉ से कहा कि नए बने पाकिस्तान में ऐसी बाइक शायद ही मिले। याहया खान ने 1000 रुपए के बदले वह बाइक खरीद ली। याहया खान बाइक लेकर तो चले गए, लेकिन मानेकशॉ को 1000 रुपए कभी दिए ही नहीं। समय बीतता गया और मानेकशॉ भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ बन गए। वही, याहया खान पाकिस्तान में तख्तापलट कर वज़ीर-ए-आला यानि राष्ट्रपति बन गए। पाकिस्तान के सरेंडर के बाद मानेकशॉ ने कहा कि याहया ने अपने आधे देश के साथ मेरी बाइक की कीमत अदा कर दी है।

जब इंदिरा को सताने लगा था सैम का डर

इंदिरा गांधी उस वक्त देश की प्रधानमंत्री थी और सैम मानेकशॉ सेना प्रमुख। एक दिन इंदिरा ने सैम को फोन कर पूछा, सैम बिजली हो? उन्होंने जवाब दिया, हां हूं, लेकिन इतना भी नहीं कि प्राइम मिनिस्टर से भी बात न कर सकूं। इंदिरा ने कहा, सैम, क्या तुम ऑफिस आ सकते हो अभी? सैम ने कहा, ठीक है, थोड़ी देर में आता हूं। फोन रखकर सैम अपने एडीसी से बोले, गर्ल वांट टू मीट मी।

बहरहाल, थोड़ी देर बाद सैम पीएमओ पहुंचे। इंदिरा गांधी ऑफिस में माथे पर हाथ रखकर बैठी थी। उन्होंने कहा, क्या हुआ मैडम? इंदिरा बोली, सुना है सैम तुम आर्मी के साथ तख्तापलट करने वाले हो, क्या ये बात सच है? सैम ने पूछा, आपको क्या लगता है मैडम प्राइम मिनिस्टर। इस पर इंदिरा ने कहा, नहीं तुम ऐसा नहीं करोगो सैम। वह मुस्कुराए और बोले, ‘आप मुझे इतना नाकाबिल समझती हैं कि मैं ये काम (तख्तापलट) भी नहीं कर सकता!’ सैम का जवाब सुनकर इंदिरा चुप हो गई।

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर चुप रहने के बाद सैम ने कहा, देखिये प्राइम मिनिस्टर, हम दोनों में कुछ तो समानताएं है। मसलन, हम दोनों की नाक लम्बी है पर मेरी नाक कुछ ज़्यादा लम्बी है आपसे। ऐसे लोग अपने काम में किसी का टांग अड़ाना पसंद नहीं करते। जब तक आप मुझे मेरा काम आजादी से करने देंगी, मैं आपके काम में अपनी नाक नहीं अड़ाउंगा।’इसके बाद इंदिरा ने जाकर राहत की सांस ली।

जब इंदिरा गांधी को कह दिया था, ‘I Am Always Ready Sweety’

कहा जाता है, 1971 की जंग से पहले जब इंदिरा गांधी ने उन्हें युद्ध के लिए कहा था तो उन्होंने इंदिरा गांधी का विरोध किया था और जंग के लिए मना कर दिया था। साथ ही जंग के लिए टाइम मांगा था। हालांकि साल 1971 की जंग उनके नेतृत्व में ही जीती गई थी। उस वक्त जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से पूछा था कि क्या लड़ाई की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं? इस पर मानेकशॉ ने तपाक से कहा था ‘I am always ready Sweety’। उस दौर में जब इंदिरा गांधी से लोग खौफ खाते थे तब सैम इंदिरा को बड़ी बेबाकी से जवाब देते थे।

‘तो 1971 की जंग जीत गया होता पाकिस्तान’

1971 की जंग में सबसे अहम भूमिका निभाने वाले सैम मानेकशॉ का एक और किस्सा मशहूर है। दरअसल, जीत के बाद एक पत्रकार ने उनसे सवाल पूछा कि यदि आप विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए होते, तो क्या भारत यह जंग जीत पाता। जैसी एक जनरल से उम्मीद की जा सकती है उन्होंने वैसा ही जवाब दिया। उन्होंने कहा, ‘और क्या होता, ये जंग पाकिस्तान जीत जाता।’