सुप्रीम कोर्ट ने PM मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट सेंट्रल विस्टा को दी हरी झंडी, जानें SC ने क्या कहा

Webvarta Desk: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट (Central Vista Project) को हरी झंडी मिल गई है। शीर्ष अदालत ने बहुमत से दिए फैसले में इसके लिए पर्यावरण क्लियरेंस और लैंड यूज को बदलने के लिए जारी नोटिफिकेशन को मंजूरी दे दी है।

केंद्र सरकार (Central Govt) ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट (Central Vista Project) की घोषणा की हुई है जिसके तहत संसद की नई बिल्डिंग का निर्माण किया जाना है। इसमें 900 से लेकर 1200 की संख्या में सांसद बैठ सकेंगे। ये प्रोजेक्ट अगस्त 2022 तक पूरा होगा।

दो जजों ने कहा ‘हां’, तो एक ने ‘ना’

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के तीन जजों की बेंच में 2 जजों ने बहुमत से दिए फैसले में पर्यावरण क्लियरेंस और लैंड यूज चेंज करने के नोटिफिकेशन को वैध ठहराया है। जस्टिस एएम खानविलकर की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि प्रोजेक्ट (Central Vista Project) की साइट पर एंटी स्मोक गन और स्मॉग टावर बनाए जाएं। तीसरे जज जस्टिस संजीव खन्ना ने बहुमत से अलग मत व्यक्त किया और पर्यावरण क्लियरेंस और लैंड यूज नोटिफिकेशन बहुमत के फैसले से विपरीत मत जाहिर किया।

दो जजों ने अपने फैसले में क्या कहा, जानें

जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस दिनेश महेश्वरी ने 2:1 के बहुमत से दिए फैसले में कहा कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई थी। अर्जी में प्रोजेक्ट के लैंड यूज बदले जाने के नोटिफिकेशन और पर्यावरण क्लीयरेंस को चुनौती दी गई थी।

अपने आदेश में दोनों जजों ने कहा कि सेंट्रल विस्टा कमिटी ने जो एनओसी दिया है उसमें कोई खामी नहीं है। साथ ही कहा कि दिल्ली अर्बन आर्ट कमिशन ने एक्ट के तहत जो एप्रूवल दिया है उसमें भी गड़बड़ी नहीं है। हेरिटेज कन्जर्वेशन कमिटी (एचसीसी) ने बिल्डिंग बॉयलॉज के तहत पहले से जो एप्रूवल दिया है वह भी सही है।

साथ ही आदेश में कहा गया है कि डीडीए एक्ट के तहत केंद्र सरकार ने जो अधिकार का इस्तेमाल किया वह सही है और उसमें कुछ भी गलत नहीं है और जो लैंड यूज को लेकर बदलाव किए और नोटिफिकेशन 20 मार्च 2020 को जारी किया है वह कन्फर्म किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ये भी कहा कि पर्यावरण क्लियरेंस के लिए एक्सपर्ट एप्रेजल कमिटी (ईएसी) ने जो सिफारिश की थी और पर्यावरण क्लियरेंस के लिए वन व पर्यावरण मंत्राललय ने जो मंजूरी दी है वह प्रोपर है और कानून के तहत है।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से दिए फैसले में ये भी कहा कि जहां प्रोजेक्ट हैं वहां स्मॉग टावर लगाया जाए। साथ ही इसकी क्षमता ‌उचित होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्मॉग गन भी कंस्ट्रक्शन साइट पर लगाएं। इसके अलावा वन और पर्यावरण मंत्रालय से ये भी कहा गया है कि वह आगे के प्रोजेक्ट्स के लिए स्मॉग टावर लगाने का निर्देश जारी करे।

जस्टिस खन्ना का अलग मत

तीसरे जस्टिस संजीव खन्ना ने बहुमत से अलग मत व्यक्त किया। पर्यावरण क्लियरेंस आदि के मामले में बहुमत के फैसले से असहमति जाहिर की। लैंडयूज के मामले में जस्टिस खन्ना ने कहा कि ये कानून के तहत खराब (बैड इन लॉ) है। इस मामले में पब्लिक को नहीं जोड़ा गया।

उन्होंने कहा कि सरकार को इस प्रोजेक्ट के लेआ‌उट के बारे में जानकारी पब्लिक डोमेन में देना चाहिए। अथॉरिटी इसके लिए सात दिनों में पब्लिक डोमेन में जानकारी दे और पेपर में इस बारे में विज्ञापन दे। किसी को अगर कोई ऑब्जेक्शन है या सुझाव है तो वह चार हफ्ते में दे सकता है। फिर उस सुझाव को एचसीसी के सामने रखा जाए और फिर एचसीसी उस पर अपना फैसला ले और कारण सहित अवगत कराए। साथ ही पर्यावरण क्लियरेंस संबंधित मिनिस्ट्री के 17 जून 2020 का आदेश खारिज किया जाता है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की क्या रही दलील

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 20 हजार करोड़ के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के सरकार के पैसे की बचत होगी। इस प्रोजेक्ट पर लगने वाले पैसे से पैसे की बर्बादी नहीं बल्कि पैसे बचेंगे।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा था कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद सरकार का हर साल एक हजार करोड़ रुपये बचेंगे। अभी केंद्र सरकार की मिनिस्ट्री 10 इमारतों में चल रही है। साथ ही कहा कि मौजूदा संसद भवन आग के गंभीर समस्या का सामना कर रहा है और साथ ही जगह की भी कमी है। इस प्रोजेक्ट के तहत जो भी हेरिटेज इमारतें हैं उन्हें संरक्षित रखा जाएगा।

आजादी से पहले बना अभी का संसद भवन

सरकार ने अपनी दलील में कहा कि अभी जो संसद भवन है वह आजादी से पहले 1927 में बनाया गया था। अभी वहां जगह का अभाव है जॉइंट सेशन में प्लास्टिक तक की कुर्सियां लगानी पड़ती है और कहीं न कहीं ये गरिमा को ठेस पहुंचाता है। 2022 तक नए संसद भवन बनाने का डेडलाइन है और संसद का मालिकाना हक लोकसभा सेक्रेटेरियट के पास ही रहेगा।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार ने सही ठहराया है और कहा है कि इससे लोगों का जीवन आसान होगा और सभी मुख्य मिनिस्ट्री केंद्रीय इलाके में होंगे। मौजूदा संसद भवन 100 साल पुराना हो चुका है और नई बिल्डिंग बनेगी तो तमाम मानकों को पूरा करेगी। दिल्ली भूकंप के जोन 4 में है और नई बिल्डिंग उसके अनुरूप बनेगी।

ऐतिहासिक धरोहर को नहीं हटाया जाएगा

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा था कि नई पार्लियामेंट और सेंट्रल सेक्रेटेरियट बनाने में किसी भी ऐतिहासिक धरोहर (हेरिटेज बिल्डिंग) को नहीं हटाया जाएगा और न ही कोई पेड़ काटे जाएंगे। सारे दफ्तर सेंट्रल इलाके में होंगे इससे एग्जेक्युटिव के कार्यक्षमता में इजाफा होगा और लोगों का जीवन आसान होगा। कुल 51 मिनिस्ट्री 10 बिल्डिंग में होंगी।

केंद्र सरकार ने कहा था कि नया संसद भवन मौजूदा पार्लियामेंट के बगल में साढ़े 9 एकड़ जमीन पर बनेगा। लोग तीन किलोमीटर अंडरग्राउंड शटल से जा सकेंगे। नए पार्लियामेंट बिल्डिंग में लोकसभा में 876 और राज्यसभा में 400 सदस्यों की जगह होंगी। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत तीन किलोमीटर के दायरे में नई संसद की बिल्डिंग से लेकर और कई सरकारी इमारतें बननी है।

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि नए बिल्डिंग का कंस्ट्रक्शन में कानूनी प्रक्रिया का पालन होगा। नई बिल्डिंग के लिए पर्यावरण, पेड़ व ट्रैफिक आदि के प्रभाव से संबंधित गाइडलाइंस का पालन होगा। इस परियोजना के लिए किसी भी पेड़ को नहीं काटा जाएगा बल्कि पेड़ों का ट्रांसप्लांटेशन यानी एक जगह से दूसरी जगह लगाया जाएगा।