दिवाली पर मुकेश अंबानी दे रहे कामाख्या मंदिर को 19 किलो सोना, ये हैं वजह

New Delhi: रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani Donate 19kg Gold to Kamakhya Temple) इस साल दिवाली के पर्व पर असम में स्थित कामाख्या मंदिर में 19 किलो सोने के तीन कलश दान में देने वाले हैं। सोने से भरे तीन कलश मंदिर की गुंबद में लगाए जाएंगे।

अंबानी परिवार ने इससे पहले बदरीनाथ-केदारनाथ समेत 51 मंदिरों को पांच करोड़ रूपए दान स्वरूप दिए थे। इस बार दिवाली के मौके पर कामाख्या मंदिर (Mukesh Ambani Donate 19kg Gold to Kamakhya Temple) को यह दान दिया जा रहा है। कोरोना काल में मंदिर को बंद कर दिया गया था लेकिन 12 अक्टूबर को इसे फिर से खोल दिया गया है। आइए जानते हैं कामाख्या मंदिर के बारे में खास बातें

कामदेव का भी कहा जाता है क्षेत्र

देवी भगवती के 51 शक्तिपीठों में एक कामाख्या शक्तिपीठ (Kamakhya Temple) है। यहां पर देवी सती का योनी भाग गिरा था, इसलिए इस क्षेत्र को कामक्षेत्र, कामरूप यानी कामदेव का क्षेत्र भी कहा जाता है। जिस स्थान पर माता सति का अंग गिरा था, वहां कामाख्या देवी का प्राचिन मंदिर स्थित है। यह मंदिर गुवहाटी से 8 किमी. दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर अलौकिक शक्ति और तंत्र सिद्धि का प्रमुख स्थल माना जाता है।

इस तरह पड़ा अंबुवाची नाम

कामाख्या शक्तिपीठ (Kamakhya Temple) में हर साल जून महीने में लगने वाला अंबुबाची मेला काफी प्रसिद्ध है। इस मेले में बड़ी संख्या देश के कोने-कोने से तांत्रिक और साधु-संत पहुंचते हैं। मान्यता है कि तीन दिनों तक मेले के दौरान मंदिर का दरवाजा बंद हो जाता है।

बताया जाता है कि इन तीन दिनों में देवी रजस्वला रहती हैं। तीन के बाद स्नान व पूजा के बाद मंदिर के द्वार फिर से भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। इसके बाद प्रशाद वितरण का कार्यक्रम शुरू होता है। प्रशाद के रूप में भक्तों को उस दौरान गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अंबुवाची वस्त्र कहते हैं। इसी वजह से मेला का नाम अंबुवाची पड़ा।

सतयुग में 16 साल बाद लगता था अंबुबाची मेला

कामाख्या मंदिर में रजस्वला के दौरान मां की प्रतिमा के पास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है और तीन बाद मंदिर का दरवाजा जब खुलता है, तब वह सफेद कपड़ा मां के रज से लाल हो जाता है। बताया जाता है कि द्वापर में 12 साल बाद और त्रेतायुग में 7 साल बाद और सतयुग में 16 साल बाद अंबुबाची के पर्व का आयोजन होता था। वहीं कलयुग में हर साल अंबुबाची मेला लगता है।

शक्तिपीठ के पास ही स्थित है भैरव का मंदिर

कामाख्या शक्तिपीठ के पास कुछ ही दूरी पर उमानंद भैरव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के पास है। कहा जाता है कि बिना इनके दर्शन के कामाख्या की यात्रा अधूरी रहती है। उमानंद वही तीर्थ स्थल है, जहां समाधि में लीन भोलेनाथ पर कामवाण चलाया गया था और समाधी से जाग्रत होने पर शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया था। मां कामाख्य के आशीर्वाद से कामदेव को नया जन्म मिला और यह क्षेत्र कामरूप क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

मंदिर में स्थित हैं 16 महाविघाएं

कामाख्य मंदिर में देवी की पूजा भगवान शिव की नववधू के रूप में की जाती है। त्रिपुर सुंदरी और माता काली के बाद कामाख्य मंदिर तांत्रिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थल है। मंदिर के गर्भगृह में माता की कोई मूर्ति नहीं है, यहां समतल स्थान पर चट्टान के बीच देवी की योनी भाग को दर्शाया गया है।

एक प्राकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीली रहती है। इस झरने के जल को काफी चमत्कारी और शक्तिशाली माना जाता है। मंदिर के परिसर में दस महाविघा को समर्पित है। ये महाविघा- मातंगी, कामाला, भैरवी, काली, धूमावति, त्रिपुर सुंदरी, तारा, बगुलामुखी, छिन्नमस्ता और भुवनेश्वरी हैं।

16वीं शताब्दी में करवाया था मंदिर का निर्माण

कामाख्य मंदिर के बारे में बताया जाता है कि जो साधना कहीं नहीं फलती, वह यहां आकर साकार हो जाती है। जो प्रार्थना कहीं नहीं पूरी होती, वो यहां आकर पूर्ण हो जाती है। कामाख्या शक्तिपीठ को कौमरी तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है। इस तीर्थ को वाममार्ग साधना का सर्वोच्छ पीठ माना जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा विश्वसिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर की खुदाई के दौरान कामदेव द्वारा बनवाए मूल मंदिर का हिस्सा मिला था। राजा ने उसी मंदिर के ऊपर नया मंदिर बनवा दिया।

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