शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा: भारतीय सेना का वो ‘शेरशाह’ जिसे पाकिस्तान भी नहीं भूला

New Delhi: Vikram Batra| कारगिल (Kargil) की लड़ाई बार्डर पर लड़ी जा रही थी, लेकिन इंडियन आर्मी (Indian Army) के इस अफसर का खौफ पाकिस्तान (Pakistan) के अंदर तक था। इसका जीता-जागता सबूत था लड़ाई के दौरान वायरलैस पर पकड़ी गई पाक सेना की बातचीत।

बाद में लड़ाई खत्म होने के बाद इस जांबाज़ अफसर को बहादुरी के सबसे बड़े सम्मान परमवीर चक्र (paramveer chakra) से भी नवाज़ा गया था। यह अफसर थे यह दिल मांगे मोर के नाम से युवाओं के दिल-दिमाग में जगह बनाने वाला कैप्टन विक्रम बत्रा (Vikram Batra)।

कैप्टन विक्रम बत्रा के शहीदी दिवस के मौके पर हम आपको एक ऐसे वीर जवान के बारे में बताने जा रहे है, जिसनें कहा था ‘लहराते तिरंगे के पीछे आऊंगा या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगा’

देवभूमि हिमाचल में हुआ था जन्म

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में जन्मे विक्रम बत्रा पढ़ाई खत्म करने के बाद ही सेना में आ गए थे। ट्रेनिंग पूरी करने के 2 साल बाद ही उन्हें लड़ाई के मैदान में जाने का मौका मिला था। उनके हौसले और कद-काठी को देखते हुए उन्हें कोड नाम शेरशाह दिया गया था।

ये ही वो शेरशाह था जिसके मुंह से ये दिल मांगे मोर सुनकर ही दुश्मन समझ जाया करते थे कि ये शांत बैठने वाला नहीं है। उनके पिता जीएल बत्रा बताते हैं कि आज भी पाकिस्तान में विक्रम बत्रा को शेरशाह के नाम से याद किया जाता है।

कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) जो कारगिल की लड़ाई में 07 जुलाई 1999 को देश पर न्यौछावर हो गए। लेकिन उनकी बाते अदम्य साहस और वीरता को सुनकर आज भी हमारी रगों में जोश भर देती हैं।

मात्र 24 साल की उम्र में शहीद हुए कैप्टन बत्रा

कारगिल की लड़ाई में 24 साल के कैप्टन विक्रम बत्रा (Captain Vikram Batra) को प्वाइंट 5140 के बाद आर्मी ने प्वाइंट 4875 को भी कब्जे में लेने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उंचाई पर बैठे पाकिस्तानी अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। लेकिन भारतीय सेना जज्बे से लबरेज थी। लेफ्टिनेंट अनुज नैय्यर के साथ कैप्टन बत्रा ने 8 पाकिस्तानी सैनिकों को मौत को ढेर कर दिया।

विक्रम बत्रा भारतीय सेना के वो ऑफिसर थे, जिन्होंने कारगिल युद्ध में अभूतपूर्व वीरता का परिचय देते हुए वीरगति प्राप्त की। जिसके बाद उन्हें भारत के वीरता सम्मान परमवीर चक्र से भी सम्मानित किया गया। आइए जानते उनकी वीरता के वो किस्से, जिन्हें आज भी देश याद रखता है।

जुड़वा भाई के साथ बीता बचपन, देश के नाम की जवानी

पालमपुर में जी.एल. बत्रा और कमलकांता बत्रा के घर 9 सितंबर 1974 को दो बेटियों के बाद दो जुड़वां बच्चों का जन्म दिया। उन्होंने दोनों का नाम लव-कुश रखा। लव यानी विक्रम और कुश यानी विशाल। शुरुआती पढ़ाई के लिए विक्रम किसी स्कूल में नहीं गए थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई थी और उनकी टीचर थीं उनकी मां।

19 जून, 1999 को कैप्टन विक्रम बत्रा की लीडरशिप में इंडियन आर्मी ने घुसपैठियों से प्वांइट 5140 छीन लिया था। ये बड़ा इंपॉर्टेंट और स्ट्रेटेजिक प्वांइट था, क्योंकि ये एक ऊंची, सीधी चढ़ाई पर पड़ता था। वहां छिपे पाकिस्तानी घुसपैठिए भारतीय सैनिकों पर ऊंचाई से गोलियां बरसा रहे थे।

साथी की जान बचाते हुए पाई शहादत

इसे जीतते ही विकम बत्रा अगले प्वांइट 4875 को जीतने के लिए चल दिए, जो सी लेवल से 17 हजार फीट की ऊंचाई पर था और 80 डिग्री की चढ़ाई पर पड़ता था। उन्होंने बहुत नज़दीक से हमला करके तीन दुश्मनों को मार गिराया था और इस क्रम में वे बुरी तरह घायल भी हो गए थे। हालांकि उनके चोटों से बेपरवाह वे लगातार लड़ते रहे।

7 जुलाई 1999 को उनकी मौत एक जख्मी ऑफिसर को बचाते हुए हुई थी। इस ऑफिसर को बचाते हुए कैप्टन ने कहा था, ‘तुम हट जाओ। तुम्हारे बीवी-बच्चे हैं।’अक्सर अपने मिशन में सक्सेसफुल होने के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा जोर से चिल्लाया करते थे, ‘ये दिल मांगे मोर।’

उनके साथी नवीन, जो बंकर में उनके साथ थे, बताते हैं कि अचानक एक बम उनके पैर के पास आकर फटा। नवीन बुरी तरह घायल हो गए। पर विक्रम बत्रा ने तुरंत उन्हे वहां से हटाया, जिससे नवीन की जान बच गई। पर उसके आधे घंटे बाद कैप्टन ने अपनी जान दूसरे ऑफिसर को बचाते हुए खो दी।

पाकिस्तानी सेना भी मानती है ‘शेरशाह’ का लोहा
  • कैप्टन विक्रम बत्रा की बहादुरी के किस्से भारत में ही नहीं सुनाए जाते, पाकिस्तान में भी विक्रम बहुत पॉपुलर हैं। पाकिस्तानी आर्मी भी उन्हें शेरशाह कहा करती थी। विक्रम बत्रा की 13 JAK रायफल्स में 6 दिसम्बर 1997 को लेफ्टिनेंट के पोस्ट पर जॉइनिंग हुई थी।
  • दो साल के अंदर ही वो कैप्टन बन गए। उसी वक्त कारगिल वॉर शुरू हो गया। 7 जुलाई, 1999 को 4875 प्वांइट पर उन्होंने अपनी जान गंवा दी, पर जब तक जिंदा रहे, तब तक अपने साथी सैनिकों की जान बचाते रहे।
  • कैप्टन विक्रम बत्रा की बहादुरी के किस्से भारत में ही नहीं सुनाए जाते, पाकिस्तान में भी विक्रम बहुत पॉपुलर हैं। पाकिस्तानी आर्मी भी उन्हें शेरशाह कहा करती थी।