Gandhi Jayanti: अहिंसा का वह पुजारी.. जिसने बिना हथि’यार के भारत को दिलाई आजादी

New Delhi: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की आज 151वीं जयंती (Gandhi Jayanti) है। सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में महात्मा गांधी की 151वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। महात्मा गांधी एक ऐसे महापुरुष थे, जिन्हें किसी चीज से ड’र नहीं लगता था। वह हर किसी के दिल से डर निकालने की हमेशा कोशिश करते थे।

बस वह एक चीज से डरते थे कि लोग उन्हें भगवान ना बना दें। इसी डर से उन्होंने एक बार कहा था, ‘आई हैव नो मैसेज़ फॉर द वर्ल्ड. बट माई लाइफ़ इज़ माइ मैसेज़’ यानि दुनिया के लिए मेरे कोई संदेश नहीं है, बस मेरा जीवन ही एक संदेश है। तो चलिए उनकी जयंती पर जानते हैं उस महापुरुष के बारे में जिसने बिना किसी हथियार के अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया।

महात्मा गांधी का जीवन परिचय

महात्मा गांधी का जन्म गुजरात के तटीय क्षेत्र पोरबंदर में 1 अक्टूबर 1869 को हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी ब्रिटिश सरकार के अधीन गुजरात के काठियावाड की छोटी सी रियासत पोरबंदर के प्रधानमंत्री थे। मां पुतलीबाई और पिता करमचंद गांधी ने अपने बेटे का नाम रखा मोहनदास करमचंद गांधी।

बालक मोहनदास करमचंद गांधी की मां भक्तिभाव में लीन रहती थी, जिसका सकारात्मक प्रभाव उन पर भी पड़ा। शाकाहारी खाना, आत्मा की शुद्धि के लिए व्रत रखना और कमजोरों की मदद करना गांधी जी ने बचपन में ही शुरू कर दिया था।

गांधी जी की शिक्षा

1887 में बंबई विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी आगे की शिक्षा के लिए भावनगर आ गए और यहां के शामलदास स्कूल में एडमिशन लिया। गांधी जी एक औसत छात्र थे, लेकिन फिर भी उनका परिवार उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहता था। 4 सितंबर 1888 को मोहनदास करमचंद गांधी लंदन पहुंचे और यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में एडमिशन लिया।

लंदन में शिक्षा प्राप्त करने के दौरान गांधी जी ने शाकाहार का नियम बनाए रखा। यहां उन्होंने अपने जैसे शाकाहारी लोगों की खोज की और थियोसोफिकल नामक सोसाइटी के कुछ मुख्य सदस्यों से मुलाकात की।

यहां से अपनी वकालत पूरी करने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी बंबई लौट और अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। बंबई में सफलता नहीं मिली और रोजी-रोटी चलाने के लिए उन्होंने शिक्षक के पद पर काम करने की अर्जी डाली, लेकिन वह भी खारिज हो गई।

जब कमाई का कोई साधन नहीं दिखा, तो उन्होंने कोर्ट परिसर में मुकदमों की अर्जियां लिखना शुरू किया। कुछ ही समय बाद उन्हें यह काम भी छोड़ना पड़ा। इस बीच 1893 में ब्रिटिश सरकार की फर्म नेटल के साथ गांधी जी ने एक साल का करार किया और दक्षिण अफ्रीका चले गए।

जब दक्षिण अफ्रीका में हुआ अपमान

दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत के दौरान उन्हें अपमान का सामना करना पड़ा। इस अपमान का मोहनदास करमचंद गांधी पर ऐसा प्रभाव पड़ा, जिसने उन्हें महात्मा बना दिया। दरअसल, गांधी जी प्रथम श्रेणी के कोच की टिकट लेकर ट्रेन में यात्रा कर रहे थे।

इसी दौरान कुछ यूरोपिय लोग वहां पहुंचे और उन्हें तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने को कहा। मोहनदास करमचंद गांधी ने इससे साफ इंकार कर दिया। बदले में अंग्रेजों ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें उठाकर कोच से बाहर फेंक दिया।

गांधी जी ने अपनी इस यात्रा के दौरान बहुत अपना सहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। यहां तक कि इस घटना के बाद दक्षिण अफ्रीका के कई होटलों में उनकी एंट्री बैन कर दी गई।

इतिहास में इस घटना के बाद एक और घटना का जिक्र है, जिसने उनके हृदय में गहरा प्रभाव डाला। दक्षिण अफ्रीका में वकालत के दौरान कोर्ट में जज ने उनसे पगड़ी उतारने को कहा। भारतीय के साथ हो रहे इस अन्याय ने गांधी जी को झकझोर कर रख दिया और उसी दिन उन्होंने अपना जीवन भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ कदम उठाने के लिए समर्पित कर दिया।

गांधी का पारिवारिक जीवन

महात्मा गांधी का विवाह 1883 में कस्तूरबा गांधी से हुआ। शादी के वक्त मोहनदास करमचंद गांधी साढ़े तेरह वर्ष और कस्तूरबा गांधी 14 वर्ष की थी। उनका बाल विवाह माता-पिता ने ही तय किया था। चूंकि कस्तूरबा गांधी उनसे बड़ी थी, इसलिए गांधी जी उन्हें ‘बा’ कहकर बुलाते थे। जब गांधी जी 15 साल के हुए तो उनकी पहली संतान का जन्म हुआ। इसके कुछ ही समय बाद उनके पिता करमचंद गांधी चल बसे। कस्तूरबा गांधी और महात्मा गांधी के चार पुत्र हुए जिनके नाम हरिलाल गांधी, मणिलाल गांधी, रामदास गांधी और देवदास गांधी रखा गया।

मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा गांधी बनने तक का सफर
  • 1916 में गांधी जी ने भारत लौटने के बाद स्वतंत्रता के लिए प्रयास शुरू किए। महात्मा गांधी को पहली उपलब्धि 1918 में चंपारण में मिली जहां उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन छेड़ा।
  • नील की खेती पर बेहिसाब कर और अंग्रेजों के जुल्म पर गांधी जी ने आवाज उठाई। इसके साथ ही गंदगी की वजह से कई बीमारियां फैल रही थी।
  • इसी तरह का हाल गुजरात के खेड़ा में भी था, जहां गांधी जी ने अपना आश्रम बनाया। यहां कई लोग उनसे जुड़े और अपनी इच्छा से लोगों की सेवा करने लगे।
  • गांधी जी ने वहां साफ सफाई के साथ स्कूल और अस्पताल बनवाए, जिससे लोगों के मन में एक विश्वास उत्पन्न हुआ। अंग्रेजों को पता चला तो वह गांधी जी को उठाकर थाने ले गए।
  • यह गांधी जी की निस्वार्थ सेवा का ही असर था कि हजारों की संख्या में उन्हें छुड़ाने के लिए ग्रामीण थाने पहुंचे और धरने पर बैठ गए। आखिर में पुलिस को बिना किसी कार्रवाई के उन्हें छोड़ना पड़ा।
  • महात्मा गांधी के इन प्रयासों को देख गुरु रबिंद्रनाथ टैगोर इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गांधी जी को महात्मा कहकर पुकारा। बस उसी दिन से मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा गांधी बन गए।
हिंदु-मुस्लिमों के बीच एकता की कोशिश

कुछ ही समय बाद महात्मा गांधी ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच पटी खाई को पाटना शुरू किया। उन्होंने दोनों समाज की एकता पर जोर दिया, क्योंकि दोनों समाज में एकता की कमी को अंग्रेज अपनी ताकत मान रहे थे। गांधी जी चाहते थे कि हिंदू और मुस्लिम एकसाथ मिलकर ऐसी ताकत बन जाए, जिससे अंग्रेज सरकार को आसानी से हटाया जा सके।

इसी उम्मीद को लेकर गांधी जी मुस्लिम समाज के पास गए और इसे आंदोलन के रूप में चलाया। इसी दौरान गांधी जी की पहल पर ऑल इंडिया मुस्लिम कांफ्रेंस की स्थापना हुई। गांधी जी मुस्लिम कांफ्रेंस के प्रमुख भी रहे। दोनों समाजों को एक करने की इसी कोशिश के कारण उन्हें राष्ट्रीय नेता बना दिया।

हालांकि, एक-दो सालों बाद ही गांधी जी द्वारा खड़ी की गई एकता की इस दीवार पर दरारें पड़ने लगी और इसी वजह से 1922 तक खिलाफत आंदोलन पूरी तरह बंद हो गया।

महात्मा गांधी के आंदोलन
  • अहिंसा के पुजारी रहे महात्मा गांधी 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू किए गए रॉयल एक्ट के विरोध में खड़े हुए। गांधी जी ने कई जगह सभाएं आयोजित की। इन्हीं में से एक सभा जलियांवाला बाग में हुई, जहां जनरल डायर ने अंग्रेज सैनिकों की मदद से भीषण नरसंहार मचाया। गांधी जी इस सभा में मौजूद नहीं थे, लेकिन भीषण नरसंहार ने उन्हें झकझोर कर रख दिया।
  • अंग्रेजों के नरसंहार का जवाब देने के लिए 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन के तहत अंग्रेजों को किसी भी तरह सहायता न करने का फैसला किया गया। इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि पूरे आंदोलन में किसी भी तरह की हिंसा का प्रयोग नहीं किया गया। करीब दो साल तक चले असहयोग आंदोलन की वजह से अंग्रेजों को काफी नुकसान उठाना पड़ा।
  • असहयोग आंदोलन के दौरान भारतीयों ने अपनी नौकरियां छोड़ दी। बच्चों को सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और फैक्ट्रियों से निकाल लिया। हाल ये हो गया कि अंग्रेजों के पांव जमीन से उखड़ने लगे। कहा जाता है कि भारत उसी समय आजाद हो जाता, अगर उस वक्त चौरा-चौरी की घटना ना होती।
  • दरअसल, यूपी के चौरा-चौरी में शांतिपूर्ण रैली के दौरान अंग्रेज सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियां चला दी। इस घटना में कई लोग मारे गए। गुस्साई भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा और 22 अंग्रेज जलकर मर गए।
  • गांधी जी का कहना था कि वह इस आंदोलन में हिंसा नहीं करेंगे, लेकिन गुस्साई भीड़ द्वारा 22 अंग्रेज सैनिकों की हत्या के कारण उनका मन बदल गया। उन्होंने कहा, ‘हमें इस आंदोलन के दौरान हिंसा का इस्तेमाल नहीं करना था, लेकिन आप नहीं माने। हम अभी किसी भी प्रकार से आजादी के लायक नहीं हुए हैं।‘ इन शब्दों के साथ महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन समाप्त कर दिया।
और फिर शुरू हुआ दांडी मार्च

वर्ष 1930 में अंग्रेजी हुकूमत एक बार फिर भारत में अपने पांव मजबूत कर चुकी थी। ब्रिटिश सरकार ने उस दौर में एक नियम बनाया कि कोई भारतीय व्यक्ति या कंपनी नमक नहीं बनाएगी। गांधी जी इसके खिलाफ खड़े हुए और 12 मार्च 1930 को दांड़ी मार्च शुरू किया।

गुजरात के दांडी में उन्होंने नमक बनाया, जो ब्रिटिश सरकार के ताजा कानून का उल्लंघन था। 400 किलोमीटर लंबे दांडी मार्च में हजारों लोग गांधी जी के साथ शामिल हुए। 6 अप्रैल 1930 गांधी जी ने दांडी मार्च समाप्त किया। आंदोलन के दौरान करीब 80 हजार लोगों को जेल जाना पड़ा।

1931 में महात्मा गांधी और लार्ड एडवर्ड इरविन ने एक संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद कर दिया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन

40 के दशक में हर भारतीय अंग्रेजों के जुल्मों से परेशान हो चुका था। उनके भीतर आजादी की लहर हिलोरें मारने लगी थी। लोगों के भीतर आजादी का जज्बा और अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा देख महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। 1942 में असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था।

बड़ों से लेकर बच्चे भी इस आंदोलन से जुड़े, लेकिन कुछ छोटी-छोटी गलतियों की वजह से आंदोलन असफल हो गया। हालांकि, भारतीयों के इस जोश ने ब्रिटिश सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्हें पता चल गया कि ज्यादा समय पर वह भारत पर राज नहीं कर सकते।

इसके बाद गांधी जी और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की और आखिरकार अंग्रेजों ने भारत छोड़ने का फैसला किया। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ।

जाते-जाते भी अंग्रेजी हुकूमत अपनी हरकतों से बाज नहीं आई और भारत के विभाजन का फैसला कर दिया। कहा जाता है कि विभाजन के वक्त महात्मा गांधी ने कहा था कि जो मुस्लिम पाकिस्तान जाना चाहता है खुशी से जा सकता है, लेकिन जो यहां रहना चाहता है, वह यहीं रह सकता है।

नाथूराम गोडसे और महात्मा गांधी की ह’त्या

गांधी जी का यह कहना उस समय कुछ कट्टर हिंदूवादियों को नहीं भाया। 30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिड़ला भवन में गांधी जी प्रार्थना सभा में मौजूद थे। इसी दौरान नाथूराम गोडसे वहां पहुंचा और उसने महात्मा गांधी को तीन गोली मा’र दी। भारत के विभाजन और देश को कमजोर बनाने के लिए महात्मा गांधी को दोषी मानते हुए गोडसे ने इस ह’त्याकांड को अंजाम दिया।

नाथूराम गोडसे समेत आठ लोगों पर मुकदमा चला। नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को गांधी जी की ह’त्या का दो’षी पाया गया और 15 नवंबर, 1949 को उन्हें फां’सी दे दी गई। जबकि तीन आरोपियों को आजीवन कारावास और बाकी 2 आरो’पियों को बरी कर दिया गया। सबसे खास बात कि विनायक दामोदर सावरकर जो देश के बड़े स्वतंत्रता सेनानी थी उन्हें भी गांधी जी की ह’त्या के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन कोर्ट ने वह निर्दो’ष सिद्ध हुए और उन्हें बरी कर दिया गया।

आखिरी शब्द थे ‘हे राम’

गांधी जी की ह’त्या के बाद राजघाट पर उनका स्मारक बनाया गया, जहां ‘हे राम’ लिखा हुआ है। गोली लगने के बाद महात्मा गांधी के मुंह से निकले ये आखिरी शब्द थे। 12 फरवरी 1948 को इलाहबाद संगम में उनकी अस्थियां विसर्जित की गई।

गांधी जी की अस्थियों का एक कलश संभाल कर रखा गया, जिसे 1997 में उनके प्रपौत्र तुषार गांधी ने कोर्ट के माध्यम से हासिल कर इलाहबाद संगम में विसर्जित किया।

महात्मा गांधी का जीवन सादा और विचार उच्च थे। उन्हें अहिंसा में विश्वास था। वह मानते थे कि हर समस्या का हल बिना क्रोध के ठंडे दिमाग से निकालने की कोशिश करनी चाहिए। देश की आजादी के लिए गांधी जी ने हमेशा अंहिसा का सहारा लिया। कभी कोई हथियार नहीं उठाया, बेइज्जती होने पर भी क्रोध उनपर हावी नहीं हुआ।

उनका कहना था –

“आंदोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान,

यातनापूर्ण बहिष्कार, यहां तक की मौ’त भी सहने को तैयार हूँ|”

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