राम मंदिर भूमिपूजन कलः जानें कैसी थी वाल्मीकि की अयोध्या? कैसा था तुलसी के कौसलपुरी का वैभव

New Delhi: राम की कीर्ति ध्वजा को दुनिया के कोने-कोने में ले जाने के लिए भारत वर्ष के दो कवियों वाल्मीकि और तुलसीदास ने दो महान ग्रंथों की रचना की। इन ग्रंथों के शब्द बिंब, वाक्य विन्यास से राम और रामनगरी अयोध्या करोड़ों लोगों के मन में जीवंत हो उठी।

अब राम मंदिर निर्माण के लिए सैकड़ों साल बाद अवधपुरी का फिर से श्रृंगार हुआ है। अयोध्या में रामलला के जन्मस्थान पर कल मंदिर निर्माण की नींव रखी जाएगी। इस मौके पर हम आपको ले चलते हैं हजारों साल पुरानी अयोध्या। वो अयोध्या जिसका वर्णन रामायण में वाल्मीकि में दिया है।

तुलसी की कल्पनाशीलता की अयोध्या जो रामचरित मानस में वर्णित है। कैसा था वो नगर, जिसमें राजा राम बसते थे, जिस नगर में गांधी के सपनों का राम राज्य प्रस्फुटित हुआ था।

रामायण के बालकांड के पांचवें सर्ग में महर्षि वाल्मीकि ने अयोध्यापुरी के वैभव और भव्यता का विस्तार से चित्रण किया है।

वाल्मीकि अनुसार इसे मनु ने बसाया था। वाल्मीकि लिखते हैं सरयू नदी के तट पर संतुष्ट जनों से पूर्ण धनधान्य से भरा-पूरा, उत्तरोत्तर उन्नति को प्राप्त कोसल नामक एक बड़ा देश था।

कोसलो नाम मुदित: स्फीतो जनपदो महान। निविष्ट: सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान्।।

वाल्मीकि ने सरयू नदी के तट पर स्थित इस नगरी का वर्णन बड़े ही भक्तिभाव से किया है। अगले श्लोक में वाल्मीकि लिखते हैं, “इसी देश में मनुष्यों के आदिराजा प्रसिद्ध महाराज मनु की बसाई हुई तथा तीनों लोकों में विख्यात अयोध्या नामक एक नगरी थी।

अयोध्या के विस्तार की चर्चा करते हुए वाल्मीकि कहते हैं कि यह महापुरी बारह योजन (96 मील) चौड़ी थी। इस नगर में सुंदर लंबी और चौड़ी सड़कें हुआ करती थी।

रामलला के मंदिर निर्माण पर भले ही आज अयोध्या को आलोकित, प्रकाशित और सुवासित किया जा रहा है। लेकिन राजा दशरथ की इस नगरी में हजारों साल पहले ये व्यवस्था थी। वाल्मीकि कहते हैं, “वह पुरी चारों ओर फैली हुई बड़ी-बड़ी सड़कों से सुशोभित थी। सड़कों पर नित्‍य जल छिड़का जाता था और फूल बिछाए जाते थे। अयोध्या की महिमा बताते हुए वाल्मीकि कहते हैं कि महाराज दशरथ अपने नगर में उसी साज सज्जा और ठाठ-बाट से रहते हैं जिस तरह स्वर्ग में इंद्र वास करते हैं।

अयोध्या की सुरक्षा के बारे में बताते हुए वाल्मीकि कहते हैं कि यह नगरी दुर्गम किले और खाई से युक्‍त थी तथा उसे किसी प्रकार भी शत्रुजन अपने हाथ नहीं लगा सकते थे। हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्‍चर सभी जगह-जगह दिखाई पड़ते थे। नगर की सुरक्षा के लिए चतुर शिल्पियों द्वारा बनाए हुए यंत्र और शस्त्र रखे हुए थे।

महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि इस नगर में सूत, मागध बंदीजन भी रहते थे, यहां के निवासियों के अतुल धन संपदा थी। इसमें बड़ी-बड़ी ऊंची अटारियों वाले मकान थे जो ध्वजा, पताकाओं से शोभित रहते थे, और परकोटे की दीवारों पर सैकड़ों शतघ्नि (तोपें) चढ़ी हुई थी।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में अयोध्या की स्त्रियों का वर्णन किया है। वाल्मीकि लिखते हैं कि इस शहर में महिलाएं स्वतंत्र रूप से विचरण करती थीं, इस शहर में केवल महिलाओं के ही कई नाट्य समूह थे। राजभवनों का रंग सुनहला था। नगर में सुंदर स्वरूपवती स्त्रियां रहती थी।

आज जब हमारे देश के अधिकतर शहर प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं तो अयोध्या का उदाहरण अनुकरणीय जान पड़ता है। महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि अयोध्या नगरी के कुओं का जल ऐसा था मानों कुएं में गन्ने का रस भरा हुआ हो। वे लिखते हैं।

गृहगाढामविच्छिद्रां समभूमौ निवेशिताम् । शालितण्डुलसम्पूर्णामिक्षुकाण्डरसोदकाम् ।।

अर्थात उसमें चौरस भूमि पर बड़े मजबूत और सघन मकान अर्थात बड़ी सघन बस्‍ती थी। कुओं में गन्‍ने के रस जैसा मीठा जल भरा हुआ था।

महर्षि वाल्मीकि की अयोध्या अपने जमाने की सर्वोत्तम नगरी थी। पूरी वसुधा में अयोध्या के टक्कर की कोई नगरी नहीं थी। वो लिखते हैं, “नगाड़े, मृदंग, वीणा, पनस आदि बाजों की ध्‍वनि से नगरी सदा प्रतिध्‍वनित हुआ करती थी। पृथ्‍वी तल पर तो इसकी टक्‍कर की दूसरी नगरी थी ही नहीं।”

महर्षि वाल्मीकि और तुलसीदास के बीच का कालखंड का ठीक-ठीक आकलन हम नहीं लगा सकते। क्योंकि महर्षि वाल्मीकि तो छोड़ दीजिए, तुलसीदास के जन्मस्थान और तिथि को लेकर मतभेद है। फिर भी विद्वानों और धर्मगुरुओं ने सहमति से तुलसीदास का जन्म संवत 1554 में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को माना है।

जबकि वाल्मीकि तो कालातीत से नजर आते हैं। रामायण ग्रंथ को ही हजारों साल पुराना माना जाता है। तुलसीदास ने वाल्मीकि को आदिकवि कहा है। अब हम ये जानने की कोशिश करते हैं कि तुलसी की वो अयोध्या कैसी थी जहां प्रभु राम और माता सीता का निवास था।

तुलसीदास ने अयोध्या की महिमा का वर्णन राम के संदर्भ में किया है। अयोध्या को लेकर उनका चित्रण भक्तिपूर्ण है। अयोध्या का वर्णन करने में तुलसी ने अपनी अपार कल्पनाशक्ति और रुपकों का सहारा लिया है।

बालकांड में तुलसीदास लिखते हैं, बंदउं अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥

अर्थात मैं अति पवित्र अयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करनेवाली सरयू नदी की वंदना करता हूं।

तुलसी के लिए अयोध्या मोक्षदायिनी है, तुलसी लिखते हैं कि जो जीव अयोध्या में अपने प्राणों का त्याग करते हैं उन्हें फिर से संसार में आने की जरूरत नहीं पड़ती। बालकांड में गोस्वामी दास लिखते हैं।

राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥ चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा॥

यानी कि यह शोभायमान अयोध्यापुरी राम के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है और अत्यंत पवित्र है। जगत में चार प्रकार के अनंत जीव हैं, इनमें से जो कोई भी अयोध्या में शरीर छोड़ते हैं, वे फिर संसार में नहीं आते।

इसके ठीक पहले तुलसी सरयू का जिक्र करते हैं। जिसके तट पर अयोध्यापुरी स्थित है।

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥ नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारदा बिमल मति॥

तुलसीदास का कहना है कि वेद-पुराण कहते हैं कि सरयू का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनंत है, जिसे विमल बुद्धिवाली सरस्वती भी नहीं कह सकतीं।

रामचरित मानस में जब राम वनवास से लौटते हैं तो कौशलपुरी के सुख सौंदर्य से विह्वल तुलसी ने अयोध्याजी की महिमा का एक बार और बखान किया है।

तुलसी उत्तरकांड में लिखते हैं, ” जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं॥ पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर॥

अर्थात स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारियां हैं, उनमें (मणि-रत्नों की) अनेक रंगों की सुंदर ढली हुई फर्शें हैं। नगर के चारों ओर अत्यंत सुंदर परकोटा बना है, जिस पर सुंदर रंग-बिरंगे कंगूरे बने हैं।

अयोध्यावासियों की संपदा का वर्णन करते हुए तुलसी की कलम मणि-माणिक्य और सोने-चांदी को भी तोल गए। वे लिखते हैं, “घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूंगों की बनी हुई देहलियां चमक रही हैं। रत्नों के खंभे हैं। मरकतमणियों से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुंदर हैं मानो ब्रह्मा ने स्वयं बनाई हों। महल सुंदर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुंदर स्फटिक के आंगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत-से खरादे हुए हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।

वाल्मीकि की तरह तुलसी ने अयोध्या की जल संपदा का चित्रण किया है। तुलसी कहते हैं नगर के उत्तर दिशा में सरयू बह रही है, जिनका जल निर्मल और गहरा है। किनारे मनोहर घाट बंधे हुए हैं, और वहां कीचड़ नहीं है।

अयोध्या की ज्ञान और निर्वाण परंपरा का वर्णन करते हुए तुलसी कहते हैं कि नदी के किनारे कहीं-कहीं सांसारिक मोह और बंधनों से विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयू के किनारे-किनारे सुंदर तुलसी के झुंड-के-झुंड बहुत-से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं।

तुलसी की अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुणों पर तिरोहित है वो कहते हैं कि उस नगर के सौंदर्य की क्या चर्चा जहां खुद रघुनाथ विराजते हों। तुलसी कहते हैं,

रमानाथ जहं राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ॥

अर्थात स्वयं लक्ष्मीपति भगवान जहां राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियां और समस्त सुख-संपत्तियां अयोध्या में छा रही हैं।

रामशरण का मंत्र देते हुए तुलसी कहते हैं कि लोग जहां-तहां रघुनाथ के गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागत का पालन करनेवाले राम को भजो; शोभा, शील, रूप और गुणों के धाम रघुनाथ को भजो।

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