अमेरिका की रिपोर्ट में दावा, भारत में धर्म-जाति के नाम पर अल्पसंख्यकों के साथ होता है भेदभाव

New Delhi: अमेरिका की एक रिपोर्ट में (US Report on India) कहा गया है कि भारत में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव होता है और उन पर हमले किए जाते हैं। इन कथित हमलों को लेकर इस रिपोर्ट में चिंता व्यक्त की गई है।

रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों (US Report on India) ने संविधान के अनुसार अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दिए जाने की जरूरत पर जोर दिया है। भारत इससे पहले अमेरिका की धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट को यह कहकर खारिज कर चुका है कि एक विदेशी सरकार को देश के लोगों के संवैधानिक अधिकारों पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है।

अधिकारियों ने सालभर किया अनुभव

अमेरिका की कांग्रेस में समर्थन प्राप्त ‘2019 अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता रिपोर्ट’ को विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने रिलीज किया। इसमें दुनियाभर में धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन की घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

इस रिपोर्ट के भारत सेक्शन में कहा गया है कि अमेरिकी सरकार के अधिकारियों ने धार्मिक स्वतंत्रता के सम्मान की अहमियत और सहिष्णुता के प्रसार और सम्मान को सालभर देखा। सरकारी अधिकारियों, मीडिया, धार्मिक सौहार्द संगठनों और NGOs से बातचीत की।

अल्पसंख्यकों को संवैधानिक सुरक्षा देने की जरूरत

अमेरिकी अधिकारियों ने देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों की वास्तविक चिंताओं को समझने, सांप्रदायिक विचारों की निंदा और अल्पसंख्यकों को संवैधानिक सुरक्षा दिए जाने की जरूरत समझी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल अक्टूबर में अमेरिकी अधिकारी ने सीनियर सरकारी अधाकिरयों से मीटिंग में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को लेकर चिंता जताई थी। रिपोर्ट में पिछले साल अगस्त में जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिए जाने की घटना और दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) बनाए जाने का जिक्र भी किया गया है।

‘हिंदू बहुसंख्यक पार्टियों ने की बयानबाजी’

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारतीय जनता पार्टी समेत हिंदू बहुसंख्यक पार्टियों के कुछ अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर या सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दिए।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, ‘प्रशासन ‘गोरक्षा के नाम पर की गई हत्याओं, भीड़ की हिंसा और डराने-धमकाने वाले लोगों सजा देने में अकसर विफल हो जाते हैं। कुछ NGO के मुताबिक प्रशासन ने कई बार इन लोगों को सजा से बचाया है और पीड़ित के खिलाफ केस लगाए हैं।’

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