मिहिरभोज और सुहेलदेव के बाद अब पृथ्वीराज चौहान… आखिर जातियों में क्यों बांटा जा रहा है राजाओं को?

मिहिरभोज और सुहेलदेव के बाद अब पृथ्वीराज चौहान... आखिर जातियों में क्यों बांटा जा रहा है राजाओं को?

पृथ्वीराज पर विवाद की वजह

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पृथ्वीराज चौहान की जाति को लेकर विवाद कैसे खड़ा हुआ, उनके गुर्जर होने की बात अचानक कैसे आई, इस सवाल पर अखिल भारतीय वीर गुर्जर महासभा का कहना है कि ‘इसे विवाद का नाम न दिया जाए और न ही पृथ्वीराज के गुर्जर होने की बात अचानक पता चली है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे। यह अलग बात है कि यह जानकारी उतनी आम नहीं हो पाई, जितनी होनी चाहिए थी, इसी लिए हम लोग उस ऐतिहासिक तथ्य को जनता के बीच लाना चाहते हैं।’ डॉक्टर जितेश गुर्जर के अनुसार, ‘अजमेर का जो राजवंश है- प्रतिहार, परमार, सोलंकी और चौहान, उन सबका मूल गुर्जर ही है, ऐसे में पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने पर संशय किया ही नहीं जाना चाहिए।’ आचार्य वीरेंद्र विक्रम का कहना है, ‘ पृथ्वीराज चौहान के ही दरबार के कवि जयानक ने पृथ्वीराज विजय महाकाव्यं की रचना की थी, उसमें तमाम जगह पर पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने की बात लिखी हुई है। यह महाकाव्य कोई आज का नहीं है कि उसमें कोई परिवर्तन कर दिया गया हो, यह पृथ्वीराज चौहान के समय का ही है। जयानक ने इसकी रचना वर्ष 1191 में तब की थी, जब पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी को हराया था। इससे ज्यादा पुराना और प्रमाणिक प्रमाण कोई और हो नहीं सकता। अगर किसी ऐतिहासिक पक्ष को गलत तरीके से पेश किया जा रहा हो तो उसे सही करने की जिम्मेदारी समाज की है और हम लोग उस जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हैं।’ उधर राजपूत महासभा पृथ्वीराज चौहान के गुर्जर होने के दावे को सिरे से खारिज कर रहा है। महासभा का कहना है कि अब दो हजार साल के बाद यह याद आना कि पृथ्वीराज चौहान गुर्जर थे, स्थापित तथ्यों और इतिहास को नकारना है।

दो राजाओं को लेकर पहले से विवाद

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पृथ्वीराज चौहान की जाति को लेकर छिड़ा विवाद इस मायने में अहम हो गया है कि दो राजाओं को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा है। एक राजा सुहेलदेव हैं, जिन पर तीन अलग-अलग जातियों के दावे हैं। ओबीसी में आने वाले राजभर समाज के लोग राजा सुहेलदेव को अपना राजा बताते हैं। अनुसूचित जाति में आने वाले पासी समाज के लोग भी उन्हें अपना राजा बताते हैं और राजपूतों का भी उन पर दावा है। इसी साल फरवरी महीने में जब यूपी में उनके नाम पर स्मारक बनाए जाने के लिए आधारशिला रखी गई तो तीनों खेमे आमने सामने थे। राजपूत करणी सेना ने कहा था, ‘यह हमारे मान-सम्मान और स्वाभिमान से जुड़ा मामला है। राजनीतिक लाभ लेने के लिए उन्हें राजपूत समाज से अलग करने की साज़िश की जा रही है, जिसका हम सड़क पर उतरकर विरोध करेंगे।’ इसके बाद राजा मिहिर भोज को लेकर पाले में बंटे राजपूत उन्हें अपना राजा बता रहे हैं और गुर्जर अपना। यूपी में तो उनकी प्रतिमा स्थापित करने के बाद यूपी सरकार धर्मसंकट में पड़ गई है। वह यह नहीं तय कर पा रही है कि मिहिर भोज को गुर्जर राजा कहे या क्षत्रिय। वहां बीच का रास्ता निकालने की कोशिश हो रही है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ट्वीट कर कहा है-‘महापुरुषों को कभी जातीय सीमाओं में कैद नहीं करना चाहिए। उनका महान बलिदान किसी व्यक्ति या परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए होता है।’ मध्यप्रदेश में राजा मिहिरभोज की एक प्रतिमा का जब 8 सितंबर 2021 को अनावरण हुआ तो देखा यह गया कि शिलापट पर मिहिर भोज के साथ गुर्जर भी लिखा हुआ है, उसके बाद जाति विवाद ने हिंसक रूप ले लिया। मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने कहा कि मूर्ति तो खुली रखी जाए लेकिन विवाद की जड़ बने शिलापट को ढक दिया जाए। मामले की सुनवाई की अगली तारीख 20 अक्टूबर को होनी है।

आइकॉन से मजबूत दिखता है अतीत

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सवाल यह है कि राजाओं पर जातियों का टैग क्यों लग रहा है? दरअसल राजनीति में जाति समूहों का महत्व बढ़ गया है। उन्हें बहुत निर्णायक माना जाने लगा है। इस वजह से अब हर जाति के अपने संगठन तैयार हो गए हैं। ऐसे में हर जाति क लिए एक ‘आइकॉन’ चाहिए ही है। ‘आइकॉन’ से ही ताकत आती है। समाज की गोलबंदी बढ़ती है। इस वजह से ‘आइकॉन’ को लेकर होड़ है। एक-एक ‘आइकॉन’ पर कई-कई के दावे हैं। राजाओं पर होड़ इसलिए ज्यादा है कि इससे अतीत मजबूत दिखता है।