अफगानी भाई-बहन की गुहार: सर, मां के शव को अपने वतन ले जाना है…प्लीज हेल्प

अफगानी भाई-बहन की गुहार: सर, मां के शव को अपने वतन ले जाना है...प्लीज हेल्प

हाइलाइट्स

  • अफगानी भाई-बहन की विदेश मंत्रालय से अपील, सरकारी कागजी औपचारिताएं बनी अड़चन
  • सुपुर्द ए खाक होने के इंतजार में 13 दिन से मोर्चरी में रखा है विदेशी महिला का शव
  • काबुल की वकील के पास पैसा नहीं बचा, लौटने पर तालिबानी के सामने जिंदगी का खतरा

नई द‍िल्‍ली
13 दिन गुजर गए एक अफगानी महिला के शव को मॉर्चरी में रखे हुए। अंतिम संस्कार नहीं हो सका। अमूमन ऐसी नौबत तब ही आती है, जब या तो शव लावारिस हो या पास में कोई अपना न हो। लेकिन सफदरजंग अस्पताल की मॉर्चरी में रखे जंजेरा जादरान के शव के पास बेटी भी है और बेटा भी। लावारिस शव को भी पुलिस 72 घंटे के बाद जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करके अंतिम संस्कार करा देती है। मगर, जंजेरा जादरान के मामले में मुल्कों की सरहदें आड़े आ रही हैं। कछुआ चाल से चलती सरकारी कागजी औपचारिताएं अड़चनें बनी हुई हैं। मां का शव अपने वतन ले जाने के लिए 10 दिन से जूझती बेटी मरियम के सामने भूख प्यास का संकट खड़ा हो गया है। पैसा बचा नहीं। शव को सड़क के रास्ते ही वाघा बॉर्डर होते हुए वाया पाकिस्तान होते हुए अफगानिस्तान पहुंचने का एक मात्र रास्ता बचा है।

वतन की मिट्टी में करना है सुपर्द ए खाक

मरियम ने एनबीटी को बताया कि अपनी मां के शव को वतन ले जाकर सुपुर्द ए खाक करने के लिए वह भाई फरहाद के साथ दिल्ली में दर दर भटक रहे हैं। वे काबुल शहर से 100 किलोमीटर दूर तैमानी के रहने वाले हैं। 30 साल की मरियम लॉ कर चुकी हैं। वहां एडवोकेट थीं। अपने पति की दूसरी बीवी हैं। 5 बच्चे हैं। सबसे बड़ा बेटा 11 साल का और सबसे छोटी बेटी 5 साल की है। जबकि फरहाद काबुल में ग्रेजुएशन कर रहे थे। पिता टैक्सी चलाते थे। मां को 6 साल पहले फेफड़ों का टीबी हुआ था। पहले काबुल में फिर पाकिस्तान ले जाकर पेशावर और इस्लामाबाद में इलाज कराया। कोई राहत नहीं मिली। चार महीने पहले उन्हें कोरोना हो गया था। वह ठीक भी हो गईं थी, लेकिन अगस्त में सांस की बीमारी ज्यादा बिगड़ गई।

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पिता ने टैक्सी बेचकर इलाज के लिए भेजा था पैसा

पैसों की तंगी के बीच पिता ने टैक्सी बेचकर इलाज के लिए पैसे दिए। मां को साथ लेकर दोनों भाई बहन 5 अगस्त को दिल्ली आ गए। पहले नोएडा में नामी हॉस्पिटल में डॉक्टर को दिखाया। मां ठीक भी हो गईं और काबुल लौटने की प्लानिंग थी। इस बीच बरसात के मौसम में दिक्कत शुरू हो गई। पैसा भी नहीं था। यहां फंस गए। प्राइवेट हॉस्पिटल में महंगा खर्चा हुआ। इमरजेंसी वॉर्ड सफदरजंग पहुंचे। वहां भी जगह नहीं मिली। गलियारे में रुकना पड़ा। मां को ऑक्सिजन की जरूरत थी। कुछ समय तक अस्पताल स्टाफ ने सहयोग दिया। उसके बाद नजरअंदाज करने लगे। एक अन्य अस्पताल ले गए, डॉक्टर ने एक दिन का एक लाख खर्चा बताया। वह रोई, गिड़गिडाईं, लेकिन किसी का दिल नहीं पसीजा।

शव कैसे ले जाएं, कहां ले जाएं

मरियम ने बताया कि जैसे तैसे इधर से उधर अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे। ऑक्सिजन लेवल 40 रह गया। 26 मार्च को मां ने दम तोड़ दिया। डेड बॉडी सफदरजंग अस्पताल की मॉर्चरी में तभी से रखी हुई है। अस्पताल बार बार बॉडी ले जाने का दबाव बना रहा है। खाने पीने, रहने के पैसे भी नहीं हैं। रोती बिलखती मरियम अफगानिस्तान और पाकिस्तान एंबेसी गई। फ्लाइट से ले जा नहीं सकते। पाकिस्तान ने इजाजत दे दी मगर भारत सरकार की इजाजत नही मिली। सफदरजंग हॉस्पिटल ने नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट 27 सितंबर को जारी कर दिया, लेकिन विदेश मंत्रालय से जुड़ी औपचारिकताओं में शव अटक गया है।

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बहुत टफ लाइफ है हमारे इलाके की

अफगानिस्तान में हालात क्या बदले। मरियम की जिंदगी के ही मायने बदल गए। उनके मुताबिक, वहां पहुंचने पर जिंदा रह पाऊंगी भी या नहीं। मुझे नहीं पता। मेरे गांव में औरतों की जिंदगी पहले ही सख्त पहरे में थी। अब लौटने पर हम बच भी पाएंगे या नहीं। पता नहीं। तालिबानी मार देंगे। क्योंकि पहले की गवर्नमेंट में मैंने कई केस लड़े। अब धमकियां मिल रही हैं, लौटने पर मार देंगे। पाकिस्तान में भी हमें खतरा है।

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सांकेत‍िक तस्‍वीर