Women Day 2021: कोर्ट के इन फैसलों ने महिलाओं को की सूप्रीम पावर.. और मिटाए बड़े फासले

Webvarta Desk: Women Day 2021: पिछले दो-तीन बरसों में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे अहम फैसले दिए हैं, जिनसे महिलाओं को ज्यादा अधिकार (Supreme Court Decisions For Women Rights) मिले हैं। ये अधिकार उन्हें आर्थिक और सामाजिक तौर पर ज्यादा मजबूत बनाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के ऐसे फैसलों (Supreme Court Decisions For Women Rights) से महिलाएं न सिर्फ मायके में बल्कि ससुराल में भी ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रही हैं। ये फैसले कौन-से हैं और महिलाएं इनका इस्तेमाल कैसे कर सकती हैं, इसके बारे में जानकारी दे रहे हैं…

पिता की जायदाद में बेटी को भी हक
  • 11 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि बेटी को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर का अधिकार है और हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के वक्त चाहे बेटी के पिता जिंदा रहे हों या नहीं, बेटी को हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) में बेटे के बराबर संपत्ति में अधिकार मिलेगा।
  • बेटी को पैदा होते ही जीवनभर बेटे के बराबर का अधिकार मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जस्टिस अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 की धारा-6 के तहत प्रावधान है कि बेटी पैदा होते ही कोपार्सनर (सह-वारिस) हो जाती है।
  • हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के बाद बेटी पैदा हुई हो या पहले पैदा हुई हो, उसका हिंदू अनडिवाइडेड फैमिली (एचयूएफ) की संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संशोधन अधिनियम के तहत बेटी संपत्ति में अधिकार पाने की हकदार है चाहे पहले पैदा हुई हो या फिर बाद में।
  • चूंकि कोपार्सनर (हम वारिस या सहदायिकी) का अधिकार जन्म से है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि कानून के संशोधन के वक्त यानी 9 सितंबर 2005 को बेटी के पिता अनिवार्य रूप से जिंदा ही रहे हों।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 बेटे और बेटी को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देता है। यह कानून लागू होने से पहले के मामले में भी लागू होगा।
फैसले का असर

भारतीय सामाजिक स्थिति को देखते हुए यह फैसला बेहद अहम है। इससे महिलाएं और मजबूत होंगी।

  • बेटियों को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देना बेहद अहम है। दरअसल, ससुराल में जब लड़की, बहू के तौर पर जाती है तो वहां उसे पति की पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार नहीं होता बल्कि पति की हैसियत के हिसाब से उसे विवाद की स्थिति में गुजारा भत्ता दिया जाता है।
  • मायके में बेटे के बराबर संपत्ति में अधिकार दिया गया है तो महिलाएं सुरक्षित महसूस करेंगी।
  • पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलने के बाद भी अभी तक भारतीय समाज की जो स्थिति है और जिस तरह से परंपरागत सोच हावी है, उससे न तो लड़की खुद और न ही उसके भाई व पिता संपत्ति देने के लिए पहल करते हैं। ऐसी स्थिति में यह फैसला दूरगामी असर रखता है।
  • समाज में महिलाओं को खुद आगे आना होगा और अपने हक के लिए आवाज उठानी होगी। तभी उन्हें पैतृक संपत्ति में बराबरी मिलेगी।
ऐसे पाएं इंसाफ
  • संपत्ति जिस इलाके में है, उस इलाके की सिविल कोर्ट में बेटी संपत्ति की हिस्सेदारी के लिए अर्जी दाखिल कर सकती है। अगर संपत्ति का बंटवारा हो चुका है और बेटी को हिस्सा नहीं मिला है और उसे संपत्ति में हिस्सा चाहिए तो वह हिस्सेदारी के लिए अर्जी दे सकती है।
  • उस संपत्ति में बाकी हिस्सेदारों ने जो लाभ कमाया है, उसमें भी वह हिस्सा मांग सकती है।
  • इसके लिए लड़की को वकील की सहायता लेनी होती है और वकील की सहायता से वह न सिर्फ हिस्सेदारी मांग सकती है बल्कि संपत्ति का अगर बंटवारा नहीं हुआ है तो बंटवारे के लिए भी कह सकती है।
  • इसके लिए 3 साल की अवधि तय की गई है यानी लड़की को जिस दिन इस बात का भान हुआ है उससे 3 साल के भीतर वह केस दायर कर सकती है।
बहू को ससुराल में रहने का मिला अधिकार
  • सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2020 को एक अहम फैसला दिया जिसमें बहू को ससुराल में रहने का अधिकार दिया गया है। दरअसल, डोमेस्टिक वॉयलेंस (डीवी) ऐक्ट के तहत दिए गए प्रावधान की सुप्रीम कोर्ट ने व्याख्या की और कहा कि बहू अगर घर में रह चुकी है या रह रही है तो उसे वहां डीवी ऐक्ट के तहत रहने का अधिकार है।
  • सास-ससुर अगर डोमेस्टिक रिलेशनशिप में हैं तो बहू साझे मकान में रह सकती है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ ससुर की अर्जी खारिज कर दी जिसमें हाई कोर्ट ने कहा है कि बहू को उसके ससुराल के घर में उस सूरत में रहने का अधिकार है जब वह इस बात को साबित करती है कि वह डोमेस्टिक वॉयलेंस का शिकार हुई है और संपत्ति के मालिक के साथ वह डोमेस्टिक रिलेशनशिप में है।
  • 2007 के दो जजों के फैसले को दरकिनार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शेयर्ड हाउसहोल्ड को परिभाषित करते हुए कहा कि इसका मतलब पति के रिश्तेदार से है जिसके साथ महिला डोमेस्टिक रिलेशनशिप में रह चुकी है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डीवी ऐक्ट के तहत महिला पति के रिश्तेदारों (ससुरालवालों) के घर में रहने की मांग कर सकती है, जहां वह डोमेस्टिक रिलेशनशिप में रह चुकी है।
  • दो जजों की बेंच ने कहा था कि शेयर्ड हाउस होल्ड में महिला रह सकती है और शेयर्ड हाउस होल्ड का मतलब जहां पति रहता है या जिस जॉइंट प्रॉपर्टी में पति रहता हो।
फैसले का असर
  • ‘प्रोटेक्शन ऑफ वुमन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस ऐक्ट’ (डीवी ऐक्ट) के तहत महिला जो डोमेस्टिक रिलेशन (एक ही छत के नीचे रहने वाले) में रहती है, शिकायत कर सकती है।
  • जो महिला डोमेस्टिक रिलेशन में है और एक ही छत के नीचे दूसरों के साथ रहती हो तो वह महिला प्रताड़ना की स्थिति में शिकायत कर सकती है। ऐक्ट के तहत एक महिला जो शादी के रिलेशन में हो तो वह किसी भी दूसरे शख्स के खिलाफ शिकायत कर सकती है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने डीवी ऐक्ट की जो व्याख्या की है उससे महिलाओं को काफी सपोर्ट मिलेगा।
  • दरअसल घरेलू हिंसा का शिकार होने पर सबसे पहले महिलाओं को अपने ससुराल से बेदखल होने का खतरा हो जाता है, लेकिन डीवी ऐक्ट की व्याख्या करते हुए अब सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उसके बाद महिलाएं अपने हक के लिए ससुराल में रहकर आवाज उठा सकती हैं और खुद को सुरक्षित महसूस करेंगी।
ऐसे पाएं इंसाफ
  • महिला को ससुराल में रहकर लड़ने का अधिकार है और उसे शेयर्ड हाउस होल्ड में रहने का अधिकार है। इसके लिए डीवी ऐक्ट के तहत प्रावधान है।
  • महिला अपने ससुराल या मायके के इलाके के मैजिस्ट्रेट कोर्ट में याचिका दायर कर डीवी ऐक्ट के तहत रहने का अधिकार मांग सकती है।
  • किस इलाके का कौन-सा कोर्ट है उसका ब्यौरा www.delhicourts.nic.in पर है। यह दिल्ली के लिए है इसी तरह से देशभर की अदालतों का ब्यौरा ऑनलाइन उपलब्ध है। ऐसे वेबसाइट्स की लिस्ट इंटरनेट पर आसानी से मिल जाते हैं।
ससुराल में प्रताड़ना का केस मायके में दर्ज

सुप्रीम कोर्ट ने 9 अप्रैल 2019 को बेहद अहम फैसले में कहा:

  • अगर ससुराल में पत्नी को पति या दूसरे लोगों ने दहेज के लिए परेशान किया है तो महिला ससुराल छोड़कर जहां जाकर रहती है या पनाह लेती है, वहां की अदालत में भी उसकी शिकायत पर सुनवाई होगी।
  • रूपाली देवी बनाम स्टेट ऑफ यूपी से संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा था कि अगर पति या ससुराल वालों ने परेशान किया है और महिला ने ससुराल छोड़ मायके में पनाह ली। तब मायके में रहते हुए भी उसे जिस तनाव या डिप्रेशन से गुजरना पड़ता है, उसे प्रताड़ना का जारी रहना माना जाएगा।
  • चाहे पति ने उसके पैरंट्स के घर आकर कुछ न भी किया हो, लेकिन उसके द्वारा ससुराल में पत्नी को प्रताड़ित करने की वजह से ऐसा माना जाएगा।
  • सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि अगर महिला पति या ससुरालवालों की प्रताड़ना की वजह से ससुराल छोड़ मायके जाती है तो वहां भी मानसिक परेशानी से गुजरती है। यह ससुराल में हुई प्रताड़ना का नतीजा माना जाएगा और उसे मायके में हुआ अपराध माना जाएगा।
  • महिला अगर मौन भी है तो यह मानसिक परेशानी माना जाएगा। अदालत ने कहा कि पैरंट्स के घर अगर मन पर बुरा असर हो रहा है और उससे पहले पति व ससुराल के दूसरे सदस्यों ने ससुराल में महिला को परेशान किया है तो यह पैरंट्स के घर दहेज प्रताड़ना के तहत हुआ अपराध माना जाएगा यानी इसे रिपीट ऑफेंस माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे में हम व्यवस्था देते हैं कि पत्नी के साथ ससुराल में अगर प्रताड़ना हुई है और वह ससुराल से निकलकर जहां भी पनाह लेती है तो उस इलाके की अदालत को अधिकार होगा कि वह शिकायत पर सुनवाई करे।
फैसले का असर…

पहले दहेज प्रताड़ना के मामले में जहां घटना हुई है, वहां केस दर्ज कराए जाने का प्रावधान था। कई बार ऐसा भी होता रहा है कि ससुराल में महिला के साथ प्रताड़ना हुई और वह वहां से निकलकर मायके आ गई। वहां भी आकर पति ने उसे प्रताड़ित किया या फिर फोन पर धमकी दी। दहेज के लिए प्रताड़ित किया तो फिर मायके के इलाके में केस दर्ज कराने का अधिकार क्षेत्र बन जाता था। लेकिन पहले आमतौर पर ससुराल में प्रताड़ना होने पर ससुराल के इलाके में ही क्रिमिनल केस दर्ज होता था और वहां की कोर्ट में सुनवाई चलती थी। पर अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महिला के लिए राह आसान हो गई है। वह चाहे तो दहेज प्रताड़ना की शिकायत जहां वह अब रह रही है, वहां कर सकती है। उसी इलाके की कोर्ट में सुनवाई होगी।

ऐसे पाएं इंसाफ
  • महिला तलाक से लेकर गुजारा भत्ते आदि का केस पहले अपने मायके में रहकर भी लड़ती रही है।
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महिला जहां भी रहती है, वहां के थाने में जाकर शिकायत कर सकती है। महिला मायके के थाने में जाकर लिखित शिकायत कर सकती है। शिकायत की कॉपी पर थाने से उसे मुहर और साइन की हुई कॉपी मिलेगी। अगर इस आधार पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो महिला उस इलाके के मैजिस्ट्रेट की अदालत में सीआरपीसी की धारा-156 (3) के तहत शिकायत कर एफआईआर दर्ज कराने की गुहार लगा सकती है।
  • हर थाने में महिलाओं की सहायता के लिए हेल्प डेस्क होता है। महिला वहां से इलाके के मैजिस्ट्रेट का पता भी पूछ सकती है।
  • प्रताड़ना के 3 साल के भीतर उसे केस दर्ज कराना होगा।
महिलाओं को वाजिब गुजारा भत्ता मिलने में आसानी

सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2020 को गुजारा भत्ता और ऐलमोनी (निर्वाह भत्ता) की खातिर देश भर की अदालतों के लिए गाइडलाइंस तय कीं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके तहत तमाम ऐसे निर्देश जारी किए हैं जिससे गुजारा भत्ते के मामले में पारदर्शिता आ सके। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

  • अगर महिला गुजारा भत्ते के लिए अर्जी दाखिल करे तो उसे बताना होगा कि उसके पास कितनी संपत्ति है और उसका खर्च क्या है।
  • महिला को यह भी बताना होगा कि क्या पहले के मामले में उसे कोई मुआवजा मिला है?
    वहीं पति को जवाब में अपनी संपत्ति का ब्यौरा और देनदारी बतानी होगी।
  • अगर कोई जानकारी गलत दी गई तो शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में पक्षकार पर मुकदमा चलेगा, साथ ही कोर्ट की अवमानना का मामला भी बनेगा। पहले से मिले गुजारा भत्ते को बाद के दावे में एडजस्ट किया जाएगा।
  • जिस दिन से मुकदमा दायर किया जाएगा उसी दिन से गुजारा भत्ते की देनदारी होगी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जिला अदालतों और फैमिली कोर्ट के लिए गाइडलाइंस जारी की हैं कि किस तरह से गुजारा भत्ते के लिए अप्लाई करना होगा और कैसे मुआवजे की रकम का भुगतान होगा।
  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आवेदन की तारीख से ही राशि का भुगतान करना होगा। साथ ही पिछली किसी कार्यवाही में भुगतान की गई राशि को अदालत समायोजन (एडजस्ट) करेगी।
  • सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की बेंच ने अनुच्छेद-142 के विशेषाधिकार के तहत ये निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत गुजारा भत्ता कब-से मिले, किस तरह मिले और क्या-क्या क्राइटेरिया हो, ये तय होने जरूरी हैं।
फैसले का असर

पति से अलग होते वक्त महिलाओं द्वारा गुजारा भत्ते का दावा किया जाता रहा है। इनमें सीआरपीसी की धारा-125, हिंदू मैरिज ऐक्ट, हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटिनेंस ऐक्ट व घरेलू हिंसा कानून के तहत गुजारा भत्ते का दावा किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के विरोधाभास को खत्म करने के लिए निर्देश जारी किया और तय किया कि गुजारा भत्ते के लिए अर्जी दाखिल की जाए तो पहले की कार्यवाही के बारे में खुलासा किया जाए। तब अदालत पिछले गुजारा भत्ते या आदेश को देखकर अपने फैसले पर विचार करेगी और उसे एडजस्ट कर सकती है।

कई बार महिला हाउसवाइफ होती है और कानूनी लड़ाई भी वह अपने रिश्तेदारों से रुपये उधार लेकर लड़ती है। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट में आवेदन के साथ-साथ दोनों पार्टियों को अपनी संपत्ति और देनदारी का ब्यौरा देना जरूरी होगा। पत्नी की गुजारा भत्ते की अर्जी पर पति चार हफ्ते में जवाब देगा और हलफनामे में संपत्ति और देनदारी यानी खर्च का ब्यौरा देगा। गुजारा भत्ता तय होते वक्त चीजें ज्यादा पारदर्शी हो जाएंगी। इसके बाद पति अपनी आमदनी नहीं छुपा पाएगा और महिलाओं को पूरा इंसाफ मिल पाएगा।

ऐसे पाएं इंसाफ

अगर तलाक का केस विचाराधीन (पेंडिंग) है तो उस दौरान उसी फैमिली कोर्ट में हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा-24 के तहत गुजारा भत्ते के लिए केस दाखिल हो सकता है। अगर केस विचाराधीन नहीं है तो महिला सीआरपीसी की धारा-125 के तहत मायके या ससुराल किसी भी इलाके की संबंधित अदालत में अर्जी दाखिल कर गुजारा भत्ता मांग सकती है।

  • गुजारा भत्ता मांगने के लिए कोई समय सीमा नहीं है। अगर तलाक नहीं हुआ है तो महिला किसी भी समय गुजारा भत्ता मांग सकती है।
  • पति की आर्थिक स्थिति कमजोर है तो वह भी गुजारा भत्ता मांग सकता है।
  • वकील को फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं तो मुफ्त में लीगल सहायता भी दी जाती है। www.dslsa.org पर सर्च करके जानकारी ली जा सकती है। हेल्पलाइन नंबर 1516 पर 24 घंटे फोन किया जा सकता है।
नाबालिग पत्नी से जबरन संबंध अब रेप

सुप्रीम कोर्ट ने 3 साल पहले दिए एक अहम फैसले में कहा है कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ संबंध के मामले में पति को रेप से छूट देने वाला प्रावधान मनमाना है और बच्चियों के अधिकार का उल्लंघन करता है। यह भेदभावपूर्ण है। साथ ही यह निष्पक्ष और तर्कपूर्ण भी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अपवाद संविधान के अनुच्छेद-14, 15 व 21 यानी समानता के अधिकार और जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।

रेप की धारा-375 (2) के तहत अपवाद में कहा गया है कि 15 से 18 साल की उम्र की पत्नी के साथ जबरन संबंध के मामले में पति के खिलाफ रेप का केस दर्ज नहीं होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि नाबालिग पत्नी की शिकायत पर पति के खिलाफ रेप का केस दर्ज हो सकता है और यह शिकायत 1 साल के भीतर करनी होगी। तत्कालीन जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने एक मत से आईपीसी की धारा-375 (2) को परिभाषित करते हुए कहा:

अगर कोई अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाता है तो 18 साल से कम उम्र की पत्नी को छोड़कर बाकी मामले में रेप का केस नहीं होगा यानी 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ जबरन संबंध रेप होगा।

पत्नी की शिकायत पर केस दर्ज हो सकेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह फैसला आने वाले मामलों में लागू होगा।

फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का व्यापक असर समाज पर पड़ेगा। खासकर वे लड़कियां जिनके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा था, उनके लिए कानूनी रास्ता खुल गया है। दरअसल अब तक नाबालिग लड़की की शादी होने के बाद उसके साथ सेक्सुअल ऑफेंस से सुरक्षा का कोई कानून नहीं था। इस फैसले से वे लड़कियां सुरक्षित महसूस करेंगी। इस अपवाद को नए सिरे से पढ़ने के कई मायने और असर दिखेंगे। बाल विवाह पर पाबंदी वाले कानून के तहत भी इसका समाधान नहीं हो पा रहा था। नाबालिग बच्ची के अधिकार में एक खालीपन था जिसे अब खत्म कर दिया गया है।

ऐसे पाएं इंसाफ
  • लड़की बालिग होने के बाद अपने इलाके के थाने में इसकी शिकायत दर्ज करा सकती है। बालिग होने के एक साल के भीतर इलाके के थाने में केस दर्ज कराना होगा।
  • वह सादे कागज पर आपबीती लिखकर पुलिस को दे सकती है या फिर शिकायत लिखवा सकती है। शिकायत की रिसिविंग कॉपी साइन और मुहर के साथ मांग सकती है।
  • ऐसे मामले में सहायता के लिए थाने में महिला हेल्प डेस्क होता है, वह सहायता ले सकती है।
  • अगर उसकी शिकायत पर थाने में केस दर्ज न हो तो वह अपने इलाके के मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में जा सकती है।
फटाफट तीन तलाक से मिला छुटकारा

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में एक बार में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक अवैध, गैर-संवैधानिक और अमान्य है। तीन तलाक कुरान की रीति के खिलाफ है। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार ने कानून बनाया। 30 जुलाई 2019 को केंद्र सरकार ने मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 बनाया था। एक बार में तीन तलाक को अपराध के दायरे में लाते हुए ऐसा करने वाले को तीन साल तक कैद की सजा देने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत ये प्रावधान किए गए हैं:

  • एक बार में तीन तलाक देने वाले पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा सकती है। इस मामले में एफआईआर तभी मंजूर की जाएगी जब शिकायती खुद पीड़ित महिला हो या फिर उनके ब्लड रिलेशन वाले लोग यानी बेहद करीबी रिश्तेदार।
  • एफआईआर के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए शिकायती तय किए गए हैं।
  • पति और पत्नी के बीच मैजिस्ट्रेट की कोर्ट में समझौता भी हो सकता है। यह गैर-जमानती अपराध बना रहेगा, लेकिन अब इसमें ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि मैजिस्ट्रेट की अदालत से जमानत हो सकती है।
  • महिलाओं को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे तीन तलाक की स्थिति में खुद या अपने बच्चों के लिए भरण-पोषण की मांग करने के लिए कोर्ट या मैजिस्ट्रेट की अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।
फैसले का असर

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को निरस्त कर दिया था, बावजूद इसके मुस्लिम महिलाओं को उनके पति एक बार में तीन तलाक देकर घर से निकाल रहे थे। इसी वजह से सरकार ने तीन तलाक कानून लाकर महिलाओं को सुरक्षित करने की कोशिश की है।

पहले और बाद की स्थिति में यह फर्क हुआ है कि पहले तीन तलाक के नाम पर अगर पति घर से निकालने की कोशिश करता था तो पत्नी घरेलू हिंसा और 498 ए आदि का केस दर्ज करा सकती थी। फिर भी यह कुरीति बदस्तूर जारी थी। अब कानून बना दिया गया है और इसके तहत अगर अब कोई पति, पत्नी को एक बार में तीन तलाक देगा तो पत्नी सीधे थाने जा सकती है और पति की गिरफ्तारी हो सकती है।

ऐसे पाएं इंसाफ
  • इस कानून के बाद महिला को अगर उसके पति ने एक बार में तीन तलाक दिया तो वह अपराध होगा और महिला इस अपराध के खिलाफ जहां वह रह रही है उस थाने में शिकायत दर्ज करा सकती है।
  • महिला खुद या फिर उसके परिजन इस मामले में शिकायत कर सकते हैं। शिकायत के लिए महिला लिखकर थाने को दे सकती है। शिकायत की कॉपी की रिसिविंग मुहर लगाकर थाने से मिलती है। उसके बाद अगर शिकायत एफआईआर में नहीं बदली तो महिला इलाके के मैजिस्ट्रेट के सामने अर्जी दाखिल कर सकती है।
  • किसी भी मामले में अगर संज्ञेय अपराध हुआ है और थाने में केस दर्ज नहीं हुआ तो उस इलाके के मैजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करने पर सीआरपीसी की धारा-156 (3) में केस दर्ज करने का आदेश दिया जा सकता है। तब थानेदार को केस दर्ज करना ही होता है।
  • चूंकि तीन तलाक देने के मामले में 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में शिकायती को 3 साल तक के दौरान ही केस दर्ज कराना होता है।
एक्सपर्ट पैनल
  • आर. एस. सोढी, रिटायर्ड जस्टिस, दिल्ली हाई कोर्ट
  • रेखा अग्रवाल, ऐडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
  • विराग गुप्ता, ऐडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट
  • नवीन शर्मा, ऐडवोकेट, दिल्ली हाई कोर्ट
  • अजय दिग्पाल, एडवोकेट, भारत सरकार
  • वर्षा तनु, महिला व ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ