अपनी ही चालबाजी में बुरा फंसा चीन, अब पाई-पाई को तरसेगा चीनी ड्रैगन

New Delhi: सीमा विवाद बढ़ा कर चीन नया पैंतरा दे रहा है। इसका मकसद कोरोना वायरस (coronavirus covid-19 in china) से ध्यान हटाना है। चीन के राष्ट्रपति शी चिंगफिंग (Xi Jinping) की लोकप्रियता खतरे में है।

खबरों के मुताबिक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (Communist party of china) में भी चिंगफिंग को लेकर सुगबुगाहट है। पार्टी की हालिया नेशलन कॉन्फ्रेंस में चिंगफिंग ने राष्ट्रवाद का कार्ड खेल दिया। उन्होंने चीनी आर्मी को जंग के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। इंच-इंच जमीन की रक्षा करने का संकल्प लिया गया। ये हास्यास्पद है क्योंकि चीन का कोई पड़ोसी मुल्क इस तरह की मानसिकता नहीं रखता। अब लौटते हैं चीन की माली हालत पर।

चीन का एक्सपोर्ट हो जाएगा बर्बाद

चीन के कुल निर्यात का 17 परसेंट सिर्फ अमेरिका को जाता है। दोनों देशों के बीच ट्रेड वार (China Us trade war) के कारण तनाव पहले से है। ट्रंप चीन के कई सामान पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा चुके हैं। यही नहीं कोरोना वायरस के बाद ट्रंप और सख्त हो गए।

अमेरिकी सीनेट ने हाल ही में चीन स्थित अमेरिकी कंपनियों को बाहर निकालने का बिल पास कर दिया। इससे साफ है कि चीन में मैनुफैक्चरिंग यूनिट घटेंगे। सस्ते मजदूर और पेशेवर माहौल के कारण दुनिया भर की कंपनियों ने चीन का रुख किया था। कोरोना वायरस ने हालात पलट दिए हैं। i-phone जैसी कंपनी तो पहले ही भारत में भी यूनिट लगाने की घोषणा कर चुकी है।

अब कई और नामी मल्टीनेशनल कंपनियां चीन से भारत की ओर रुख कर रही हैं। चीन के कुल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 3 परसेंट है। चीनी सामान का विरोध फिर से शुरू हो गया है। आत्मनिर्भर भारत योजना से चीनी इंपोर्ट को झटका लगना तय है। अब भारत और अमेरिका को जोड़ दें तो 20 परसेंट चीनी इंपोर्ट पर खतरे की घंटी बजती दिखाई देती है। दरअसल इसी की सनक सीमा पर दिखाई दे रही है।

​नौकरियों पर खतरा, युवाओं में आक्रोश

कोरोना वायरस के कारण चीन के ठप उद्योग धंधे दोबारा शुरू तो हो गए हैं लेकिन डिमांड ही नहीं रही तो फैक्ट्रियां खोल कर भी कोई फायदा नहीं है। चीन के लाखों युवा बेरोजगार हो चुके हैं। उनमें सत्ता के प्रति असंतोष है।

चीन की कम्युनिस्ट सरकार किसी विरोध प्रदर्शन की इजाजत नहीं देती लेकिन 1989 के थ्यानमेन स्क्वायर जैसे हालात फिर पैदा हो सकते हैं। हॉंगकॉंग में प्रो डेमोक्रेसी प्रदर्शन को जिस तरह से चीन कुचल रहा है उसकी अवाज मेनलैंड चाइना में भी सुनी जा रही है। चीन में बेरोजगारी की दर बढ़ कर 6 परसेंट हो चुकी है। ये चिंगफिंग के लिए खतरे की घंटी है।

1976 के बाद सबसे बुरा हाल, खजाना खाली

चीन की इकॉनमी 13.7 ट्रिलियन डॉलर की है। 1976 के बाद पहली बार चीनी इकॉनमी में 6.8 परसेंट की गिरावट आई है। ये जनवरी से मार्च 2020 के आंकड़े हैं। जानकारों के मुताबिक चीन अब भयानक मंदी की तरफ बढ़ रहा है। कोरोना वायरस से हुए नुकसान की भरपाई के लिए चीन सरकार ने 672 अरब डॉलर का पैकेज दिया है जो जीडीपी के 5 परसेंट के बराबर है।

इकॉनमी में जान फूंकने के लिए चिंगफिंग सरकार खजाना खोलने की योजना बना रही है। सरकारी योजनाओं पर 3.15 ट्रिलियन युआन खर्च किया जाएगा ताकि नौकरियां बची रहे और फैक्ट्रियां चलती रहे। इसके बावजूद 6.8 परसेंट की गिरावट की भरपाई नहीं हो पाएगी। चीन के आर्थिक आंकड़ों के वैसे भी भरोसे लायक नहीं माना जाता। अगर सरकार खर्च बढ़ाती है तो घाटा भी बढ़ेगा।

​ऐसे बैठ जाएगा ड्रैगन

कोरोना काल में सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि कई देशों से चीन के रिश्ते खराब हो चुके हैं। इसकी कीमत भी चीन चुकाएगा। चीन स्टील का सबसे बड़ा आयातक है जिससे उसकी फैक्ट्रियां 24 घंटे चलती है। ये स्टील वो ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से मंगाता है।

ऑस्ट्रेलिया ने जब से वुहान वायरस की जांच की मांग की है, दोनों के रिश्ते बेहद खराब हो चुके हैं। चीन ने ऑस्ट्रेलिया को अमेरिका का कुत्ता तक कह डाला। कच्चा तेल और दूसरे सामान सियरा लियोन, चिली और अंगोला जैसे देशों से चीन मंगाता रहा है। बदले में भारी कैश देता रहा है। जब चीन का खजाना खाली होगा तो कैश फ्लो बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।

वन बेल्ट वन रोड (OBOR) की चालबाजी पर चाबी

चीन ओबोर की आड़ में रणनीतिक तौर पर अहम देशों में भरपूर पैसे झोंक रहा है। अफ्रीका , एशिया और यूरोप के देशों को उसने जम कर सस्ते लोन दिए। अब इसे जारी रखना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि चीन का पूरा ध्यान आंतरिक इकॉनमी है जो टूट रही है।

हालांकि ओबोर की रणनीतिक चाल से कई देश पहले ही सतर्क हो चुके हैं। इसका उदाहरण है श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट। इसे बनाने के लिए चीन ने पैसे झोंक दिए। बदले में वहां वो छोटा से बेस चाहता था। भारत ने इससे श्रीलंका को आगाह किया। इसके बाद श्रीलंका ने चीन को इस प्रोजेक्ट से दूर कर दिया है।

चमचा पाकिस्तान भी हुआ सतर्क

चीन सरकार भारत को साधने के लिए पाकिस्तान को सहलाने की नीति पर काम करती है। पाकिस्तान के कराची तक रोड बनाने और ग्वादर पोर्ट को विकसित करने की ये योजना 46 अरब डॉलर की है। चीन के इंजीनियर और वहां की पावर कंपनियां पाकिस्तान में मौजूद हैं।

शुरू में पाकिस्तान को लगा कि चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर (China Pakistan Economic Corridor) से भारत पर शिकंजा कसेगा और आर्थिक फायदा भी होगा। अब इससे उलट परिणाम आ रहे हैं। हाल ही में इमरान खान सरकार ने पॉवर कंपनियों के बढ़ते घाटे की जांच के आदेश दिए। जांच रिपोर्ट से चौंकाने वाली बात सामने आई। चीनी पॉवर कंपनियां 100 अरब पाकिस्तानी रुपयों के गबन में लिप्त पाई गईं. इससे दबी जुबान पाकिस्तान में भी CPEC पर सवाल उठ रहे हैं।

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