भारतीय सेना की रक्षा करते हैं भारत के ये मंदिर, इनका नाम लेने से पाकिस्तान के छूट जाते हैं पसीने

Webvarta Desk: चीन और पाकिस्तान (China-Pakistan India) भारत के लिए गले की फांस की तरह हैं, जिन्हें न तो उगल सकते हैं और न ही निगल सकते हैं। ये दोनो देश भारत में शांति भंग करने के लिए कोई न कोई कार्य करते रहते हैं। चीन कभी भारतीय सीमा में घुसपैठ करता है तो पाकिस्तान (Pakistan Afraid Of Temples) आतं’कवादी भेजकर सैनिकों पर हमला करवाता है।

लेकिन आपको जानकर आशर्चय होगा कि चीन और पाकिस्तान भारत के कुछ मंदिरों और मजारों (Pakistan Afraid Of Temples) से डरते हैं, जिन पर वे भूलकर भी फाय’रिंग नहीं करते हैं। आइए जानते हैं ऐसे ही मंदिर और मजार के बारे में…

1965 के युद्ध में दिलवाई भारत को जीत

माता घंटियाली का मंदिर माता तनोट मंदिर से 5 किमी पहले है। बताया जाता है कि माता ने 1965 में भारत-पाक युद्ध में मदद की थी। मंदिर के पास आते ही पाकिस्तानी सैनिक एक-दूसरे को ही दुश्मन समझने लगे थे और आपस में लड़कर मर गए। वहीं कुछ सैनिकों ने मंदिर में प्रवेश किया तो अंधे हो गए।

1971 के युद्ध में की मदद

जैसलमेर के थार रेगिस्तान में 120 किमी दूर तनोट माता का मंदिर है। 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना तनोट माता के मंदिर को पार नहीं कर पाई थी। लड़ाई के दौरान मंदिर पर पाकिस्तान ने 3000 बम गिराया लेकिन इस मंदिर पर खरोंच तक नहीं आई। साथ ही मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे भी नहीं।

सैनिकों की रक्षा करते हैं बाबा दीलीप सिंह

350 साल पुराना बाबा दिलीप सिंह मन्हास की दरगाह है, जिसे बाबा चमलिया की दरगाह भी कहा जाता है। यह दरगाह भारत-पाक की अंतर्राष्ट्रीय सीमा से तकरीबन 200 मीटर दूर है। इन मंदिरों के अलावा इस दरगाह पर भी पाकिस्तानी सैनिक फायरिंग नहीं करते हैं। बॉर्डर पार रहने वाले लोग दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर भेंट करते हैं। पाक सैनिक भी मानते हैं कि यहां पर रुहानी ताकत रहती है जो भारतीय सेना की रक्षा करती है।

शरीर छूट गया लेकिन देशप्रेम कायम है बाबा का

भारत-चीन बॉर्डर के पास बाबा हरभजन सिंह का बंकर है। हरभजन सिंह भारतीय फौजी थे, दुर्घटनावश उनके शरीर का अंत हो गया लेकिन देशप्रेम नहीं छूटा। बताया जाता है कि बाबा ने भले ही शरीर छोड़ दिया लेकिन वह आज भी इस सीमा पर सैनिकों की सहायता करते हैं और आने वाले खतरे से सैनिकों की रक्षा करते हैं।