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जानें क्यों तुर्की टीवी सीरियल ‘अर्तुगुल’ को कहा जा रहा है मुसलमानों का ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’

अर्तुगुल (Ertugrul), तुर्की टीवी इंडस्ट्री का नया शाहकार है, जिसने कमोबेश पूरी दुनिया को अपने जादू में बांध लिया है। तुर्की और मध्य-पूर्व एशिया में इसने कई रिकॉर्ड तोड़े हैं। जबकि उससे बाहर, पूरी इस्लामी दुनिया को उसने एक नया नायक दिया है, जिसकी प्रसिद्धि इससे पहले सिर्फ़ तुर्की की सीमाओं के भीतर थी। उस्मानिया सल्तनत के इस पितृ-पुरुष के जीवन की कहानी के बहाने धर्म, जिहाद और मध्य-युग की धार्मिक लड़ाइयों पर एक नई बहस भी शुरू हुई है।

Dirilis Ertugrul

तुर्की टीवी सीरियल भारतीय दर्शकों के बीच पर्याप्त चर्चित रहे हैं। हिंदी सीरियलों के बरक्स वे धीमी रफ़्तार, शांत और सूक्ष्म अभिनय शैली के लिए जाने जाते हैं, लेकिन अर्तुगुल में इनके अलावा एक्शन, रोमांच और रहस्य भी है। हर एपिसोड में कुछ ऐसा घटित होता है कि दर्शकों को अगले की प्रतीक्षा बन जाए। युद्ध, राजनीति, छल-कपट, प्रेम, त्याग- एक बुरा चरित्र कुछ दिनों बाद अच्छे में बदल जाता है और एक अच्छा चरित्र, अप्रत्याशित रूप से बुरा बनकर चौंका देता है। और यह सबकुछ ऐतिहासिक कहानी के दायरे में रहते हुए।

Dirilis Ertugrul

सीरियल का नाम है ‘दिरिलिस अर्तुगुल’। नेटफ्लिक्स पर नाम मिलेगा ‘रीसरेक्शन : अर्तुगुल’। 2014 में आया। अपने मुल्क तुर्की में खूब पॉपुलर रहा। इतना की पांच सीज़न आ गए। फिर लगभग 6 साल बाद उसकी भनक भारतीय उपमहाद्वीप को लगी। पहले हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को। वहां बंपर हिट रहा। खुद उनके वज़ीर-ए-आज़म इमरान ख़ान ने इसे देखने की अपील कर डाली। फिर हिंदुस्तानियों तक खबर पहुंची। ख़ास तौर से मुस्लिम यूथ तक। अब वो भी पगलाए पड़े हैं।

क्या है अर्तुगुल?

इसके बारे में एक लाइन में कहा जाए तो ‘ऑटोमन एम्पायर’ यानी ‘उस्मानिया सल्तनत’ के उभरने की गौरव गाथा है। इस तुर्की साम्राज्य की टाइमलाइन लगभग सवा छह सौ साल की है। तेरहवीं शताब्दी के अंत से लेकर 1923 में तुर्की रिपब्लिक के बनने तक। ऑटोमन एम्पायर सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक इतना ताकतवर हो चुका था कि कई भाषाओं वाले भूभाग पर राज करता था।

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एशिया से लेकर योरोप और उत्तरी अफ्रीका के कई हिस्सों तक फैला हुआ था। इसी एम्पायर के संस्थापकों और शासकों की रोमांचक कहानियों का बहुत विशाल कैनवास है ‘दिरिलिस अर्तुगुल’। बेसिकली मुस्लिम तुर्कों की आक्रमणकारी मंगोलों से लेकर बाइज़ेंटाइन (पूर्वी रोमन) साम्राज्य वालों से हुई लड़ाइयां। अभी तो फिलहाल सीरियल में इस एम्पायर की नींव में पत्थर ही भरे जा रहे हैं। पांच सीज़न की कहानी अर्तुगुल ग़ाज़ी को केंद्र में रखकर है, जो ऑटोमन एम्पायर के संस्थापक उस्मान के पिता थे। तुर्की इतिहास में उन्हें एक बड़ा नायक माना जाता है, क्योंकि उनके प्रयासों और सैन्य अभियानों ने आगे चलकर अलग-अलग क़बीलों को एक होकर एक दीर्घजीवी साम्राज्य में तब्दील होने के लिए प्रेरित किया।

इतिहास में अर्तुगुल के बारे में अधिक जानकारियां नहीं, लेकिन लोककथाओं और किंवदंतियों ने उनके व्यक्तित्व को लगातार क़द्दावर बनाए रखा। वह तेरहवीं शताब्दी में काई क़बीले के सरदार सुलेमान शाह के दूसरे बेटे थे। उनके जन्म का वर्ष नहीं पता, लेकिन उनकी मृत्यु 1280 में हुई थी, इसका उल्लेख इतिहास में है। इस कहानी में अर्तुगुल को 25-26 वर्ष का दिखाया गया है। यानी कहानी 1225 के आसपास घटित होती है। बंजारों की तरह एक से दूसरी जगह भटकने वाले क़बीलों के लिए वह एक मुश्किल समय था, क्योंकि उनके शत्रु चारों ओर थे। एक तरफ़ मंगालों का आक्रमण, दूसरी तरफ़ ईसाई-मुस्लिम धर्मयुद्ध का संकट। इनके अलावा कई बार उन्हें स्थानीय अमीरों और सुल्तानों के साथ भी संघर्ष करना पड़ता था।

ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी का वह समय भयानक धर्मयुद्धों से भी संत्रस्त रहा। ईसाइयों और मुसलमानों में एक के बाद एक अनेक संघर्ष हुए। ईसाई यरूशलम पर अपना क़ब्ज़ा चाहते थे, जो कि मुसलमानों के अधीन था। और मुसलमान, इस्तांबुल (कुन्स्तुनतुनिया) को अपने साम्राज्य में मिलाना चाहते थे, जिस पर ईसाई धर्मावलंबी बाइजेंटाइन राजवंश का शासन था। पश्चिमी एशिया के इस भूखंड को दोनों धर्म के लोग अपनी-अपनी पवित्र भूमि के रूप में देखते आए और उस पर पूरी तरह क़ाबिज़ होने की कोशिशों ने इतिहास के सबसे रक्तरंजित पन्नों की रचना की। मंगोलों से जान बचाते हुए काई क़बीला वर्तमान इराक़ और ईरान के बीच भटकता हुआ सीरिया के हलब (अलेप्पो) में जगह पाता है।

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अपने लिए एक नए भूखंड की तलाश और वहां पहुंचकर स्थापित होने के लिए इस क़बीले को कई क़ुर्बानियां देनी पड़ती हैं, क्रूर राजनीतिक दुष्चक्रों और ख़ूनी लड़ाइयों से गुज़रना पड़ता है और यह सब होता है नौजवान और निर्भीक अर्तुगुल ग़ाज़ी के नेतृत्व में। एक ऐसा चरित्र, जिसके बारे में इतिहास में आठ-दस पन्नों से अधिक जानकारी नहीं मिलती, उस पर एक महाकाव्यात्मक आख्यान की रचना भी इस टीवी सीरियल की एक बड़ी कामयाबी है। इसमें समांतर इतिहास के अन्य चरित्रों की मदद लेकर एक बेहद कल्पनाशील और आकर्षक टाइमलाइन की रचना की गई है।

हलब के अमीर अल-अज़ीज़ का चरित्र हो या प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान इब्ने अरबी, इनकी समांतर कहानियों को अर्तुगुल की गाथा के साथ सूक्ष्मता और रोचकता के साथ जोड़ा गया है। इब्ने अरबी को अर्तुगुल के आध्यात्मिक मार्गदर्शक की तरह चित्रित किया गया है। इब्ने अरबी मूल रूप से स्पेनिश थे, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र स्पेन के अंदालूसिया से लेकर तुर्की के अनातोलिया तक फैला हुआ था। उन्होंने यायावर जीवन जिया था। कविता, दर्शन, सूफ़ीवाद और अध्यात्म पर उन्होंने सात सौ से अधिक कृतियों की रचना की थी।

अर्तुगुल की विशेषता सिर्फ़ इतिहास के संघर्षपूर्ण पन्ने ही नहीं है, बल्कि इस्लाम को लेकर एक समावेशी और व्यापक दृष्टि भी है। शिया और सुन्नी संप्रदायों की मान्यताओं के बीच संतुलन का एक प्रयास भी इसमें है। इस्लामोफोबिया से जूझ रहे इस समय में यह सीरियल इस्लाम की मूल परिभाषा को प्रस्तुत करने का प्रयास भी करता है।

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क़ुरान से लंबे-लंबे उद्धरणों को नाटकीय और कथात्मक ढंग से फिल्माकर हिंसा के बीच अहिंसा के महत्व को दिखाने की कोशिश है। अमन और भाईचारे के संदेशों के बरक्स विश्वविजय की इस्लामी आकांक्षा इसके कमोबेश हर चरित्र में व्याप्त है, लेकिन इसके बावजूद सीरियल के रचयिता मेहमेत बोज़दाग और निर्देशक मेतीन ग्यूने ने इसे एक उपदेशात्मक धार्मिक कथा में तब्दील होने से बचाए रखा है। यह एक मनोरंजक और विचारोत्तेजक सीरियल है।

अर्तुगुल का चरित्र तुर्की के अभिनेता एंजीन अल्तान दुज़्यातान ने निभाया है। उनके बारीक अभिनय के कारण उनकी तुलना मार्लन ब्रांडो से की जा रही है। अर्तुगुल ग़ाज़ी (तुर्की में दीरीलीश अर्तुगुल) सीरियल को देखते हुए गॉडफादर के कथा-सूत्रों को भी अंतर्धारा की तरह बहते हुए महसूस किया जा सकता है।

प्रमुख किरदार कौन हैं?

    1. अर्तुगुल ग़ाज़ी – काई कबीले का जांबाज़ सरदार. सीरियल का सेंट्रल कैरेक्टर.
  1. हलीमा सुलतान – अर्तुगुल ग़ाज़ी की पत्नी. अपने पति के साथ कई लड़ाइयों में कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाली योद्धा.
  2. सुलेमान शाह – अर्तुगुल के पिता. पहले सीज़न में प्रॉमिनेंट रोल.
  3. हायमा हातून – अर्तुगुल की मां. सुलेमान शाह की मौत के बाद कई सालों तक कबीला खुद चलाया. इनकी फौज में महिलाएं भी होती थी.
  4. गुलदारो – अर्तुगुल का भाई. कभी बाग़ी तो कभी साथी.
  5. इब्न-ए-अरबी – सूफी संत और अर्तुगुल के उस्ताद कम सलाहकार.
  6. तुर्गुत – अर्तुगुल का सबसे वफादार सैनिक. बेख़ौफ़ योद्धा.
  7. बामसी – तुर्गुत की तरह ही एक और वफादार सैनिक.
  8. दोगान – एक और विश्वासपात्र सैनिक. तुर्गुत, बामसी और दोगान साए की तरह अर्तुगुल के साथ रहते थे.
  9. कुर्दोगलू – सुलेमान शाह का ख़ास आदमी. जिसने कबीले को बहुत नुकसान पहुंचाया. खुद को लीडर बनाने के लिए षड्यंत्र रचने वाला आदमी.
  10. देली देमिर – कबीले के लिए तलवारें बनाने वाला शख्स. सुलेमान शाह का वफादार.

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