वाशिंगटन, 19 मई (वेब वार्ता)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर वित्तीय गतिविधियों और शेयर कारोबार को लेकर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। हाल में सामने आए वित्तीय खुलासों के अनुसार वर्ष 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ट्रंप से जुड़े निवेश खातों में हजारों शेयर सौदे दर्ज किए गए, जिसके बाद अमेरिका में पारदर्शिता और हितों के टकराव को लेकर बहस तेज हो गई है।
अमेरिकी सरकारी नैतिकता कार्यालय के समक्ष दाखिल वित्तीय विवरणों के अनुसार जनवरी से मार्च के बीच 3700 से अधिक निवेश सौदे दर्ज किए गए। इन सौदों का कुल मूल्य 220 मिलियन डॉलर से लेकर लगभग 750 मिलियन डॉलर के बीच बताया गया है। इस खुलासे के बाद वॉल स्ट्रीट और राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ गई है।
रिपोर्टों के अनुसार ट्रंप से जुड़े निवेशों में एनविडिया, ओरैकल, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, बोइंग और कॉस्टको जैसी बड़ी कंपनियां शामिल रहीं। कुछ निवेशों का मूल्य 10 लाख डॉलर से 50 लाख डॉलर के बीच बताया गया है। वहीं माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और मेटा जैसी कंपनियों में करोड़ों डॉलर के शेयर बेचे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
विवाद का एक बड़ा कारण वित्तीय जानकारी देने में हुई देरी है। अमेरिकी कानून के तहत एक निश्चित सीमा से अधिक के शेयर सौदों की जानकारी तय समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य होता है। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ सौदों की जानकारी समय पर नहीं दिए जाने के कारण ट्रंप पर विलंब शुल्क लगाया गया है। हालांकि यह जुर्माना अपेक्षाकृत मामूली राशि का बताया गया है।
इस पूरे मामले पर व्हाइट हाउस और ट्रंप संगठन की ओर से सफाई भी दी गई है। उनका कहना है कि ये निवेश पूरी तरह स्वतंत्र तृतीय पक्ष प्रबंधित खातों के जरिए संचालित होते हैं। बयान के अनुसार निवेश संबंधी फैसले स्वचालित प्रणालियों और बाहरी वित्तीय संस्थानों द्वारा लिए जाते हैं तथा ट्रंप, उनके परिवार या ट्रंप संगठन का किसी विशेष शेयर के चयन या खरीद-बिक्री में सीधा हस्तक्षेप नहीं होता।
फिर भी विपक्षी नेताओं और नैतिकता पर नजर रखने वाले समूहों ने सवाल उठाए हैं कि राष्ट्रपति पद पर रहते हुए इतनी बड़ी मात्रा में शेयर कारोबार हितों के टकराव की आशंकाएं बढ़ा सकता है। अमेरिका में पहले भी सार्वजनिक पदों पर बैठे नेताओं के शेयर निवेश और पारदर्शिता को लेकर बहस होती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल निवेश या जुर्माने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या सर्वोच्च सरकारी पदों पर बैठे लोगों के लिए शेयर कारोबार संबंधी नियम और अधिक सख्त किए जाने चाहिए।




