कौन सुलगा रहा नागरिकता की आग!

-आशीष वशिष्ठ-

नागरिकता संशोधन अधिनियम को लेकर हो रही हिंसा के पीछे विपक्षी दलों की भूमिका गंभीर तरह से संदेह के घेरे में है। इसका पुख्ता प्रमाण यह है कि विपक्ष के किसी भी दल ने हिंसा और उपद्रवियों की निंदा के लिए एक शब्द तक नहीं बोला। ऐसे में विपक्ष की चुप्पी को क्यों नहीं मौन सहमति न मानी जाए? कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने संदेश में केंद्र सरकार पर बंटवारे की राजनीति करने का आरोप तो लगाया, लेकिन उन्होंने हिंसक प्रदर्शनों और उग्र प्रदर्शनकारियों की निंदा करना जरूरी नहीं समझा। विपक्ष का यह व्यवहार स्पष्ट तौर पर इशारा करता है कि उसका हाथ आग बुझाने वालों की बजाय आग लगाने वालों के साथ है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अपनी राजनीति चमकाने की गरज से विपक्ष का इतना नकारात्मक व्यवहार इससे पहले शायद ही कभी देखने को मिला हो। इस राजनीति को देश की जनता को समझना होगा।

विपक्ष की नकारात्मक राजनीति को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) की आड़ में जो हिंसा हो रही है, उसके दर्द का असली केंद्र बिंदु कहीं और है। वास्तव में जो हिंसक प्रदर्शन, आगजनी और तोड़फोड़ सीएए की आड़ में हो रही है, वह तीन तलाक, अनुच्छेद-370, राम मंदिर के विरोध से उपजी नाराजगी, कुंठा और हताशा का मिश्रण है। अगर इसको समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण को रोकने का पराजित प्रयास भी कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। अपने पहले और दूसरे कार्यकाल के शुरूआती महीनों में मोदी सरकार ने तमाम बड़े फैसले लिये हैं। हर निर्णय के बाद विपक्ष को लगा कि वह देश की जनता को सरकार के विरोध में खड़ा कर लेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

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देशवासियों ने समझदारी दिखाई और विपक्ष के बहकावे में नहीं फंसे। विपक्ष को लगने लगा कि अगर मोदी सरकार ऐसे ही एक के बाद एक बड़े फैसले करती रही और उसे जनता का समर्थन मिलता रहा तो उसकी राजनीति का क्या होगा? जिन मुद्दों को दशकों से लटकाकर कांग्रेस समेत देश के अन्य राजनीतिक दल जनता को बेवकूफ बनाते रहे, उन पर मोदी सरकार ने मात्र साढ़े पांच साल में फैसले लेने का साहस दिखाया। भाजपा की निर्णय लेने की बढ़ती शक्ति और साहस से समूचा विपक्ष सदमे की स्थिति में आ गया और उस मौके का इंतजार करने लगा, जब मोदी सरकार को घेरकर उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया जा सके। विशेषकर मुस्लिम विरोधी साबित किया जा सके। आखिरकार विपक्ष को यह अवसर नागरिकता अधिनियम की आड़ में मिल गया। उसके बाद जो कुछ हो रहा है, सारा देश देख रहा है।

CAA-Protest

विपक्ष मुस्लिम समुदाय को नागरिकता अधिनियम को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के साथ मिलाकर भ्रम और भय फैला रहा है। दुख की बात यह कि मुस्लिम समुदाय उनके बिछाए जाल में फंसकर अपने ही हाथों से अपने बाप-दादाओं के मुल्क को आग के हवाले करने पर उतारू है। विपक्ष के षडयंत्र का शिकार छात्र भी हैं, जो बड़ी चिंता का कारण है। कम से कम विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों से ऐसी नासमझी भरी उम्मीद नहीं की जा सकती।

प्रदर्शनों में शामिल लोगों को लग रहा है कि असम में जिस तरह एनआरसी के चलते लाखों लोगों की नागरिकता खतरे में पड़ गई है, वैसा ही उनके साथ भी होगा, लेकिन सच्चाई बिल्कुल अलग है। सीएए और एनआरसी अलग-अलग हैं। अगर इसे सीधे शब्दों में समझें तो नागरिकता अधिनियम पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आये छह धर्म के लोगों को बसाने की कोशिश है। सीएए को लेकर एक और जो गलत धारणा बनायी जा रही है, वो यह है कि इस वजह से भारतीय मुसलमान अपने अधिकारों से वंचित हो जाएंगे। सच यह है कि अगर कोई ऐसा करना चाहे तो भी इस कानून के तहत यह संभव नहीं है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कई मंचों से सीएए के बारे में अपना मत स्पष्ट कर चुके हैं। अब अगर देशवासी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की बात पर ही भरोसा नहीं करेंगे तो फिर किस पर भरोसा किया जाएगा?

एनआरसी बिल का जिन, तलाशता सियासी जमीन

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के वक्त से ही कांग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति को पाला-पोसा है। पिछले दो-तीन दशकों में उभरे क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी वोट बैंक की बैसाखी के सहारे ही फली-फूली है। देश पर पांच दशक से अधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस देशहित से जुड़े तमाम मुद्दों पर चुप्पी साधे रही। आज देश जिन परेशानियों से गुजर रहा है उसकी जिम्मेदारी कांग्रेस की ही बनती है। मोदी सरकार ने देशहित में अपनी राजनीति को खतरे में डालकर देशहित में तमाम फैसले लिये हैं। जिस अनुच्छेद-370 को कांग्रेस और तमाम दलों ने पिछले 70 सालों से हौव्वा बना रखा था, उसे मोदी सरकार ने जड़ से खत्म करने की हिम्मत दिखाई है। आज जिस नागरिकता अधिनियम को लेकर विपक्ष भ्रम फैला रहा है, उस नागरिकता कानून का समर्थन वर्ष 2003 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनमोहन सिंह संसद में कर चुके हैं।

NRC-CAB

देश के तमाम विवादित मुद्दों में राम मंदिर शायद सबसे बड़ा मुद्दा था। माननीय सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फैसला सुना चुका है। बड़ी बात यह रही कि फैसला आने के बाद देश की शांति को आंच नहीं आई। अंदर ही अंदर विपक्ष को यह शांति और सदभाव भी नागवार गुजरा। विपक्ष को लगा कि ऐसे तो मोदी सरकार का ‘सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा कामयाब हो जाएगा। एक सच्चाई यह भी है कि विपक्ष मोदी सरकार को पिछले साढ़े पांच साल में एक भी वाजिब मुद्दे पर घेर नहीं पाया। सरकार के दामन पर भ्रष्टाचार के दाग भी नहीं लगे। जिस यूपीए के दस वर्षों के शासन में भ्रष्टाचार और घोटालों के नये-नये उदाहरण बने, उन्हें विकास की बात करने वाली, साफ-सुथरी और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार कैसे रास आएगी, ये आसानी से समझा जा सकता है।

विपक्ष को मालूम है कि नागरिकता कानून के बाद एनआरसी लागू होगी। ऐसे में पूर्वोत्तर, पश्चिम बंगाल समेत देश के अन्य हिस्सों में जिन दलों की राजनीति घुसपैठियों के सहारे चलती है, उनकी राजनीति एनआरसी के बाद बंद होना तय है। विपक्ष नागरिकता कानून के विरोध की आड़ में मोदी सरकार पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बनाना चाह रहा है, ताकि भविष्य में सरकार ऐसे और फैसले लेने से डरे जिसका सीधा असर उनकी राजनीति पर पड़ता हो।

मीडिया रपटों के अनुसार मोदी सरकार एनआरसी, समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने पर विचार कर रही है। इन कानूनों की चर्चा काफी समय से देशभर में हो रही है। ईमानदारी से सोचिए और समझिए तो इन तमाम कानूनों से देशवासियों को फायदा ही होगा। लेकिन षडयंत्रकारी विपक्ष अभी से ऐसा माहौल बना रहा है कि जनता सरकार के विरोध में खड़ी दिखाई दे। जिससे डर कर सरकार तमाम निर्णयों पर विचार करने की बजाय हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए। विपक्ष को ऐसे कुप्रचार की राजनीति से बाज आना चाहिए। सरकार को भी भ्रम की स्थिति साफ करनी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)  

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