Tuesday , 28 January 2020

पश्चिम बंगाल में विलुप्त होती विचारों की राजनीति

-प्रभुनाथ शुक्ल- Prabhunath-Shukla

पश्चिम बंगाल की राजनीति में हिंसा और रक्तपात का पुराना इतिहास रहा है। यह हिंसा क्यों होती हैं और कौन कराता है। हिंसा का मकसद क्या होता, यह किसी से छुपा नहीं है। राजनीति में विचारों की बजाय तलवारों की संस्कृति क्यों बढ़ रही है, यह ज्वलंत प्रश्न है। बुद्ध के संदेश अहिंसा परमो धर्म: के उलट हम क्यों चलने लगे हैं। सरकारें और उनके समर्थक इतना नीचे क्यों गिरने लगे हैं, यह कहना मुश्किल है। हमारे भीतर विचारों की संवेदना और इंसानियत मर रही है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद की घटना हमें झकझोड़ती है। ऐसी आजादी का भला क्या मतलब जो आजादी होकर भी गुलामी हो। अंग्रेजों और मुगलों की गुलामी से हिंदुस्तान आजाद हो गया लेकिन सियासी गुलामी से कब आजाद होगा कहना मुश्किल है।

आजादी के बाद हमें संविधान और विधान मिला। सामंतवादी और रजवाड़ों का दौर खत्म हुआ। लोकतांत्रिक व्यवस्था का सूत्रपात हुआ। सरकारें और व्यवस्था मिली। लेकिन जमीनी हकीकत है कि हमें विचार नहीं मिल पाया। पूरी दुनिया में हम प्रभावशाली लोकतंत्र होने का दंभ भरते हैं। जबकि हमारी सोच आज भी सामंत और भोगवादी है, जिसकी बदबू चारों ओर बिखरी पड़ी है। क्योंकि देश सामंती और रजवाड़ों की पृष्ठभूमि से निकलकर लोकतंत्र की दहलीज पर पहुंचा था। जिसकी वजह से हमारी लोकतांत्रिक व्यस्था में वह सोच, संस्कृति और संस्कार आज भी कायम है। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में बढ़ती राजनीतिक हत्याएं इसका प्रबल उदाहरण हैं।

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक शिक्षक परिवार के तीन लोगों की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गयी कि वह हिंदू विचारधारा के संगठन आरएसएस से जुड़े थे। जिन लोगों की हत्या की गयी उसमें शिक्षक बंधु प्रकाश पाल, उनकी गर्भवती पत्नी और आठ साल का बच्चा भी शामिल है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दावा है कि मारे गए परिवार का ताल्लुक आरएसएस से था। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार क्या संदेश देना चाहती है। क्या किसी विचारधारा से जुड़ना गुनाह है? क्या हिंदू परिवार में जन्म लेना अभिशाप है? पश्चिम बंगाल को क्या ममता हिंदुत्व से मुक्त करना चाहती हैं? आखिर इस तरह की हिंसा का मकसद क्या है। हम विचारधारा को तलवारों से नहीं काट सकते हैं। राजनीति में हिंसा की नीति अपनाकर सत्ता के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं कर सकते हैं। पश्चिम बंगाल में जब 40 साल पुराना वामपंथ का किला ढह गया। देश की आजादी में एक दिशा देने वाली और पंडित नेहरू एवं इंदिरा गांधी की विरासत वाली कांग्रेस का पतन हो गया। पश्चिम बंगाल में ममता की सरकार अजेय कैसे रह सकती है? लोकसभा चुनाव में जिस तरह पश्चिम बंगाल में राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई, उसका सियासी फायदा क्या ममता को मिला? इसके बाद भी भाजपा ने 20 से अधिक सीटों पर भगवा फहराया। वह भी तब जबकि राज्य में दीदी ने भाजपा को रोकने के लिए हर चाल चली।

पश्चिम बंगाल कभी वामपंथ का गढ़ था, वहां दक्षिणपंथ के उदय की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी लेकिन राजनैतिक परिस्थितियां ऐसी बदली कि वामपंथ का यह किला धराशायी हो गया। लोकतंत्र में सत्ता के स्थायित्व का सिद्धांत बेमानी है। लोकतंत्र हमेशा विचारों और बदलाव का समर्थक रहा है। लेकिन बदले दौर में सरकारों का मकसद केवल सत्ता का पोषण हो गया है। हम सार्वभौमिक विकास और उसकी नीतियों की तिलांजलि दे रहे हैं। विचारों को सत्ता के लिए रक्तपात से जोड़ दिया जाय तो उसका परिणाम सुखद नहीं होता। देश में जिस तरह की राजनैतिक संस्कृति पनप रही है वह घातक और विद्रूप है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हमने विचारों के बजाय सियासी परिभाषाएं गढ़ना शुरू कर दिया है। एखलाक, तबरेज, अकबर, बंधु प्रकाश, कांसगज जैसी सैकड़ों घटनाओं को हमने जाति, धर्म, संप्रदाय में बांट दिया है। हमने यह कभी गौर नहीं किया कि मरने वाला हिंदुस्तानी ही है। मॉब लिंचिंग और राजनैतिक हत्या से जुड़ी ऐसी घटनाओं को एक हिंदुस्तानी के नजरिये से देखते तो हमारी सोच इतना नीचे नहीं गिरती।

राजनैतिक हत्याओं से किसका फायदा और किसका नुकसान होता है, यह विचारणीय बिंदु है। जमीनी कार्यकर्ता जिसके लिए झंडे लेकर नारे लगाते हैं और शहीद हो जाते हैं, उन्हें क्या मिलता है। राजनैतिक हिंसा में अबतक हजारों लोगों का कत्ल हुआ है, लेकिन यक्ष प्रश्न है कि संबंधित राजनैतिक शहदों और उनके परिवारों या उत्तराधिकारियों को क्या मिला। परिवार के मुखिया के जाने के बाद ऐसे हजारों परिवारों की हालत क्या है। सत्ता में आने के बाद संबंधित दलों ने क्या कभी इसका सर्वे कराया। ऐसे परिवारों की जिंदगी कैसे बसर हो रही है। जिस विचारधारा के लिए लोग एक दूसरे पर मरने- मारने पर उतारू होते हैं, क्या उन्होंने यह कभी सोचा कि उनके बाद उनके अपनों की हालत क्या होगी। भारतीय लोकतंत्र हमेशा सहिष्णुता का समर्थक रहा है। यहां हिंसा का कोई स्थान नहीं है। राजनैतिक हत्याओं पर विराम लगना ही चाहिए। लोकतंत्र में तलवारों के बजाय विचारों को अहमियत मिलनी चाहिए।

(लेखक पत्रकार हैं।)

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