अंधविश्वास ने एक बार फिर डिगाई आस्था

-योगेश कुमार सोनी-

एक बार फिर से अंधविश्वास मानव जीवन पर भारी पड़ गया। छत्तीसगढ़ के महासुमंद जिले में एक युवक की अंधविश्वास के चलते जान चली गई। हालांकि ऐसी खबरें अब ज्यादा अटपटी नही लगती क्योंकि इस तरह के मामलें रोजाना हमारे सामने आते हैं। लेकिन इस बार की घटना कुछ अलग है। एक तीस वर्षीय युवक एक गढ़्ढे में पांच दिन की समाधि लेकर अपनी आस्था का प्रदर्शन कर रहा था लेकिन जब उसे बाहर निकाला तो मृत निकला। बात स्वाभाविक भी है कि ऐसे में व्यक्ति की जान जाना तय है लेकिन ऐसा वो पहले भी कई बार कर चुका था लेकिन समय सीमा कम होती थी। वह पहले वर्ष 25 घंटे, दूसरे वर्ष 48 घंटे, तीसरे वर्ष 72 घंटे और चौथे वर्ष 96 घंटे की समाधि ले चुका था। लेकिन चारों बार बेहोशी की हालात में निकाला,किस्मत अच्छी थी तो वह बच जाता था लेकिन इस बार उसने समय अवधि को बढ़ा दिया था और जब उसे बाहर निकाला लेकिन किस्मत ने इस बार साथ नही दिया। गांववासियों के अनुसार वर्ष 2015 से इस तरह से समाधि ले रहा था। पहली बार जब समाधि ले रहा था तो पुलिस ने मौके पर पहुंचकर उसे समाधि लेने से मना किया फिर भी वह नहीं माना और उसने घटना को धार्मिक आस्था से जोड़ दिया था। उसने सतनाम पंथ का पुजारी और बाबा गुरूघासीदास की प्रेरणा बताकर इसे धार्मिक आस्था का रंग दे दिया था जिस वजह से पुलिस भी कार्रवाई करने से पीछे हट गई थी। इस घटना के बाद महासमुंद जिले में जिला प्रशासन ने आत्महत्या रोकने नवजीवन कार्यक्रम चलाया है लेकिन सवाल एक ही है कि हम घटना होने के बाद ही क्यों जागते है। जहां एक ओर हम डिजिटल युग की तरफ इतनी तेजी से बढ़ रहे हैं वही दूसरी ओर ऐसी घटनाएं हमें इतनी शर्मसार कर रही हैं जिससे कई बार हमें यह लगता है कि हमारी तरक्की में कोई ओर नही हम ही बाधा बन रहे हैं।

ज्ञात हो कि कुछ समय पूर्व दिल्ली के बुराडी इलाके मे एक ही परिवार के ग्यारह लोगों की रहस्मयी मौत हो गई थी। मंजर इतना खतरनाक था कि उस घटना से पूरा देश हिल गया था। हमारे देश मे आज भी लोग टाने-टोटके जैसी चीजों पर भरपूर विश्वास करते है। तांत्रिकों के व्यापार का स्तर बड़े पैमाने मे कार्यरत है। यदि आप किसी लाल बत्ती पर देखोगे तो तांत्रिकों के कार्ड आपको देने के लिए लोग आ जाते है। मनचाहा प्यार,काम-धंधे मे बाधा,बच्चे पैदा होने मे परेशानी को दूर करना,पडोसी को काबू करना आदि अन्य कई मूर्खताभरी भरी बातें उनके कार्ड पर लिखी होती है। परेशान लोग इन धूर्तों के चक्कर मे आ जाते है और स्वंय अपनी जिंदगी बर्बाद कर लेते है।ऐसी घटनाओं से रोजाना सैंकडों लोग पीड़ित होते है।

कुछ दिनों पहले भी पुणे से एक मामला सामने आया था जहां आईसीयू मे इलाज करा रही एक महिला के लिए किसी डॉक्टर ने तांत्रिक को बुलाकर इलाज करवाया था। दो दिन तक उस तांत्रिक ने कई इलाज-उपचार किए लेकिन उसकी मौत हो गई। ऐसी कई घटनाएं हैं आपको बताने के लिए लेकिन यह अहम इसलिए है क्योंकि इस प्रकरण मे डॉक्टर था जो निश्चित तौर पर पढ़ा-लिखा ही होगा। लेकिन वो भी इन टोने-टोटको की दुनिया मे बहुत विश्वास करता है। जरा आप खुद ही सोचिए कि यदि यह लोग तांत्रिकों,बाबाओं या मुल्ला-मौलवियों पर विश्वास करेगें तो आम आदमी का क्या होगा और लोग डॉक्टर के पास न जाकर केवल इस तरह के लोगों के पास ही जाएगें। पहले ऐसे लोगों की संख्या कम थी, और यह मिथा केवल अशिक्षित व आर्थिक तौर से कमजोर लोगों तक सीमित थी लेकिन अब हर वर्ग का व्यक्ति इनका शिकार होने लगा।

ये बात लोगों को आजतक समझ नही आई कि तांत्रिक विधा करने वाले लोग अपना भला तो कर नही पाए वो दूसरों का हल कैसे निकालेगें। कई बार तो यह भी देखा गया है कि अपनी समस्याओं का हल निकालने के लिए लोग अपने बच्चों की बलि तक भी दे देते है। उत्तर प्रदेश के किसी इलाके मे एक दंपत्ति ने बेटे की चाह मे तांत्रिक के कहने से अपनी तीन बेटियों की बलि तक दे डाली थी।इसके सिवाय भी ऐसे कई दर्दनाक किस्से है जिससे कई परिवार व जिंदगियां बर्बाद हो गई। जैसा कि तांत्रिकों की दुकान या काम धंधों के विषय मे पता चला तो यह हमारे देश मे पूर्ण रुप से गैर-कानूनी है बावजूद इसके यह खूब पनप रहा है। यह धंधा इतने खुलेआम किस आधार पर इतने बड़े स्तर पर चल रहा है? सवाल तो अभी भी कई हैं लेकिन यदि शासन-प्रशासन से इसके विषय में पूछा जाता है तो सब कुछ गोलमोल जबाव दिया जाता है।

बहराहल,झारखंड की घटना से अधूरे ज्ञान या यूं कहें कि पागलपन को फिर उजागर कर दिया। आखिर इस तरह का काम करने से ऐसे लोग क्या साबित करना चाहते हैं,यदि आपको भक्ति में लीन होना है तो इसके तमाम सुगम रास्ते हैं। दरअसल कुछ लोग ढोंगियों के चक्कर में आकर अधूरा ज्ञान व अपनी आस्थाओं की शक्ति प्रदर्शन करने के चक्कर में अपनी जान दे देते हैं।आपको और हमें ऐसी घटनाओं को रोकना होगा क्योंकि आस्था के नाम ऐसे किसी जान जाना दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

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