Wednesday , 22 January 2020

दिल्ली को संवारने वाली शीला दीक्षित ने कांग्रेस को दी थी संजीवनी, बुलंदी पर पहुंचाया

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को दिल्ली का चेहरा बदलने का श्रेय दिया जाता है। उनके कार्यकाल में दिल्ली में विभिन्न विकास कार्य हुए। अगर आपने शीला दीक्षित के कार्यकाल से पहले की दिल्ली देखी हो तो आपको शीला के कार्यकाल में हुए विकास आसानी से समझ आ जायेंगे।

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का शनिवार दोपहर को निधन हो गया। 81 साल की शीला दीक्षित लंबे समय से बीमार चल रही थीं। उन्हें दिल की बीमारी थी और बताया जा रहा है कि पिछले दिनों उन्हें उलटी आने की शिकायत के बाद दिल्ली के एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शीला दीक्षित साल 1998 से लेकर 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार तीन बार दिल्ली में सरकार बनाई थी।

शीला दीक्षित का परिचय

शीला दीक्षित का जन्म 31 मार्च 1938 को पंजाब के कपूरथला में हुआ था। उन्होंने दिल्ली के कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी स्कूल से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की और उसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज से मास्टर्स ऑफ आर्ट्स की डिग्री हासिल की। शीला दीक्षित 1984 से 1989 तक उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद रहीं और केंद्र में मंत्री बनाई गईं।

दिल्ली की सूरत ही बदल दी

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को दिल्ली का चेहरा बदलने का श्रेय दिया जाता है। उनके कार्यकाल में दिल्ली में विभिन्न विकास कार्य हुए। अगर आपने शीला दीक्षित के कार्यकाल से पहले की दिल्ली देखी हो तो आपको शीला के कार्यकाल में हुए विकास आसानी से समझ आ जायेंगे। दिल्ली में मेट्रो का जो जाल फैला है, फ्लाई ओवरों की संख्या बढ़ाकर ट्रैफिक जाम की समस्या से निजात दिलाई गई है, सरकारी अस्पतालों और स्कूलों की हालत सुधारी गयी है, दिल्ली को हरा-भरा किया गया है, वह सब शीला दीक्षित की देन है। दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन सेवा आज पूर्णतया सीएनजी आधारित है तो इसका पूरा श्रेय शीला दीक्षित को ही जाता है। शीला के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल से पहले दिल्ली में जबरदस्त बिजली कटौती होती थी और डेसू के कार्यालयों पर प्रदर्शन होते रहते थे। शीला दीक्षित ने बिजली क्षेत्र का निजीकरण कर राज्य के लोगों को बिजली कटौती की मुश्किल से निजात दिलाई।

शालीन राजनीतिज्ञ

आज जब हम देखते हैं कि दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार का केंद्र सरकार के साथ हमेशा मनमुटाव रहता है तो शीला दीक्षित से सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने वर्तमान सरकार के समान अधिकारों के अंतर्गत ही मुख्यमंत्री के रूप में शानदार काम करके दिखाया और तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के साथ भी कभी उनका मनमुटाव इस स्तर तक नहीं पहुँचा कि धरना प्रदर्शन की नौबत आ जाये। शीला दीक्षित के लिये तो कहा भी जाता था कि वह राजनेता के रूप में नहीं बल्कि एक सीईओ के रूप में दिल्ली को संवारने का काम करती हैं। शीला दीक्षित एक भद्र राजनीतिज्ञ थीं और इतिहास उन्हें एक अच्छा प्रदर्शन करने वाले ऐसे राजनीतिज्ञ के रूप में याद रखेगा जो हमेशा विरोधियों के साथ भी शालीन व्यवहार रखती थीं।

कैसे विवादों से घिरीं शीला

साल 2009 में शीला पर आरोप लगे कि उन्होंने केंद्र सरकार की तरफ से जवाहर लाल नेहरू नैशनल अर्बन रीन्यूअल मिशन के तहत मिले 3.5 करोड़ रुपये का गलत इस्तेमाल किया। हालांकि, मामले की जांच कर रहे लोकायुक्त ने इस आरोप को खारिज कर दिया। शीला साल के अंत में तब फिर विवादों में घिरीं जब उन्होंने हाई प्रोफाइल जेसिका लाल हत्याकांड के दोषी मनु शर्मा के परोल को मंजूरी दे दी। शीला ने अपने फैसले का बचाव किया लेकिन हाई कोर्ट में जब उनसे प्रभावशाली व्यक्ति को विशेष सुविधा देने का सवाल पूछा तो उन्होंने पाला तत्कालीन उपराज्यपाल के पाले में फेंकते हुए कहा कि मनु शर्मा को परोल देने के लिए वह जिम्मेदार हैं क्योंकि वह सिर्फ उन फाइलों पर साइन कर रही थीं जो उचित चैनल से आए थे। शीला सरकार पर भ्रष्टाचार के अगले आरोप 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में लगे। कैग की रिपोर्ट में यह आरोप लगाए गए थे कि खेल के आयोजन के दौरान स्ट्रीट लाइट्स के लिए आयात उपकरणों में गड़बड़ियां की गई हैं। हालांकि, तत्कालीन मुख्य सचिव ने दावा किया था कि इससे संबंधित कॉन्ट्रैक्ट में शीला की कोई भूमिका नहीं थी।

अन्ना आंदोलन : शीला की हार की जमीन

शाली के लंबे राजनीतिक करियर अपने ढलान पर पहुंचने लगी थी क्योंकि उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के लग रहे आरोप कम होने का नाम नहीं ले रहे थे। इस बीच ‘रालेगांव सिद्धि’ के गांधी कहे जाने वाले अन्ना हजारे ने जन लोकपाल की मांग करते हुए आंदोलन शुरू कर दिया जिसमें उनका साथ दे रहे थे पूर्व आईआरएस अधिकारी अरविंद केजरीवाल। यह आंदोलन इतना लोकप्रिय हुआ कि दिल्ली की जनता अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी हुई। जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा तो लोगों ने हाथोहाथ लिया और केजरीवाल की नवगठित आम आदमी पार्टी (आप) ने शीला के 15 साल के शासन को हिला कर रखा दिया। यहां तक कि 2013 विधानसभा चुनाव में शीला को अरविंद केजरीवाल के हाथों नई दिल्ली सीट से हार का मुंह देखना पड़ा।

राजनीति के अंतिम दिन ठीक नहीं रहे

शीला दीक्षित वर्तमान में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थीं लेकिन दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको के साथ उनकी नहीं बनती थी। पीसी चाको लगातार शीला दीक्षित के अधिकारों को कम करते जा रहे थे जिससे प्रदेश कांग्रेस में विवाद भी हो रहा था। हालिया लोकसभा चुनावों में वह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी के खिलाफ लड़ी थीं लेकिन हार गयी थीं। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको लोकसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करना चाहते थे लेकिन शीला दीक्षित इस गठबंधन के खिलाफ थीं। शीला के रुख को देखते हुए राहुल गांधी को भी पीछे हटना पड़ा था। शीला दीक्षित जब तक मुख्यमंत्री रहीं तब तक भी पार्टी का एक धड़ा उनके खिलाफ ही रहा लेकिन आलाकमान का वरदहस्त शीला को प्राप्त होने के कारण 15 साल कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाया।

गांधी परिवार की विश्वस्त

शीला दीक्षित को हमेशा गांधी परिवार का करीबी माना जाता रहा। सोनिया गांधी और राहुल गांधी, दोनों ही शीला दीक्षित का काफी सम्मान करते थे। 1998 में हुए लोकसभा चुनावों में जब सोनिया गांधी ने शीला दीक्षित को पूर्वी दिल्ली संसदीय सीट से भाजपा उम्मीदवार लाल बिहारी तिवारी के खिलाफ उम्मीदवार बनाया तो सभी चौंक गये थे। हालांकि शीला दीक्षित चुनाव नहीं जीत पाई थीं लेकिन फिर भी सोनिया गांधी ने 1998 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले शीला दीक्षित के हाथों में दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंप दी। यह वह दौर था जब दिल्ली में सज्जन कुमार सब पर भारी थे।

शीला दीक्षित ने जबरदस्त रणनीति बनाई और उस समय 100 रुपए किलो तक पहुँच रहे प्याज के दाम को ऐसा बड़ा मुद्दा बनाया कि लोग कांग्रेस की ओर आकर्षित हो गये और कांग्रेस ने सुषमा स्वराज के नेतृत्व वाली दिल्ली की सरकार को उखाड़ फेंका। जिसके बाद शीला दीक्षित ने 15 साल तक दिल्ली की सत्ता पर एकछत्र राज किया। यह उनके काम का ही ईनाम था कि दिल्ली के लोग उन्हें बार-बार सत्ता में बैठाते रहे जबकि अन्य राज्यों में सरकारों को दूसरा कार्यकाल मिलना बड़ा मुश्किल होता था। शीला दीक्षित ने 1998 में भाजपा को सत्ता से ऐसे उखाड़ा था कि वह अब तक वापसी नहीं कर पाई है।

लेकिन शासन के अंतिम वर्ष में कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे और उसी दौरान आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से ऐसी लहर पैदा हुई कि शीला दीक्षित सरकार को सत्ता से बुरी तरह बेदखल होना पड़ा। शीला दीक्षित को बाद में कांग्रेस आलाकमान ने राज्य की राजनीति से हटा दिया और उन्हें केरल का राज्यपाल बनाकर भेज दिया लेकिन 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद शीला दीक्षित ने यह पद छोड़ दिया। शीला दीक्षित को उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी घोषित किया था लेकिन जब विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन हो गया तो शीला दीक्षित की उम्मीदवारी वापस ले ली गयी।

बहरहाल, शीला दीक्षित ने दिल्ली का जो विकास किया वह भी विकास का एक मॉडल हो सकता है। वह कांग्रेस के उन कुछ नेताओं में शुमार थीं जिनका अपना जनाधार था। शीला दीक्षित का जाना कांग्रेस पार्टी के लिए तो बड़ा झटका है ही गांधी परिवार ने भी अपना एक विश्वस्त साथी खो दिया है। अगले साल होने वाले दिल्ली के विधानसभा चुनावों से पहले शीला दीक्षित का यूँ चला जाना कांग्रेस पार्टी की संभावनाओं को भी कमजोर कर गया है।

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