Wednesday , 29 January 2020
Makar Sankranti 2020

Makar Sankranti 2020 : जाने क्‍यों मनाते हैं मकर संक्रांति, इस दिन मनाई जाएगी

हिंदू धर्म में सूर्यदेवता से जुड़े कई प्रमुख त्‍योहारों को मनाने की परंपरा है। उन्‍हीं में से एक है मकर संक्राति (Makar Sankranti 2020)। शीत ऋतु के पौस मास में जब भगवान भास्‍कर उत्‍तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो सूर्य की इस संक्रांति को मकर संक्राति के रूप में देश भर में मनाया जाता है। वैसे तो मकर संक्रांति हर साल 14 जनवरी को मनाई जाती है, लेकिन पिछले कुछ साल से गणनाओं में आए कुछ परिवर्तन के कारण इसे 15 जनवरी को भी मनाया जाने लगा है।

इसलिए 14 नहीं 15 जनवरी को मनेगी मकर संक्रांति (Makar Sankranti)

15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाए जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह है कि इस साल सूर्य का मकर राशि में आगमन 14 जनवरी मंगलवार की मध्य रात्रि के बाद रात 2 बजकर 7 मिनट पर हो रहा है। मध्य रात्रि के बाद संक्रांति होने की वजह से इसके पुण्य काल का विचार अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त से लेकर दोपहर तक होगा।

मकर संक्रांति का पुण्य काल

शास्त्रीय नियम के अनुसार मध्यरात्रि में संक्रांति होने पर पुण्य काल का विचार अगले दिन का होता है। इसी वजह से इस वर्ष मकर संक्रांति बुधवार 15 जनवरी को मनाया जाना शास्त्र सम्मत होगा।

मकर संक्रांति का दान पुण्य

सूर्य के मकर में प्रवेश के समय तुला लग्न जागृत रहेगा और नक्षत्र पूर्वाफाल्गुनी होगा इसलिए ज्योतिषीय दृष्टि से इसे उग्र संक्रांति भी माना जाएगा। मकर संक्रांति के अवसर पर सूर्योदय से पूर्व स्नान और उगते सूर्य को जलार्पण करके तिल, गुड़ लाल चंदन अर्पण करना बहुत ही शुभ फलदायी माना गया है।

इसका करें पाठ

शास्त्रों में इस दिन आदित्य हृदय स्तोत्र, पुरुष सूक्त, नारायण कवच का पाठ करना उत्तम फलदायी कहा गया है। इस अवसर पर तिल, गुड़, कंबल, वस्त्र, अन्न और ब्राह्ण भोजन करना एवं खिचड़ी का भोग भगवान को लगाकर प्रसाद बांटना व्यक्ति के लिए स्वर्ग के द्वार खोलता है।

दान और स्‍नान का विशेष महत्‍व

शास्‍त्रों में मकर संक्रांति के दिन स्‍नान, ध्‍यान और दान का विशेष महत्‍व बताया गया है। पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन बताया गया है। मान्‍यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस लौटता है।

भीष्म पितामाह ने चुना था आज का दिन

मान्यता है कि इस अवसर पर दिया गया दान 100 गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।

पौराणिक कथा

श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण के मुताबिक, शनि महाराज का अपने पिता से वैर भाव था क्योंकि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख लिया था, इस बात से नाराज होकर सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था। इससे शनि और छाया ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था।

यमराज ने की थी तपस्या

पिता सूर्यदेव को कुष्ट रोग से पीड़ित देखकर यमराज काफी दुखी हुए। यमराज ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्त करवाने के लिए तपस्या की। लेकिन सूर्य ने क्रोधित होकर शनि महाराज के घर कुंभ जिसे शनि की राशि कहा जाता है उसे जला दिया। इससे शनि और उनकी माता छाया को कष्ठ भोगना पड़ रहा था। यमराज ने अपनी सौतली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कल्याण के लिए पिता सूर्य को काफी समझाया। तब जाकर सूर्य देव शनि के घर कुंभ में पहुंचे।

मकर में हुआ सूर्य का प्रवेश

कुंभ राशि में सब कुछ जला हुआ था। उस समय शनि देव के पास तिल के अलावा कुछ नहीं था इसलिए उन्होंने काले तिल से सूर्य देव की पूजा की। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनि को आशीर्वाद दिया कि शनि का दूसरा घर मकर राशि मेरे आने पर धन धान्य से भर जाएगा। तिल के कारण ही शनि को उनका वैभव फिर से प्राप्त हुआ था। इसलिए शनि देव को तिल प्रिय है। इसी समय से मकर संक्राति पर तिल से सूर्य एवं शनि की पूजा का नियम शुरू हुआ।

मकर संक्रांति के अलग-अलग रंग, जानिए कहां कैसे मनाते हैं

भारत विविधताओं का देश है। यहां फेस्टिवल कोई भी हो लेकिन उसे किसी शहर विशेष या फिर प्रांत विशेष में नहीं मनाते बल्कि पूरे देश में मनाए जाते हैं। ऐसा ही एक पर्व है मकर संक्रांति। इसे भारत के अलग-अलग राज्‍यों में अलग नामों से मनाते हैं। मसलन तमिलनाडु में इसे पोंगल नाम से मनाते हैं। तो आइए जानते हैं कि इसे किस राज्‍य में कैसे, कब और किस नाम से मनाते हैं…

उत्‍तर प्रदेश में मकर संक्रांति

उत्‍तर प्रदेश में पोंगल मकर संक्रांति के नाम से मनाया जाता है। इस पर्व को ‘दान का पर्व’ कहा जाता है। इसे 14 जनवरी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन से यानी कि 14 जनवरी मकर संक्रांति से पृथ्‍वी पर अच्‍छे दिनों की शुरुआत होती है और शुभकार्य किए जा सकते हैं। संक्रांति के दिन स्‍नान के बाद दान देने की परंपरा है। गंगा घाटों पर मेलों का भी आयोजन होता है। पूरे प्रदेश में इसे खिचड़ी के नाम से भी जानते हैं।

तो यहां मनती है लोहिड़ी

हरियाणा और पंजाब में इसे 14 जनवरी से एक दिन पूर्व मनाते हैं। वहां इस पर्व को ‘ लोहिड़ी’ के रूप में सेलिब्रेट करते हैं। इस दिन अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने मक्‍के की उसमें आहुत‍ि दी जाती है। यह पर्व नई-नवेली दुल्‍हनों और नवजात बच्‍चे के लिए बेहद खास होता है। सभी एक-दूसरे को तिल की बनीं मिठाईयां खिलाते हैं और लोहिड़ी लोकगीत गाते हैं।

बंगाल में खास है मकर संक्रांति

बंगाल में इस पर्व पर गंगासागर पर बहुत बड़े मेले का आयोजन होता है। यहां इस पर्व के दिन स्‍नान करने के बाद तिल दान करने की प्रथा है। कहा जाता है कि इसी दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्‍ण की प्राप्ति के लिए व्रत रखा था। साथ ही इसी दिन मां गंगा भगीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा सागर में जा मिली थीं। यही वजह है कि हर साल मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर में भारी भीड़ होती है।

बिहार में खिचड़ी

बिहार में भी मकर संक्रांति को खिचड़ी के ही नाम से जानते हैं। यहां भी उड़द की दाल, चावल, तिल, खटाई और ऊनी वस्‍त्र दान करने की परंपरा है। इसके अलावा असम में इसे ‘माघ- बिहू’ और ‘ भोगाली-बिहू’ के नाम से जानते हैं।

तमिलनाडु में 4 दिनों तक मनाते हैं पर्व

तमिलनाडू में इस पर्व को चार दिनों तक मनाते हैं। यहा पहला दिन ‘ भोगी – पोंगल, दूसरा दिन सूर्य- पोंगल, तीसरा दिन ‘मट्टू- पोंगल’ और चौथा दिन ‘ कन्‍या- पोंगल’ के रूप में मनाते हैं। यहां दिनों के मुताबिक पूजा और अर्चना की जाती है। राजस्‍थान में इस दिन बहुएं अपनी सास को मिठाईयां और फल देकर उनसे आर्शीवाद लेती हैं। इसके अलावा वहां किसी भी सौभाग्‍य की वस्‍तू को 14 की संख्‍या में दान करने का अलग ही महत्‍व बताया गया है।

महाराष्‍ट्र और नेपाल में खास है मकर संक्रांति

महाराष्‍ट्र में इस दिन गूल नामक हलवे को बांटने की प्रथा है। तो इस तरह पूरे भारत में इस पर्व को अलग-अलग तरह की परंपराओं के साथ मनाया जाता है। नेपाल में भक्‍त इस दिन अच्‍छी फसल के लिए ईश्‍वर को धन्‍यवाद देते हैं और प्रार्थना करते हैं कि सभी पर उनकी कृपा हमेशा बनीं रहे। वहां इस पर्व को ‘ फसल का त्‍योहार’ या फिर ‘ किसानों के त्‍योहार’ के रूप में भी जानते हैं। बता दें कि नेपाल में मकर संक्रांति के दिन सार्वजनिक अवकाश होता है।

कब है पोंगल

साल 2020 में पोंगल 14 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। इसमें मुख्‍य तिथ‍ि 15 जनवरी मानी जाएगी। साल 2021 में 13 जनवरी से 16 जनवरी तक पोंगल का आयोजन होगा। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मुख्‍य तिथि 14 जनवरी होगी। वहीं साल 2022 में भी पोंगल 13 जनवरी से 16 जनवरी तक मनाया जाएगा। इसमें मुख्‍य तिथ‍ि 14जनवरी को माना जाएगा।

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