-छात्रों के भविष्य के सवाल से आगे बढ़कर क्या राजधानी में बड़े राजनीतिक टकराव और अस्थिरता की पटकथा लिखी जा रही है
नीट परीक्षा में पेपर लीक का मामला निश्चित रूप से करोड़ों विद्यार्थियों और उनके परिवारों से जुड़ा गंभीर विषय है। किसी भी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठना देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होना भी आवश्यक है। किंतु पिछले कुछ दिनों में जिस प्रकार यह मुद्दा दिल्ली की सड़कों से लेकर संसद और प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचा, उसने इस पूरे घटनाक्रम को केवल छात्रों के आंदोलन तक सीमित नहीं रहने दिया। अब यह संघर्ष शिक्षा व्यवस्था से अधिक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और सरकार को घेरने की रणनीति के रूप में दिखाई देने लगा है।
जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा मंच बन गया। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और उससे जुड़े संगठनों के आंदोलन में विपक्षी दलों की सक्रिय भागीदारी ने यह संकेत दिया कि पेपर लीक के मुद्दे को सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक अभियान में बदला जा रहा है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का प्रधानमंत्री आवास तक मार्च निकालना और वहीं धरना देना भारतीय राजनीति की असाधारण घटना रही। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन प्रत्येक दल का अधिकार है, लेकिन प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के बाहर धरना देकर राजनीतिक संदेश देने की रणनीति ने अनेक प्रश्न भी खड़े किए हैं।
सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बातचीत का प्रयास किया और संसद में चर्चा के लिए तैयार होने की बात कही। इसके बावजूद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष का अड़े रहना इस बात का संकेत देता है कि अब विवाद केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रह गया है। विपक्ष इसे सरकार की नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न बना रहा है, जबकि सरकार इसे राजनीतिक टकराव का रूप देने का आरोप लगा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहली बार इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देते हुए पेपर लीक को “घोर पाप” बताया और कहा कि दोषियों को कठोरतम दंड दिलाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह राजनीति का नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य का विषय है और केंद्र तथा राज्यों को मिलकर ऐसी घटनाओं को रोकना होगा। सरकार का दावा है कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है और भविष्य में परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा।
दूसरी ओर आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई ने पूरे विवाद को और अधिक संवेदनशील बना दिया। दिल्ली हाईकोर्ट में भी इस संबंध में याचिका दायर हुई, हालांकि तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए अदालत ने नियत तिथि पर सुनवाई करने का निर्णय लिया।
इसी बीच दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आए कुछ चैट संदेशों ने भी नए सवाल खड़े किए हैं। पुलिस का दावा है कि कुछ संदेशों में इंटरनेट बंद होने की स्थिति में गुप्त माध्यमों से संपर्क बनाए रखने और आंदोलन को किसी भी स्थिति में जारी रखने जैसी बातें सामने आई हैं। यदि जांच में ऐसे दावे प्रमाणित होते हैं तो यह केवल सामान्य छात्र आंदोलन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि कानून व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ा मामला भी बन सकता है। हालांकि इन दावों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया और जांच पूरी होने के बाद ही संभव होगी।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार छात्रों की आवाज दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल कर रही है। वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि आंदोलन में कुछ ऐसे तत्व शामिल हो गए हैं जिनका उद्देश्य केवल परीक्षा सुधार नहीं बल्कि राजधानी में अराजकता फैलाना और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। यह आरोप-प्रत्यारोप लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन यह भी आवश्यक है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों और जांच के परिणामों का इंतजार किया जाए।
कुछ स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान देश विरोधी नारे लगाए जाने के आरोप भी सामने आए हैं। यदि किसी आंदोलन में वास्तव में ऐसे तत्व सक्रिय पाए जाते हैं जो राष्ट्रीय हित के विरुद्ध कार्य कर रहे हों, तो उनके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होना स्वाभाविक है। किंतु ऐसे मामलों में पूरे आंदोलन या सभी प्रदर्शनकारियों को एक ही दृष्टि से देखना भी उचित नहीं होगा। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असामाजिक तत्वों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष आगामी चुनावी राजनीति को ध्यान में रखते हुए छात्रों के इस असंतोष को व्यापक जन आंदोलन में बदलने का प्रयास कर रहा है। वहीं सरकार इस पूरे घटनाक्रम को विपक्ष द्वारा राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत कर रही है। इस टकराव के बीच सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वास्तव में छात्रों के भविष्य से जुड़े मूल मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं।
कुछ लोगों की आशंका है कि जिस प्रकार पड़ोसी देशों में लंबे समय तक चलने वाले आंदोलनों ने राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दिया, उसी प्रकार की परिस्थितियां भारत में पैदा करने की कोशिश हो रही है। यह एक गंभीर आशंका है, जिसकी पुष्टि केवल तथ्यों और जांच के आधार पर ही की जा सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी आंदोलन को विदेशी घटनाओं या साजिशों से जोड़ने से पहले पर्याप्त प्रमाण आवश्यक होते हैं। फिर भी यह अपेक्षा अवश्य की जा सकती है कि किसी भी राजनीतिक दल या संगठन को ऐसा वातावरण नहीं बनने देना चाहिए जिससे राष्ट्रीय राजधानी में कानून व्यवस्था प्रभावित हो।
भारत का लोकतंत्र विरोध और संवाद दोनों की समान रूप से अनुमति देता है। संसद चर्चा का सर्वोच्च मंच है और यदि सरकार तथा विपक्ष दोनों वहां गंभीरता से बहस करें तो समाधान का रास्ता निकल सकता है। सड़क का संघर्ष यदि लगातार राजनीतिक टकराव में बदलता जाएगा तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं छात्रों का होगा जिनके भविष्य की रक्षा के नाम पर पूरा आंदोलन खड़ा हुआ है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि पेपर लीक जैसे अपराध पर राजनीति से ऊपर उठकर कठोर कार्रवाई हो, परीक्षा प्रणाली में सुधार हो और दोषियों को ऐसी सजा मिले जो भविष्य के लिए उदाहरण बने। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि लोकतांत्रिक विरोध की आड़ में हिंसा, अराजकता या कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाले तत्व सफल न हों। छात्रों का भविष्य किसी भी राजनीतिक संघर्ष का माध्यम नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता होना चाहिए। यही लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी भी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार-स्तम्भकार है)





