Tuesday , 28 January 2020

इमरान मियां! पहले पाकिस्तान सम्भालिए फ़िर परमाणु की सोचिए

-प्रभुनाथ शुक्ल-

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से धारा-370 और 35 ए हटाए जाने के बाद से बौखलाया हुआ है। खींसीयानी बिल्ली जैसी उसकी हालात है। वह करो और मरो की स्थिति में पहुंच चुका है। लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता और मर भी नहीं सकता है। बस! गीदड़ धमकी के सिवाय उसके पास कुछ नहीं है। वैश्चिक मंच पर कश्मीर को लेकर वह सिर्फ अपना मुंह बजा रहा है। अब तक कश्मीर पर उसे किसी देश का समर्थन नहीं मिल सका है। चीन के सहयोग से उसने यूएन में भी मसला उठाया लेकिन मुंह की खानी पड़ी। भारत की मजबूत कूटनीति की वजह से यूएई, बहरीन और अरब जगत उसे घास तक नहीं डाल रहे हैं। भाई जान, मुसलमान होने की दुहाई देते फिर रहे हैं। कश्मीर में मुसलमानों पर झूठी कहांनियां गढ़ रहे हैं। लेकिन इस्लामिक देश भी उनकी सुनने को तैयार नहीं हैं। जिसकी वजह से पाकिस्तान पूरी तरह से हताश और निराश हो चुका है। यूनएन में चीन को छोड़ कर सभी देश कश्मीर मसले पर भारत की नीतियों का समर्थन किया। पूरी दुनिया ने इसे भारत का आतंरिक मामला बताया। लेकिन मियां की बौखलाहट बढ़ गयी है। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कश्मीर संभाले कि कटोरा।

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान के सामने सबसे बड़ा संकट है कि अगर वह कश्मीर पर कोई ठोस नीति नहीं अपनाते हैं तो सेना उनका तख्ता भी पलट सकती है। क्योंकि पाकिस्तान में लोकतंत्र और सरकारें सिर्फ नाम की होती हैं। वहां तो जनरल बाजवा का शासन चलता है। कश्मीर को लेकर इमरान खान खुद अपने घर में घिर गए हैं। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टों ने उन्हें नंगा कर दिया है। विलावल का साफ संदेश है कि पाकिस्तान अब कश्मीर की चिंता छोड़ मुजफराबाद यानी पीओके की चिंता करे। पाकिस्तान के जीतने भी विपक्षी दल हैं वह भारत के फैसले के खिलाफ मियां पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मजबूत कूटनीतिक संबंधों की वजह से पाकिस्तान को दुनिया से अलग-थलग कर दिया है। पाकिस्तान का चीन के अलावा कोई साथ देने वाला नहीं है। उसकी लाख गुहार के बाद भी मुस्लिम देशों ने उसकी एक भी नहीं सुनी है। भारत ने साफ कहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच जीतने भी मसले हैं वह द्विपक्षीय हैं, इसमें तीसरे की दखल संभव नहीं है। अमेरिकी राष्टपति डोनाल्ड टंप ने भी अपनी नीति बदल दिया है। वह भी इस मसले पर भारत से नाराजगी नहीं लेना चाहते हैं। क्योंकि अगर चीन अमेरिका नीतिगत दबाब चाहता है तो उसे भारत के साथ खड़ा होना होगा। रसिया, फ्रांस और दूसरे देश भारत के समर्थन में हैं।

भारत के लिए कश्मीर अब कोई मसला नहीं रह गया है। वह भारत का अभिन्न अंग बन गया है। कश्मीर भारत के दूसरे राज्यों की तरह ही इस गणराज्य का हिस्सा है। पाकिस्तान संयुक्तराष्ट संघ से लेकर दूसरे मंचों पर कश्मीर-कश्मीर का राग अलापता रहा है। दुनिया के किसी फोरम पर वह कश्मीर मानवाधिकार की आड़ में भारतीय फौज को कटघरे में खड़ा करता रहा है। लेकिन अब कश्मीर पर हक जताने का सारा रास्ता साफ खत्म हो गया है। भारत ने एक झटके में कश्मीर से विशेष रियायती धाराओं के साथ अलगाव वादियों को मिलने वाली सुविधाओं को खत्म कर दिया है। पाकिस्तान के पास कश्मीर पर परमाणु हमले का राग अलापने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता है। पाकिस्तान के पास छद्म युद्ध के सिवाय कुछ बचता नहीं है। पाक सेना भारत में आतंकवाद की फसल तैयार करने नए सिरे से जुट गयी है। इस काम में पाकिस्तानी सेना आतंवादियों की भरपूर मदद कर रही है। लेकिन भारतीय खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां उसकी हर साजिश को नाकाम करने में लगी हैं। वह कश्मीर के अलावा भारत के बड़े शहरों में तबाही की नई इबादत लिखना चाहता है। समुद्र के जरिए आतंकवादियों की नयी खेप भेजने में लगा है। खुफिया एजेंसियों की माने तो वह ऐसे आतंकीवादी भेज रहा है जो पानी के अंतर तैर कर भारत की सीमा में प्रवेश कर सकते हैं। कश्मीर से सटे सीमावर्ती इलाकों में आतंकवादियों को घूसाने के लिए लांचपैड़ तैयार किए गए हैं। वह आतंवादियों को हर हाल में कश्मीर में भेज कर भारत को अस्थिर करना चाहता है।

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भारत सरकार कश्मीर को पुनः वह आजादी लौटाना चाहती है जिसके लिए वह दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन वहां के अलगाववादी सरकार की इस सोच को पूरा नहीं होने देंगे। कश्मीर में धारा-370 हटाए जाने के 20 दिन बाद भी हालात सामान्य नहीं है। कश्मीर के हालात को लेकर देश में राजनीति हो रही है। कांग्रेस और दूसरे दल सरकार को कटघरे में खड़े कर रहे हैं। लेकिन अहम सवाल है कि सरकार कश्मीर में अमन लौटाने के लिए ही तो काम कर रही है। क्या इस हालात में कश्मीर से सेना हटायी जा सकती है। जब आतंकवादी आम नागरिकों को निशाना बना कश्मीरियों का गुस्सा भारत के खिलाफ भड़काना चाहते हैं। दो दिन पूर्व वहां दो आम नागरियों की हत्या कर दहशत फैलाने का काम किया गया है। लेकिन सेना पूरी तरह सतर्क और है और हर साजिश को नाकाम करने में लगी है। कश्मीर में अमन-चयन तभी लौटेगा जब आम कश्मीरी मुख्यधारा में लौटेगा। यह तभी संभव होगा जब लोगों का वहां के अलगाववादियों से मोहभंग होगा। सरकार अलगाववादियों पर पूरी तरह शिकंजा कसा है। कश्मीर की जेलों में बंद काफी संख्या में आतंकवादियों को देश के दूसरी जेलों में भेजा है। यूपी में 120 से अधिक आतंकवादियों को लाया गया है। सरकार स्थिति को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश कर रही है। स्कूल खुल गए हैं संचार सेवाएं भी बहाल कर दी गयी हैं। कुछ जिलों को छोड़ कर शांति हैं। अस्पतालों में लोगों को इलाज की सुविधा उपलब्ध है। बाजार खुले हैं, फल और सब्जी के अलावा रोजमर्रा की वस्तुएं मिलने लगी हैं। लेकिन कई ऐसे जिले हंै जहां हालात आज भी बुरे हैं। क्योंकि यहां अलगाववादियों का इलाका है। उनकी चलती है, जिसकी वजह से सेना को दिक्कते हैं।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी कश्मीर नहीं जा पाए। वहां के जमींनी हालात की पड़ताल उन्हें नहीं करने दिया गया जिसका उन्हें मलाल है। हवाई जहाज में उनसे कुछ महिलाओं ने बताया कि वहां के हालात सामान्य नहीं है। आम लोगों को दिक्कत हो रही है। बिल्कुल सच ऐसी बात वहां हैं। जिसने भी बताया है वह सच बताया है। राहुल गांधी की भी बात सच है। वहां के हालात सामान्य नहीं हैं। लेकिन राहुल गांधी को क्या यह नहीं मालूम है कि सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। यह फैसला कश्मीर के अगलगाववादियों के लिए बड़ा जख्म है। मैडम महबूबा, फारुख अब्दुल्ला और बेटे उमर अब्दुल्ला, गुलामनबी आजाद की राजनीति खत्म हो गई है। कश्मीर से कांग्रेस कब की गायब हो चुकी है। अगर कश्मीर में कांग्रेस का कोई वजूद बचा होता तो उसकी चिंता उन्हें करनी चाहिए थी। देश के वह युवा नेता हैं अपनी सोच को निश्चित दायरे से बाहर निकालें। कश्मीर पर राजनीति करने के बजाय सरकार के फैसले का समर्थन करें। सच्चाई यही है कि कश्मीर में हालात इतने जल्द सामान्य होने वाले नहीं है। कश्मीर गुरिल्ला युद्ध का स्थल बन गया है। वहां भारतीय सेना और आतंकवादियों के बीच इस तरह के हालात हैं। कश्मीर पर सराकर की आलोचना करने वालों ने क्या यह सोचा है कि अगर वहां सेना हटा ली जाए तो क्या हालात होंगे। जब पूरा देश सरकर के साथ खड़ा है फिर कश्मीर पर राजनीति करने से क्या हासिल होने वाला है। पाकिस्तान कश्मीर पर अपनी नीति पर बदलाव करे। वह चीन के हाथों में खेलने से बाज आए। कश्मीर पर अटका रहा तो उसके हाथ में भीख का कटोरा बना रहेगा। परमाणु हमले का सपना बेवजह क्यों देखता है। तीन युद्ध की पराजय शायद उसे याद नही है।

(स्वतंत्र लेखक और पत्रकार)

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