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चीन को कैसे दें मात

-भरत झुनझुनवाला- bharat jhunjhunwala

चीन की तुलना में हमारी तीन ताकत हैं। पहली यह कि हमारी जनसंख्या की औसत आयु 28 वर्ष है जबकि चीन की जनसंख्या की 38 वर्ष। कोरोना वायरस युवाओं को कम प्रभावित करता है, इसलिए हमारे यहां कोरोना का संकट कम होना चाहिए। दूसरी, हमारे देश का औसत तापमान 23 डिग्री सेल्सियस है जबकि चीन का सात डिग्री सेल्सियस। हमारा देश गर्म होने के कारण कोरोना का प्रभाव कम होना चाहिए। तीसरी ताकत यह है कि हमारी महारत सेवा क्षेत्र में है जैसे सॉफ्टवेयर, मेडिकल ट्रांसक्रिप्शन, ट्रांसलेशन, इत्यादि में। यह क्षेत्र कोरोना से कम प्रभावित होता है क्योंकि इस क्षेत्र की तमाम सेवाओं को घर से प्रदान किया जा सकता है। तुलना में चीन की महारत मैन्युफेक्चरिंग में है जहां पर श्रमिकों का एक स्थान पर आना और मिलकर कार्य करना अनिवार्य हो जाता है। इसलिए हमारे लिए कोरोना के संकट के दौरान अर्थव्यवस्था को चालू रखना ज्यादा संभव है।

इन तीनों ताकतों के बावजूद आज चीन में नए कोरोना के केस लगभग शून्यप्रायः हो गए हैं और कुल 82 हजार केस आज तक हुए हैं। तुलना में अपने देश में प्रतिदिन लगभग चार हजार केस बन रहे हैं और कुल 56 हजार शुक्रवार को लेख लिखते समय हो चुके हैं। हमारे वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में यह संख्या दो लाख से भी अधिक हो सकती है। यानी अपनी तीनों ताकतों के बावजूद हमारी स्थिति चीन की तुलना में ज्यादा गड़बड़ है। इसका मुख्य कारण यह है कि चीन ने लॉकडाउन को सख्ती से लागू किया, उनका प्रशासन कुशल था। तुलना में अपने देश में तबलीगी जमात के कारण, प्रवासी श्रमिकों को लॉकडाउन में राहत न देने के कारण, शराब की बिक्री खोलने के कारण और धारावी जैसी झुग्गी बस्तियों के कारण हम कोरोना के फैलाव को रोकने में पूरी तरह असफल रहे हैं। हमारा प्रशासन फेल है। हमारी यह असफलता आज भी जारी है। चीन ने अपने मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र को पुनः चालू कर लिया है। आज विश्व में संभवतः चीन अकेला बड़ा देश है जो कि माल का पुरजोर उत्पादन कर विश्व को सप्लाई कर सकता है। इसलिए यदि दुनिया के किसी भी देश को कोई माल की जरूरत पड़े तो आज उसे मजबूरन चीन से ही वह खरीदना होगा।

इस समय चीन के विरुद्ध अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप शोर मचा रहे हैं। वह पूरे विश्व को चीन के विरोध में लामबंद करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। मेरा मानना है कि यह शोर टिकेगा नहीं। ट्रंप के शोर मचाने के पीछे अमरीका की गड़बड़ाती अर्थव्यवस्था दिखती है। अमरीकी सरकार भारी मात्रा में विश्व बाजार से ऋण ले रही है और इस ऋण का उपयोग अपनी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए कर रही है। विश्व बाजार में यह ऋण बड़ी मात्रा में चीन द्वारा ही सप्लाई किया जा रहा है। अमरीकी सरकार द्वारा लिए गए ऋण में 15 प्रतिशत सीधे चीन द्वारा उपलब्ध कराया गया है। दूसरे देशों द्वारा भी उपलब्ध कराए गए ऋण में चीन का हिस्सा दिखता है। जैसे चीन ने इंग्लैंड के बैंकों में रकम जमा कराई और इंग्लैंड के बैंकों ने उस रकम से अमरीकी सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बांड खरीदे। इसलिए अमरीका आर्थिक दृष्टि से दबा हुआ है और इस दबावट के कारण राष्ट्रपति ट्रंप चीन के विरोध में आवाज उठा रहे हैं।

बताते चलें कि लगभग चार वर्ष पूर्व अमरीका की खुफिया सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी ने कहा था कि अमरीका की सुरक्षा को सबसे बड़ा खतरा चीन की मुद्रा रेनमिन्बी से है। यानी सामरिक दृष्टि से अमरीका चीन से आर्थिक दृष्टि से दबता जा रहा है और इस कारण अमरीका की संप्रभुता ही संकट में आ रही है। अतः ट्रंप का शोर चीन के कारनामों के कारण कम और अपने कारनामों के कारण ज्यादा है। इसलिए यह शोर नहीं टिकेगा। ट्रंप के शोर के न टिकने का दूसरा कारण यह है कि बड़ी कंपनियों के लिए चीन से मैत्री लाभप्रद है। बड़ी कंपनियां एक देश से माल बना कर दूसरे देश में सप्लाई करती हैं। उनके लिए विश्व अर्थव्यवस्था का खुला रहना लाभप्रद होता है। इसलिए कुछ समय बाद अध्ययन प्रकाशित होने लगेंगे कि कोरोना का संकट आकस्मिक था और यह जरूरी नहीं कि ऐसा संकट दोबारा आए। ध्यान दिला दें कि 2013 में केदारनाथ में भारी तबाही मची थी, लेकिन जल विद्युत कंपनियों ने प्रचार किया कि यह एक आकस्मिक घटना थी और आज त्रासदी को अनदेखा करके जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को भारी प्रोत्साहन दिया जा रहा है।

इसी प्रकार कोरोना को भी हम शीघ्र भूल जाएंगे। इन सब बातों को देखते हुए मेरा अनुमान है कि कोरोना संकट के बाद विश्व अर्थव्यवस्था में चीन का दर्जा बढ़ेगा, घटेगा नहीं। फिर भी भारत के लिए अवसर हैं। हमने मैन्युफेक्चरिंग का एक बड़ा अवसर पहले ही गंवा दिया है। मार्च में लॉकडाउन करते समय यदि सरकार फैक्टरियों को छूट देती कि वे अपनी सरहद में ही श्रमिकों के रहने-खाने की व्यवस्था उपलब्ध कराएं और अपनी फैक्टरी चालू रखें तो आर्थिक संकट नहीं गहराता और हम उत्पादन जारी रखते और माल बनाकर निर्यात करते रह सकते थे। अपने मैन्युफेक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों को जारी रख सकते थे। यह चूक हो ही गई है, तो भी आज यह व्यवस्था की जा सकती है। जितने भी औद्योगिक संस्थान हैं, उनसे कहा जा सकता है कि वे अपने श्रमिकों के रहने-खाने की व्यवस्था अपने यहां करें और उत्पादन शुरू करें।

दूसरी बात यह कि सरकार को वित्तीय घाटा बढ़ाकर यानी ऋण लेकर इस संकट से उबरने का प्रयास नहीं करना चाहिए। सरकार यदि विश्व बाजार से ऋण लेती है तो उस ऋण का एक हिस्सा चीन से आएगा और हम पुनः किसी न किसी रूप में चीन के दबाव में आएंगे। उत्तम तो यह होगा कि पेट्रोल पर वर्तमान में 25 रुपए प्रति लीटर का जो टैक्स केंद्र सरकार द्वारा वसूल किया जा रहा है, उसे बढ़ाकर सीधे 100 रुपए कर दें और इस रास्ते लगभग 10 लाख करोड़ रुपए की वार्षिक आय हो सकती है, जिसका उपयोग हम अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में कर सकते हैं। ऐसा करने से पेट्रोल के ऊंचे दामों का विशेष दुष्प्रभाव उन संभ्रांत वर्ग पर पड़ेगा जो कि बाहर से लाए हुए माल अथवा ऊर्जा सघन माल की खपत करते हैं। आम आदमी इससे अछूता रहेगा और भारत सरकार को विश्व बाजार के सामने ऋण के लिए अपनी झोली नहीं फैलानी पड़ेगी। यदि हम ये दो कार्य कर दें तो हम अपनी अर्थव्यवस्था को चालू कर सकते हैं और चीन का सामना कर सकते हैं।

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