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रिटायर नही हुई हूं बस रोल बदल गया : दीपा मलिक

बीते दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा रियो पैरालिंपिक 2016 में पदक जीतने वालीं पहली भारतीय महिलाYogesh Kumar Soni ने राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित होकर इतिहास रचा था। इसके अलावा उन्होंने एशियन गेम्स में भी सिल्वर मेडल जीत चुकी हैं। लगभग आधा शरीर काम नही करने पर भी पूरे विश्व में देश का नाम रोशन व खेल रत्न जीतने वाली देश की पहली पैरा-एथलीट यह खिलाडी खेल जगत को खिलाडी के रुप में अलविदा करके पीसीआई अध्यक्षा बनकर दूसरी पारी खेलने के लिए तैयार है। नवनिर्वाचित पीसीआई अध्यक्ष व पद्मश्री से सम्मानित दीपा मलिक से योगेश कुमार सोनी की एक्सक्लूसिव बातचीत के मुख्य अंश…

पीसीआई अध्यक्ष बनने व अब नई पारी खेलने के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं। खिलाडी के रुप में सन्यास लेने का फैसला कब लिया?

पिछले वर्ष सिंतबर में जब पीसीआई के चुनाव की प्रक्रिया शुरु हुई थी तब ही मैंने सन्यास ले लिया था लेकिन लोगों को अब पता चला, दरअसल मैंने भी अधिकारिक घोषणा भी नही की थी। सन्यास के बाद ही मैंने अध्यक्ष पद के लिए चुनौती पेश करके चुनाव जीता था और मुझे यह लगा कि मीडिया या अन्य लोगों को यह बात समझ में आ जाएगी कि जब तक कोई खिलाडी सन्यास नही लेता तब तक वह किसी भी संस्था की कमेटी में पदाधिकारी नही बन सकता। मैंने अपने पेंशन के आवेदन के लिए फॉर्म भरा था और जिस पर मैंने ट्वीट किया और इसके बाद मीडिया को यह लगा कि मैंने अब सन्यास लिया है और इस पर खबरें चलानी शुरु कर दी।

पेंशन का फार्म अब क्यों भरा। क्या सन्यास लेने के बाद इसका तुरंत प्रावधान नही है?

ऐसा नही हैं, सन्यास लेने के अगले महीने ही फार्म भर सकते हैं। दरअसल मैं अपने काम में व्यस्त थी और अचानक विभाग के किसी सहयोगी ने बताया कि आपने पेंशन के लिए आवेदन दे दिया क्या? जिस पर मैंने अभी गौर किया और तुंरत फार्म डाउनलोड करके भरकर जमा करा दिया। उस ही कें संदर्भ में ही तो मैंने ट्वीट किया था जिस पर लोगों ने यह समझा कि मैं अब रिटायर हो रही हूं। इसके साथ एक बात यह भी कहना चाहती हूं कि यह फार्म भरते हुए मैं बहुत भावुक हो गई थी और मेरे आंसु भी निकल आए थे। बीते 15 वर्ष तक मैं एक खिलाडी के रुप में एक्टिव रही हूं लेकिन अब मुझे लगा कि मेरे एक दौर का अंत हो सा हो गया।

लेकिन अब तो आप एक खिलाडी से भी गंभीर पारी खेलने जा रही हैं। आपको खुश होना चाहिए।

जी मैं बेहद खुश हूं। दरअसल आप इस बात को ऐसे समझें कि जब बच्चे का स्कूली दौर खत्म होता है तब वो कितना दुखी होता है और उसकी असल जिंदगी उसके बाद ही शुरु होती है। लेकिन उस दौर में कितना अच्छा लगता है यह तो सब भलि-भांति जानते हैं। बस थोडा सा यही सोचकर भावुक हो गई थी।

कैसा रहा आपका सफर?

शादी से पहले मोटर रेसलर थी। उसी दौरान मेरी मुलाकात कर्नल विक्रम सिंह से हुई। मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदली और हमनें शादी कर ली। सब सही चल रहा था कि अचनाक मुझे स्पाइन ट्यूमर हो गया औऱ उस सर्जरी में 183 टांके आए। इसके बाद जिंदगी बिल्कुल खत्म सी हो गई थी। मेरे पति नौकरी छोड़कर आ गए थे और उन्होनें मेरे लिए फार्म हाउस पर सभी सुविधाओं से लैस एक ऐसा कमरा बनवा दिया जहां अपने जीवन आराम से निर्वाह कर सकती थी। लेकिन मैं इस सबसे खुश नही थी क्योंकि मैं एक कमरे में अंदर अपनी कहानी को खत्म नही होने देना चाहती थी और इसके बाद मैंने खुले आसमान में खुली सांस के साथ अपनी जिंदगी एक दूसरी पारी खेली जिससे मैंने यहां तक का सफर तय किया। अब अध्यक्ष बनकर हौसलों में पंख लग गए।

जिंदगी में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

हमारे देश में दिव्यागं होना एक अभिशाप समझा जाता है। लोगों को लगता है कि ऐसे लोग अपने व दूसरों की जिंदगी पर बोझ बन जाते हैं जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इस दुनिया में सबको समानता का अधिकार मिला हुआ है, हर कोई अपनी जिंदगी को कैसे भी जी सकता है। तमाम ऐसे दिव्यागं है जिनके भीतर हमेशा कुछ करने की ज्वाला जली रहती है लेकिन उनको समझने वाला कोई नही होता खासतौर पर लड़कियों व महिलाओं को लेकर लोगों की सोच शून्य है। जब मुझे जानलेवा बीमारी हुई थी तो मैंने हार नही मानी बल्कि उससे लड़ी और आगे बढ़ी। ऐसी बीमारी होने के बाद अक्सर लोग जिंदगी ही जीना छोड़ देते हैं लेकिन डॉक्टर भी कहते हैं कि जो दिल से जीना चाहता है भगवान भी उसका साथ देता है। ऐसी ही कुछ मेरे साथ हुआ और परिणाम आपके सामने है। अपने जीवन को लेकर एक भजन की लाइन याद आ गई ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।

आप लेखन कार्य भी करती है व सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हैं।

कुछ साख लोगों की जीवनशैली को अपने शब्दों से सजाने का प्रयास करती हूं। अपनी व कुछ महान खिलाडियों की बायोग्राफी लिखने का शौक है। इसके अलावा मैं उन दिव्यागं बच्चियों को प्रेरित करती हूं जो देश के लिए कुछ करना चाहती हैं। मैं कई संस्थाओं से जुड़ी हूं। मुझे लगता है कि बच्चियों के लिए अधिक काम करने की जरुरत है। देश में आज भी ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्हें एक बार मौका मिल जाए तो देश का नाम रोशन कर देगें। मैं 2006 से खेल रही हूं। हम दिव्यांग लोगों में चीजें काफी मुश्किल होती हैं क्योंकि कभी टूर्नामेंट्स में हमारी कैटिगरी होती हैं तो कभी नहीं होती। कभी हमारा इवेंट बदल दिया जाता है। हमें सीधे एंट्री नहीं मिलती है। हम कोटा के आधार पर जा पाते हैं क्योंकि इतने पैरा-एथलीटों को संभालना मुश्किल होता है। इसलिए दिव्यागों की सीधे तौर पर प्रवेश की व्यवस्था भी होने चाहिए। लेकिन अब मैं बतौर अध्यक्ष इन सभी समस्याओं को दूर करुंगी।

पैरा-ऐथलीट की कैटगरी की प्रक्रिया को समझाइए।

अगर ऐथलेटिक्स में देखा जाए तो सिर्फ एक 100 मीटर की रेस होती है लेकिन पैरा-ऐथलीट में 100 मीटर में 48 कैटिगरी में रेस होती हैं। सभी लोगों को संभालना मुश्किल होता है और इसलिए हमारा चयन लटक जाता है और दुनिया सोचती है कि हमारे में प्रतिस्पर्धा नहीं है, जो कि गलत धारणा है। अब हालांकि इस चीज में बदलाव हो रहा है जो भविष्य के लिए अच्छा संकेत है और खुशी कि बात यह है कि खेल जगत ने इस बात को समझा था। इतनी रिसर्च के बाद फैसला लिया है जो बेहद प्रशंसनीय है क्योंकि मैंने न्यूज़ पेपर में पढ़ा था कि मेरे अंक सबसे ज्यादा थे। इस घटना से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे पदकों की पहचान उन्होंने समझी।

लॉकडाउन में कैसे काम किया जा रहा है?

मैं ऑनलाइन सब खिलाडियों के संपर्क में हूं और को सीखा रही हूं। हर रोज अपने विडियो जारी करती हूं। मेरे द्वारा देश में पहली बार पैरा स्पोर्टस को जागरुक करने के लिए सेमिनार हो रहे हैं। हर रोज इसके सेशन चल रहे हैं जिसके विडियो वेबसाइट पर चल रहे हैं और इस सभी कार्यों को पैरा-एथलीट कमेटी ने सराहा रही हैं। मैं पैरा-एथलीट के लिए एक नई दुनिया का निर्माण करना चाहती हूं। पहले तो अपने लिए मेडल लाने की टेंशन होती थी अब सबके लिए टेंशन होगी। पहले की अपेक्षा काम बढ़ गया।

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