Friday, May 20, 2022
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हिंदी प्रेम या केवल ‘पर उपदेश’

-तनवीर जाफ़री-

पिछले दिनों संसदीय राजभाषा समिति की 37वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय गृह/सहकारिता मंत्री एवं राजभाषा समिति के अध्यक्ष अमित शाह ने हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी भाषा के विकल्प के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता जताई। उन्होंने कहा कि हिंदी को स्थानीय भाषाओं के विकल्प के रूप में नहीं बल्कि अंग्रेज़ी भाषा के विकल्प के रूप में स्वीकार करना चाहिए। इसी दौरान शाह ने यह भी बताया कि अब कैबिनेट के एजेंडे का 70 प्रतिशत भाग हिंदी में तैयार किया गया है। अमित शाह ने कहा कि अलग-अलग राज्यों के लोगों को आपस में हिंदी में बात चीत करनी चाहिए अंग्रेज़ी में नहीं। शाह ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निर्णय किया है कि सरकार चलाने का माध्यम राजभाषा है और इससे निश्चित रूप से हिंदी का महत्व बढ़ेगा। अमित शाह ने इससे पूर्व वर्ष 2019 में हिंदी दिवस के दौरान अपने भाषण में ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ की भी चर्चा की थी।

निश्चित रूप से हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है। इसका अधिक से अधिक प्रयोग किया जाना व इसके प्रयोग की वकालत करना भी सराहनीय है। परन्तु अमित शाह के इस बयान के बाद कुछ हिंदी भाषी राज्यों को छोड़ कर अधिकांश राज्यों विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों में उनके हिंदी प्रेम का विरोध शुरू हो गया। तमाम प्रमुख नेताओं ने फिर वही बातें करनी शुरू कर दीं कि किसे क्या खाना,क्या पहनना और कौन सी भाषा बोलना है यह आम लोगों पर ही छोड़ देना चाहिये। किसी ने इसे भाजपा का ‘सांस्कृतिक आतंकवाद’ बताया तो किसी ने इन प्रयासों को क्षेत्रीय भाषाओं के मूल्य को कम करने का एजेंडा बताया। भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी अन्नाद्रमुक समेत दक्षिण भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा भी इसका विरोध किया गया। अनेक नेताओं का मत है कि लोग चाहें तो अपनी मर्ज़ी से हिंदी अवश्य सीख बोल सकते हैं, परन्तु हिंदी को थोपा जाना हरगिज़ स्वीकार्य नहीं है।

परन्तु हिंदी भाषा के प्रसार विस्तार व प्रचार की इन शासकीय कोशिशों के बीच ख़ासकर गृह मंत्री शाह के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सरकार चलाने का माध्यम राजभाषा बताने और इससे हिंदी के महत्व को बढ़ावा देने के दावों के परिपेक्ष में यह देखना और समझना भी ज़रूरी है कि वास्तव में स्वयं प्रधानमंत्री मोदी,उनकी सरकार व अन्य राज्यों में भाजपा सरकारें भी क्या अंग्रेज़ी के बजाये हिंदी को ही संपर्क भाषा के रूप में प्रचारित व प्रसारित करने के लिये उतनी ही फ़िक्रमंद हैं भी जितनी कि वह दिखाई व सुनाई दे रही हैं? आईये स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गढ़ित उनकी प्रिय शब्दावलियों पर ही नज़र डालें और देखें कि वे स्वयं संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का इस्तेमाल अधिक करते हैं अथवा अंग्रेज़ी का? यदि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व उनकी छवि चमकाने वाला सबसे प्रमुख कोई शब्द सुनाई देता था तो वह था ‘वाइब्रेंट गुजरात’। वाइब्रेंट की जगह थरथराने वाला,कांपने वाला,फुर्तीला ,व्यावसायिक आदि कोई हिंदी शब्द भी इस्तेमाल किया जा सकता था परन्तु ‘वाइब्रेंट’ शब्द का इसीलिये इस्तेमाल किया गया ताकि पूरे देश और दुनिया को भी इसका अर्थ आसानी से समझ में आ सके।

चुनावी मैदान में भी मोदी अपने विरोधियों को लिये प्रायः अंग्रेज़ी की ही शब्दावली प्रयोग में लाते थे। जैसे उन्होंने समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, अखिलेश यादव तथा मायावती लिये स्‍कैम शब्द गढ़ा था। ऐसा ही मोदी गढ़ित शब्द था ‘आरएसवीपी मॉडल’। RSVP मॉडल’ का मतलब समझाते हुए मोदी ने कहा था कि आर यानी राहुल, एस मतलब सोनिया, वी अर्थात वाड्रा और पी का अर्थ प्रियंका है। इसी प्रकार विपक्ष के लिये उन्होंने अंग्रेज़ी के ही एबीसीडी शब्दों का इस्‍तेमाल करते हुए कहा बताया था कि ए से आदर्श घोटाला, बी से बोफ़ोर्स घोटाला, सी से सीडब्ल्यूजी व कोल घोटाला और डी से दामाद का कारोबार। और जब वे अपने एन डी की तारीफ़ करते तो फ़रमाते कि नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) का अर्थ नेशनल डेवलपमेंट एलायंस है। यहाँ तो सार से विस्तार तक सारा ही अंग्रेज़ी है।

मोदी जी नये नये शब्द व सूत्र गढ़ने में भी बहुत माहिर हैं परन्तु उनकी यह “सृजन शीलता” अंग्रेज़ी में ही होती रही है। जैसे उन्होंने 5टी का एक मन्त्र दिया था जिस का अर्थ टैलेंट, ट्रेडिशन, टूरिज़्म, ट्रेड व टेक्नोलॉजी बताया था। इसी तरह फ़ॉरेन डायरेक्‍ट इन्‍वेस्‍टमेंट यानी एफडीआई को उन्‍होंने फ़र्स्ट डेवलप इंडिया जैसा नया नाम दिया। यह भी पूर्णतयः अंग्रेज़ी में ही था। इस तरह के दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जो इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये काफ़ी हैं कि जो सरकार और उसके मुखिया गण हिंदी को संपर्क भाषा बनाने की पैरवी करते दिखाई देते हैं वे स्वयं ज़रूरत पड़ने पर अंग्रेज़ी का ही सहारा लेते हैं। जैसे कि सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज़ेज़ (सीपीएसई) के एक समारोह में प्रधानमंत्री ने सफलता के मंत्र की बात करते हुये 3 ‘आइ’ की सोच की बात की थी। थ्री आई यानी इंसेंटिव्स (प्रोत्साहन), इमेजिनेशन (कल्पना) और इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग (संस्था निर्माण)। यहीं उन्होंने न्यू इंडिया के निर्माण में सहभागिता बढ़ाने के लिये 5 ‘पी’ फ़ॉर्मूले पर चलने की ज़रुरत पर भी ज़ोर दिया था। मोदी ने 5 ‘पी’ का अर्थ बताया था -परफ़ॉर्मेन्स (प्रदर्शन), प्रोसेस (प्रक्रिया), पर्सन (व्यक्तित्व) प्रोक्योर्मेंट (प्राप्ति) और प्रिपेयर (तैयार करना)।

जब प्रधानमंत्री कोरोना से जंग के लिये मन्त्र देते तो वह भी अंग्रेज़ी के ‘4टी’ और थ्री टी मंत्र, होते थे। उन्होंने ने महाराष्ट्र, ओडिशा और दक्षिण भारत के 4 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मीटिंग के दौरान ‘4टी’ मन्त्र का फ़ॉर्मूला दिया। इसका अर्थ उन्होंने ‘हमें टेस्ट, ट्रैक, ट्रीट और टीका बताया था। भीम ऐप का अर्थ भी भारत इंटरफ़ेस फ़ॉर मनी है। इसी तरह की अनेक सरकारी शब्दावलियाँ जैसे मेक इन इण्डिया,वोकल फ़ॉर लोकल, आदि सब अंग्रेज़ी शब्द ही हैं। अपने चुनाव प्रचार में मोदी हमेशा ‘डबल इंजन ‘ की सरकार की पैरवी करते सुनाई देते हैं। यहाँ भी डबल भी अंग्रेज़ी और इंजन भी। अभी कुछ ही दिन पूर्व हरियाणा पंजाब सीमा पर अंबाला की और एक प्रवेश द्वार बनाया गया जिसका नाम तो ज़रूर ‘अंबाला द्वार’ रखा गया परन्तु इसे अंग्रेज़ी लिपि में ‘अंबाला द्वार’ अंकित कराया गया। पंजाब और हरियाणा का संपर्क द्वार अमित शाह की सोच के अनुसार हिंदी में ही होना चाहिये था क्योंकि हरियाणा में तो आख़िर ‘हिंदी हितैषी’ भाजपा की ही सरकार है?

ऐसा लगता है कि अमित शाह का ‘हिंदी प्रेम प्रदर्शन’ केवल हिंदी भाषी लोगों को दिखाने व जताने मात्र के लिये ही था अन्यथा ‘पर उपदेश ‘ से पहले सत्ता के रहनुमाओं का स्वयं रचनात्मक रूप से हिंदी प्रोत्साहित करने हेतु अंग्रेज़ी के मोह जाल से छुटकारा पाना ज़रूरी है। साथ ही इन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ‘को अपने बच्चों और नातियों पोतों को भी अंग्रेज़ी के बजाये हिंदी माध्यम स्कूल्स में शिक्षा दिलाने की आवश्यकता है।

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