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Monday, May 21, 2018

व्यंग्य

बेर-केर कुसंग

-डॉ. सुरेन्द्र वर्मा- कहु कबीर कैसे निभे बेर केर को संग वे डोलत रस आपने, उनके फाटे अंग। अभी तक मुझे अच्छी तरह याद है कि वर्षों...

जैसे-कैसे हो गया बस!

-अशोक गौतम- बरसों से महसूस होने का सारा सिस्टम खटारा होने के बाद भी कई दिनों से मैं महसूस कर रहा था कि जब-जब पत्नी...

चरित्रहीन

कितने ही लोग हैं जो चरित्रहीन होकर भी चरित्रवान का तमगा लगाकर, सर उठाकर जी रहे हैं। जब भी वे पुलिस फाइल्स या क्राइम...

चांद की सैर

-जौली अंकल- एक शाम वीरू काम से लौट कर अपने घर में टीवी पर समाचार देख रहा था। हर चैनल पर मारपीट, हत्या, लूटपाट और...

हुक्का हुजूर (व्यंग्य)

-डा. सुरेन्द्र वर्मा- एक समय था जब मैंने भी अपने बाबा हुजूर का हुक्का भरा था। वह भी क्या समय था। बाबा चारपाई पर विराजे...

बिकने बिकाने के दौर में

-अशोक गौतम- कई दिनों से बराबर महसूस कर रहा था कि पोता अपनी दादी के साथ खींची मेरी पुरानी फोटो से परेशान है। इस बारे...

ले ले बेटा सेल्फी…..

-सुशील यादव- आज के जमाने में सेल्फी जिसे किसी ने हिन्दी अनुवाद में खुद-खेचू कह डाला है, गजब की चीज है। फोटो खीचते समय चीज...

आप भी ओ हैं…

-जीपी. श्रीवास्तव- अनाज की पैदावार बढ़ी या नहीं यह तो ईश्व र जाने या मंहगाई, मगर हाकिमों की पैदावार का क्याम कहना है। कोई ए.ओ.,...

पत्नी प्रसन्न तो जग प्रसन्न

-विवेक रंजन श्रीवास्तव- पुराने जमाने में महिलाओं की परस्पर गोष्ठियां पनघट पर होती थी। घर परिवार की चर्चायें, ननद, सास की बुराई, वगैरह एक दूसरे...

एक शिष्टाचार सप्ताह

-सुशील यादव- रोनी सी सूरत लिए नत्थू मेरे पास आया। मैं ने पूछा, ‘क्या परजाईजी से खटपट हो गई है?’ नाम तो उस का नरसिया सिंह...