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Monday, July 16, 2018

कविता

मेरे देश की आंखें

-अज्ञेय- नहीं, ये मेरे देश की आंखें नहीं हैं पुते गालों के ऊपर नकली भवों के नीचे छाया प्यार के छलावे बिछाती मुकुर से उठाई हुई मुस्कान मुस्कुराती ये आंखें- नहीं, ये...

हम भी मिट्टी, तुम भी मिट्टी (कविता)

-विजय शर्मा- हम भी मिट्टी, तुम भी मिट्टी, मिलगा हर कोई मिट्टी में। फिर भी लगे हुए हैं सब, चंद सिक्कों की गिनती में। कोई ढूंढ रहा नाम यहां...

रेल का सफर (कविता)

-प्रभुनाथ शुक्ल- जंगल, जंगल छुक-छुक करती, चल दी अब रेल! शहर-शहर और गाँव-गाँव, व्हिसल बजाती रेल! पर्वत, नदिया, नाले और भाग रहे खेल के मैदान!! घूम रहे तेजी...

यह पल

ओस की बूंद ने आखिर खोज ही ली फूल की गोद, अब चाहे तेज़ हवाएं आएं उसे गिराने, मिट्टी में मिलाने, या सूरज की तेज़ किरण सोख ले उसे...

बिके हुए लोग

-बसंत त्रिपाठी- बटन दबाते ही घूमने लगा पंखा कितना आज्ञाकारी है इसे बनाया नहीं है मैंने खरीदा है, बिके हुए लोग आदेश बजाते हैं इच्छाओं पर नाचते हैं, जैसे मेरी इच्छाओं के आगे नतमस्तक...

फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है!

-अश्विनी कुमार- हर कदम पर मुझे दबाने का प्रयास किया जा रहा है फिर भी मुझे स्त्री होने का गर्व है! सुरक्षित महसूस नहीं करती हूँ मैं...

मेरे पापा

-रीता राम- लोगों ने देखी पापा के आंखों में हम चार बहनों और एक भाई की चिंता, हमें सहेजने से सिलवटें जो हाथों में पड़ी, रोज दौड़ता थकता शरीर उनका दुख...

सजा

-नीरज अहलुवालिया- मुझको बह जाने में गुरेज नहीं, तेरी फितरत से भी परहेज नहीं, आपशारों पे मग़र रुक ना सका, पानी होने की सजा खूब मिली, पानी होने की...

” भोजपत्र “

-प्रभुनाथ शुक्ल- चंचल नदी की धार हूँ मैं, प्रकृति का उपहार हूँ मैं हर मन की आश  हूँ मैं,  तृप्ति का आकाश हूँ मैं!! उत्तुंग शिखर का...

एक लम्बी कतार थी कुछ ठंडी जमीन पर…

-पूनम- एक लम्बी कतार थी कुछ ठंडी जमीन पर कुछ फटे-पुराने चीथड़े पर कुछ व्हील चेयर पर काम एक ही हाथ फैलाए भीख मांगना साईं के सामने साईं चैक पर सोचें तो ताले...