चुनावी फसल से खलिहान भरने की चाहत..

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चुनावी फसल से खलिहान भरने की चाहत…

9/16/2017 1:20:20 PM

-तारकेश कुमार ओझा- गांवदृदेहात से थोड़ा भी संबंध रखने वाले भलीभांति जानते हैं कि खेतीबारी कितना झंझट भरा, श्रमसाध्य और जोखिम भरा कार्य है। यदा-कदा गांव जाने पर उन मुर्झाए चेहरों वाले रिश्तेदारों से मुलाकात होती है, जो अपना दुखड़ा सुनाते हुए बताते हैं कि बेटा..खेतीबारी से गुजारा मुश्किल है। पुश्तैनी जमीन है इसलिए खेती न करें, तो लोग हंसते हुए हमें जाहिल करार दे देंगे। और करें तो हजार मुश्किलें। पूंजी और परिश्रम लगाने के बाद भी लागत वसूल हो जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अमूमन पांच साल में एक बार ही ऐसा होता है जब खेती से जुड़ा सारा कार्य बगैर जोखिम व झंझट के पूरा हो जाए। लेकिन कुछ फसलें ऐसी होती है जो बगैर झंझट और जोखिम के ही खलिहान भरने में सक्षम है। शायद चुनावी फसल भी उनमें शामिल है। बाजार के प्रभाव से चुनाव से जुड़ा कारोबार भी खूब चमकता नजर आ रहा है। बाजार में मुखौटे से लेकर रंग-बिरंगे छाता व न जाने क्या-क्या उपलब्ध है। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा बढ़ाकर 75 लाख रुपए की जा चुकी है। हालांकि हर कोई मान रहा है कि वास्तविक खर्च इससे कई गुना अधिक होती है और होगी। सवाल है कि चुनाव पर खर्च होने वाला यह धन आखिर किस-किस की जेब में जाएगा। हालांकि सच्चाई यही है कि आम जनता और मतदाता में चुनाव या भावी सरकार अथवा प्रधानमंत्री को लेकर उतनी उत्सुकता कतई नहीं है, जितना बाजार साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन माहौल ऐसा बनाया जा रहा है मानो समूचा देश चुनावी बुखार में तप रहा है। अखबारों के पन्ने पलटिए तो बस चुनाव की खबरें। यही हाल चैनलों का भी है। दिन-रात चुनावी उठा-पटक की चर्चा। महीनों पहले से तरह-तरह के सर्वेक्षण रोज नए-नए तथ्यों के साथ सामने आ रहे हैं। फलां पार्टी की सीटें बढ़ेंगी, और फलां को नुकसान होगा। प्रधानमंत्री के तौर पर इतने प्रतिशत लोगों ने फलां को पसंद किया और इतने ने नापसंद। समझ में नहीं आता ऐसे सर्वेक्षणों का आखिर आधार क्या है। कुछ दिन पहले बड़ी संख्या में सही मायने में आम आदमी कहे जा सकने वाले लोगों के जमावड़े के बीच जानबूझ कर चुनाव की चर्चा छेड़ी तो जनसमूह की सीधी व सपाट प्रतिक्रिया यही रही कि चुनावी सनसनी बस मीडिया तक सीमित है। वास्तव में लोग इसे लेकर जरा भी फिक्रमंद नहीं है। हां यह सही है कि विभिन्न पार्टियों के क्रियाकलापों और अच्छाई-बुराई पर लोगों की पैनी नजर है। समय आने पर अधिक से अधिक लोग मतदान भी करेंगे। लेकिन अभी यह स्थिति नहीं आई है कि मतदाता अगली सरकार या प्रधानमंत्री पर अपनी पसंद-नापसंद लोगों को बताते फिरे। जानकारों की यही दलील रही कि अमूमन लोकसभा चुनाव में मतदान से दो-एक दिन पहले ही मतदाता यह तय करता है कि वोट किसे देना है और अगली सरकार किसकी बनानी है। ऐसे में चुनाव से महीनों पहले से इस बाबत किए जा रहे दावों और सर्वेक्षणों के पीछे कितनी सच्चाई है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। बेशक इसके पीछे बाजारवाद की ताकत और मजबूरियां हों। जिसकी सहायता से चुनावी फसल के जरिए कुछ लोग अपना खलिहान भरने की कोशिश कर रहे हैं। तो क्या नंगई और क्रिकेट की तरह बाजार ने चुनाव को भी एक लाभ कमाने के अवसर के तौर पर तब्दील कर दिया है। भले ही आम आदमी चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव मानता हो। लेकिन बाजार के लिए इसके मायने कुछ और ही है३। चुनावी फसल से अपना खलिहान भरने की तैयारी एक वर्ग ने कर ली है।

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