कोई तो आयेगा (पंजाबी कहानी)

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कोई तो आयेगा (पंजाबी कहानी)

9/26/2017 8:29:26 PM

-प्रीतम सिंह पंछी- धन्ना सिंह अपने शीशम के पेड़ वाले कुएं पर अफीम के नशे में जमीन आसमान एक कर रहा था। बस आज भर की अफीम बची थी। कल कैसे चलेगा। उसने यह सोचकर तसल्ली कर ली कि कोई तो आयेगा, औरों को बहुत खिला रखा है। फिर उसने दूर-दूर तक फैले अपने खेतों पर निगाह फेंकी, जिन्होंने हमेशा उसका साथ दिया था, पर अब ये खेत पराये हो गये थे जो शेष बचे थे, वह चन्नो के भाइयों न आकर उसके नाम करवा दिये थे। खुद धन्ना सिंह ने पांच बकरियां खरीद ली थीं। उनका दूध उसके अपने बच्चों के हिस्से में कम आता था, अफीमचियों की चाय के लिए सारो का सारा था। घुसमुसा सा हो गया था। सूर्य की लाल टिकुली क्षितिज के पीछे सरकती जा रही थी। धन्ना सिंह आंखें मिचमिचाता तो उसे अंधेरे में उल्टे पैरों वाले भूत दिखलाई पड़ते और वह हर से कांपने लग जाता। अफीम की अंतिम गोली भी उसने अपने हलक में डाल ली थी और भूत-भूत चीखता हुआ वहीं सो गया था। चन्नो को पहले तो चिंता हुई, पर फिर यह सोच कर कि यह तो उसका रोज का ही काम है, वह भी सो गई। रात को कई बार नींद उचटी थी। बार-बार उसे अतीत की याद आती- बाप की तीन तीन कुओं वाली जमीन थी। पांच-पांच भैंसें उनकी हवेली में हमेशा बंधी रहती थीं। उसका बाप बहुत शाह दिल था अपने नौकरों के घर बटलोयों भर-भर के दूध भेजता था। तब आये गये का सत्कार मलाई वाले दूध से किया जाता था। चन्नो को नींद का झोंका आता पर थोड़ी देर बाद हड़बड़ा कर उठ बैठती। वह सोचती- कहां वे दिन थे और कहां ये दिन हैं! जब वह व्याह कर आई थीं तब यह घर भी अच्छा खासा था। बीस गाड़ियों में बारात गई थी। उसका श्वसुर भगवान सिर्फ आस्ट्रेलिया के तीन चार चक्कर लगा आया था। गली की बुढ़ियां बताती हैं, वह वहां गन्ने के खेतों के काम करता था। जब गाड़ी से किल्लौर उतरता तो बोरियां भर रुपये ले गांव आया करता था। लोग कहते- वाह भाई भगवान सिंह! हाथ पर किस्मत की अच्छी लकीरें लिखकर पैदा हुआ थ। गांव में भला और मकान होगा। मुख्य द्वार पर भाले लेकर खड़े दो पहरेदार की आदमकद मूर्तियां पता नहीं किस मूर्तिकार ने बनाई थीं। इन पहरेदारों ने चोर डाकुओं को अंधेरे में धोखा देकर चाहे डरा लिया हो, पर उसके श्वसुर की आंख बंद होते ही इन अफीमचियों की घुसपैठ को वे नहीं रोक सके। उसके चारों जेठ देवरों को अफीम की लत लग गई थी। बड़ा तो तपेदिक का मरीज होकर मर गया था। शेष तीनों ने भी अपनी काया गला ली थी। सुबह तड़के चन्नो को गहरी नींद ने घेर लिया था। उसके बच्चें दूध मांग रहे थे। वह हड़बड़ाई सी उठकर बकरियों को दुहने के लिए हवेली में आ गई थी। पहली बकरी के थन को हाथ लगाया तो वह बिदक कर दूसरी ओर चली गई। लो यह भी दूध से गई। दूसरी ने ऐसी लात मारी कि चन्नो की दूध वाली गड़वी दूर जा गिरी। दो पहले ही दूध से हट गई थीं। एक बची थीं। वह बहुत सीधी बकरी थी। दूध भी खासा देती थी। बच्चों को दूध पिलाकर वह अपने पति की तलाश में निकल गई। अफीमचियों के सारे अड्डे छान मारे, पर वह कहीं नहीं मिला- ना ही वह पिछली शाम किसी से मिला था। वह हारीथकी घर आ गई और घर के छोटे मोटे कामों में व्यस्त हो गई। शिखर दोपहर को जब वह अपने बच्चों को सुला रही थी तब एक साधू ने चन्नो को आकर सूचना दी कि उसने धन्ना सिंह और बसंत को किल्लौर जाते हुए देखा था। चन्नो समझ गई। बसंता ही उसका अधिक मुंह लगा है। दो मटले (36 गुणा 36) जमीन का टुकड़ा और बेचने गया होगा। अभी बहुत पड़ी है- आये घर में इस बार तो निर्णय करके रहूंगी। मेरा बाप कोई गया गुजरा नहीं है। वह तो अपने यहां बैठी है। और पता नहीं वह क्या क्या सोचती रही। स्वाभिमान वश उप्पलां का साधु अभी भी सामने खाट पर बैठी अपनी भैंगी आंखें मटका रहा था, वह उसकी बदनीयती समझ गई। जब भी कोई बहाना हाथ लगता, वह चन्नो के घर की दहलीज लांघ कर अंदर आ जाता था, या फिर वह जमीन बेचकर आता तो चन्नो के घर आकर ही पैसे गिनता और सौ का एक नोट चन्नो के हाथ में पकड़ा कर कहता- धन्ना सिंह से उधार लिये थे। और अपनी भैंगी आंखों से चन्नो को घूरता हुआ घर की दहलीजों से पार हो जाता। चन्नो सौ का नोट संभाल कर रख लेती। पर धन्ना सिंह सौ के नोट का जिक्र तक न करता तो चन्नो को शक हो जाता- साधू बदनीयती से नोट दे गया है। अब तक तो मैं लिहाज करती आई हूं। अबकी आ जाये तो जूतों से खबर न ली तो कोई बात नहीं। रांझा बना फिरता है। घर वाली पीहर क्या गई, फिर लौट कर नहीं आई। इन अफीमचियों ने तो बसे बसाये घर उजाड़ दिये। बसंते पांच मटले की संयुक्त जमीन पांच सौ रुपये गांठ में बांध कर सीधा धन्ना सिंह के पास आ गया था। शीशम वाला कुंआ ही उनका समय असमय का ठिकाना था। धन्ना सिंह और बसंते ने किल्लौर के ठेके से चार बोतले दारू लीं। दो गोले अफीम के खरीदे और जग्गा महरे के ढाबे पर आकर दो बोतलें तो वहीं खाली कर दीं और दो साथ लेकर गिरते पड़ते शीशम वाले कुंए पर आ गये। तब तक काफी अंधेरा हो चुका था। पता नहीं, कब रात बीत गई। सुबह उठे तो बदन टूट रहा था। बसंते ने अफीम का गोला निकालने के लिए जेब में हाथ डाला तो हाथ जेब में पार हो गया। न अफीम के गोले और न ही पैसे हाथ लगे। दारू की दोनों बोतलें भी गायब थी। दोनों को जैसे सांप सूंघ गया। जग्गा मेहरा को गालियां देने लगे। पहले भी उसके ढाबे पर इस प्रकार की वारदातें हो चुकी थीं। बसंता तो शीशम वाले कुएं से उठकर गांव में अपने अड्डे पर आ गया। वहां देखा, अफीमचियों की टोली दरवाजा छेके बेठी थी। आ गया, भाई आ गया। हमारा सरदार आ गया! उसके संयुक्त भूमि बेचने की भनक अफीमचियों को लग गई थी। पर यह क्या, बसंते ने तो आते ही भीतर से कुंडी लगा ली थी। फिर सभी अफीमची एक-एक करके चले गये थे। धन्ना सिंह को बहुत तलब लग रही थी। उसने सोचा किसी नसेड़ी के अड्डे पर जाकर अफीम की गोली मांग कर देखे। पर क्या वह कमीना है, भिखारी है। कोई तो आयेगा, कल बसंता नहीं आ गया था! आज चन्नो भी धन्ना सिंह को ढूंढने नहीं निकली। क्या वह गए गुजरे घर की है जो इन कमीनों के घरों के चक्कर काटती फिरे। स्वयं ही मरता-मराता आ जायेगा। आज पता नहीं क्यों चन्नो तल्ख हो उठी थी। उधर ज्यों-ज्यों सूरज ऊपर उठ रहा था, धन्ना सिंह की बेचौनी बढ़ती जा रही थी। गला खुश्क हो रहा था, पर उठने की हिम्मत नहीं थी। दिमाग में झटके लग रहे थे। और चन्नो का चेहरा बार-बार उसकी आंखों के आगे आ रहा था। बच्चों को दूध पिलाती, बकरियां दूहती, और उसको अमलियों के अड्डे पर से घसीट-घसीट कर घर लाती हुई और फटकारती हुई, वह आंखों के आगे से हट ही नहीं रही थी। विचारों के अंधड़ ने उसका सिर जकड़ लिया था। गन्दे लोगों की बुरी सोहबत में न पड़ता तो बच्चे भैंसों का दूध पीकर तो पलते। राजेवाल के सरदारों के नातियों को बकरियों का दूध तो ना पीना पड़ता। फिर उसने थूक निगलते हुए एक मोटी गाली देते हुए कहा, सुसरों ने अपने घर भी उजाड़े और मुझे भी कहीं का नहीं छोड़ा। दिन झटकों में ही बीत गया। ना कोई अफीमची आया और न ही चन्नो आई। सूरज ढल गया। चन्नो और बच्चों से जुदा हुए उयकी यह दूसरी रात थी। आधी रात को एक जोरदार झटके ने उसको झकझोर दिया। उसे लगा, सामने चन्नो खड़ी है। लम्बी-तडंगी, राजेवाल के सरदारों की बेटी। उसने अपनी आंखें मिचमिचाईं, उनमें अभी ज्योति शेष थी। पर सामने चन्नो नहीं खड़ी थी, शीशम के पेड़ की परछाई थी। उसने पूरा जोर लगा कर हिलने की कोशिश की। इस प्रयास ने उसे एक ढलान की ओर सरका दिया। ढलान में खड़े पानी के स्पर्श से पीठ में थोड़ी सी जान आई और वह पानी में सीधा हो गया। उसकी लपलपाती जीभ पानी और मिट्टी चाटने लगी। थोड़ा होश आया तो लुढ़कता-लुढ़कता सामने की पगडंडी पर आ गया। वह गांव की ओर रेंगने लगा। उसने सोचा, घर की दहलीज तक पहुंच जाऊं। इससे अधिक वह कुछ और न सोच पाया। अर्ध बहोशी में ही रेंगता चला गया। सुबह होने पर गांव वालों ने देखा-धन्ना सिंह अपनी दहलीज पर मरा पड़ा था। अनुवादकः स्व घनश्याम रंजन

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