अभिमानी का अंत

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-रेणु सैनी-

एक जंगल में बांस के वृक्ष के साथ ही आम का पेड़ भी था। बांस का कद ऊंचा था और आम का छोटा। यह देख कर बांस अक्सर आम के वृक्ष का मजाक उड़ाता रहता और कहता, अरे आम मैं तो कितना बड़ा हो चला, कितनी तेजी से बढ़ा और एक तुम हो, जो इतनी आयु होने पर भी छोटे ही बने हुए हो। इस पर आम बोला, बांस, यह तो हर किसी की अपनी-अपनी प्रवृत्ति है। कोई छोटा होता है तो कोई बड़ा। किंतु कद या शरीर विशाल होने से कुछ नहीं होता। काम भी विशाल और महान होने चाहिए। छोटा होने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि वह महान और बड़े काम नहीं कर सकता। इसी तरह लंबे या बड़े होने का यह अर्थ भी नहीं है कि वह छोटे काम को घृणा की नजर से देखे या उसे करने में अपना अपमान समझे।

किंतु बांस को उसकी बातें समझ नहीं आईं। वह बोला, तुम मेरे विशाल कद से जलते हो, इसलिए मुझे ऐसी बातें सुना रहे हो। तुम खुद छोटे हो, इसलिए छोटों को अच्छा बता रहे हो। अरे भला मैं छोटे काम क्यों करूं? इसके कुछ समय बाद आम के वृक्ष पर बौर आया और कुछ दिनों बाद वह फलों से लद गया। फलों से लदा होने के कारण वह झुक गया और बांस लंबा होकर सूखता चला गया, किंतु उसका अभिमान अभी भी कम नहीं हुआ था। वह आम को देख कर बोला, अरे, मुझे देखो मैं दूर से ही नजर आ जाता हूं और एक तुम हो, जो फलों से लद कर झुके जा रहे हो और छोटे होते जा रहे हो।

अभी उनकी बातें खत्म ही हुई थीं कि यात्रियों का एक झुंड वहां पर आया। उन्होंने आम के वृृक्ष को फलों से लदा हुआ देखा तो वहीं विश्राम करने लगे। रात हो गई। रात में ठंड से बचाव के लिए उन्होंने आग जलाने की सोची और पास ही खड़े बांस के वृक्ष को काट कर लकड़ियों का ढेर लगा दिया। आम का वृक्ष अभी भी शांत था और राहगीरों को अपनी छांव तले विश्राम दे रहा था, जबकि अभिमानी बांस का अंत हो चला था।

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