इस साल कुछ तो दिलचस्प होगा ही सियासत का खेल

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-उमेश चतुर्वेदी-

जो लोग आज भी सियासत के आजमाए हुए सूत्रों और हिट फॉर्म्युलों से भारतीय राजनीति को आंकने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भारी निराशा हाथ लगेगी। समाज जिस तेजी से बदला है, उसे राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों से कहीं ज्यादा राजनेता समझ रहे हैं। बीजेपी और कांग्रेस में अब बदले मानदंडों के तहत एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ रहेगी। मोदी सरकार कुछ महीनों में चार साल पूरे कर लेगी, फिर चुनावी साल की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी। ऐसे में निश्चित तौर पर लोकप्रिय फैसले लिए जाएंगे।

वे फैसले कैसे होंगे, इसके लिए नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिनों बाद दिए गए उस भाषण को याद करें, जिसमें उन्होंने कहा था कि चार साल देश के लिए और एक साल पार्टी के लिए देंगे। बेशक वित्तमंत्री अरुण जेटली ने हाल में कहा कि अर्थव्यवस्था धीमी रफ्तार से चल रही है और देश पर 500 अरब डॉलर का कर्ज हो गया है, लेकिन यह तय है कि आगामी केंद्रीय बजट में जन कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसे की कमी नहीं होने जा रही। किसानों और समाज के निचले तबके के लिए बड़े कदम उठाने का ऐलान होगा। अगले साल मिजोरम, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा, कर्नाटक, राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं।

कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा की अगुआई में बीजेपी की जीत लगभग तय मानी जा रही है। त्रिपुरा में भी पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी की तीन कार्यकाल से सरकार है। वहां गुजरात की तरह पार्टी को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है। राजस्थान में भी मुश्किलें आएंगी। कांग्रेस मुक्त भारत के नारे पर चाहे जितने सैद्धांतिक सवाल हों, लेकिन मोदी-शाह की जोड़ी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अपना पूरा दम लगाने से नहीं हिचकेगी।

दूसरी तरफ कांग्रेस भी अपने नए अध्यक्ष राहुल गांधी की अगुआई में इन दिनों उत्साहित नजर आ रही है। राजस्थान में वह पूरा जोर लगाएगी। गुजरात में प्रभारी रहते अशोक गहलोत ने पार्टी की ताकत बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है, इसलिए उन्हें एक बार फिर मौका दिया जा सकता है। हालांकि राहुल की युवा टीम के प्रमुख सलाहकारों में राजस्थान कांग्रेस के युवा अध्यक्ष सचिन पायलट भी हैं, जिनकी सत्ता हासिल करने की लड़ाई में बड़ी भूमिका होगी।

बीजेपी कुछ चैंकाऊ फैसले ले सकती है। हो सकता है, पराजय की आशंका वाले कुछ राज्यों में मुख्यमंत्री बदले जाएं या फिर पार्टी अध्यक्ष ही बदल दिए जाएं। पार्टी का पूरा जोर 2019 में केंद्र की सत्ता में वापसी पर होगा। प्रधानमंत्री मोदी मजाक में ही सही, बार-बार कहते रहे हैं कि 2024 तक उनके पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं है। उज्ज्वला योजना में महिलाओं का समर्थन हासिल करने के बाद जिस तरह पार्टी ने तीन तलाक विरोधी विधेयक को पारित कराने को लेकर सक्रियता दिखाई है, उससे सरकार के कुछ और कड़े लेकिन लोकप्रिय कदमों का अंदाजा मिलता है।

बीजेपी को विश्लेषक अभी भी राम मंदिर आंदोलन, धारा 370 हटाने और समान नागरिक संहिता से ही जोड़कर देख रहे हैं। उनका देखना गलत भी नहीं है, लेकिन इस संदर्भ में उन्हें अलग नजरिया अपनाना होगा। मौजूदा हालात में पार्टी के लिए इन तीनों ही मामलों में अपना अजेंडा लागू करना आसान नहीं है। इसलिए वह चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ेगी। तीन तलाक विरोधी कानून समान नागरिक संहिता की दिशा में ही एक कदम है। सुप्रीम कोर्ट ने अगर राम मंदिर पर कोई फैसला दिया, जिसमें मंदिर बनाने की बात हो तो तय मानिए, सरकार इसे बनाने में हिचकेगी नहीं। इसके साथ ही यह हकीकत भी जुड़ी है कि यह सरकार कट्टरपंथियों के सामने नहीं झुकने वाली।

ममता बनर्जी इस साल हिंदुत्ववादी रुख अख्तियार करें तो हैरत नहीं होनी चाहिए। अब उन्हें लगने लगा है कि उनके अति-अल्पसंख्यकवाद से राज्य में एक हिंदू वोटबैंक भी तैयार होने लगा है। चुनाव दर चुनाव टक्कर उन्हें अब बीजेपी ही दे रही है। समाजवादी धारा के पास अभी ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं है। नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए हैं लेकिन वह अपनी समाजवादी पृष्ठभूमि वाली पहचान बचाए रखते हुए ही बीजेपी के साथ आगे बढ़ेंगे। कर्नाटक में समाजवादी धारा के प्रतिनिधि एच़डी देवगौड़ा का जेडीएस अपनी साख तकरीबन खो चुका है, इसलिए उसके सामने गुंजाइश कम ही बची है।

हरियाणा के तीनों लाल खानदानों को अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कड़ी कोशिश करनी होगी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब विपश्यना मोड में ही रहेंगे क्योंकि उनके बोलने से चीजें और खराब हुई हैं। इस साल उनके कुछ लोग बीजेपी में शामिल हो जाएं तो आश्चर्य नहीं। राजनीति में ईमानदारी और शुचिता को प्रतिष्ठित करने की उद्दाम जनाकांक्षाओं के दम पर आई उनकी सरकार और पार्टी में भी व्यक्तिवाद और संकीर्ण राजनीति तेजी से परवान चढ़ रही है। इसका असर उनकी अंदरूनी राजनीति पर भी दिख सकता है। तमिलनाडु में जयललिता की सहयोगी रही शशिकला के भतीजे दिनाकरन शायद ही पलानिस्वामी और पनीरसेल्वम के सामने समर्पण करें। जम्मू-कश्मीर में बीजेपी जहां सरकार के बाहर कड़े रुख दिखाती रहेगी, वहीं सरकार के भीतर समझौता करने को मजबूर रहेगी। अपनी इन दोनों भूमिकाओं में तालमेल बिठाने की चुनौती जल्दी उसका पीछा नहीं छोड़ने वाली।

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