भारत हिंदू राष्ट्र था, है, लेकिन आगे रहने की गारंटी नहीं है

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-विश्व गौरव-

क्या भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश हो रही है? मैं इस सवाल पर आपका उत्तर नहीं पूछूंगा। दरअसल बीच-बीच में लगातार यह सवाल उठता रहता है। कभी बीजेपी निशाने पर होती है तो कभी आरएसएस, लेकिन सही मायनों में भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश हो ही नहीं सकती क्योंकि भारत तो ‘हिंदू राष्ट्र’ ही है। जो पहले से ही है, उसे बनाने की साजिश करने की बात करना ही बेइमानी है। यही बात कुछ दिन पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कही तो लोगों ने इसे विवादित बता दिया, लेकिन किसी को भी सांप्रदायिक घोषित करने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह किस आधार पर ऐसा कह रहा है।

नोट: इस ब्लॉग में मैं जहां पर भी ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग करूं, उसे ‘रिलिजन’ समझें। हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता लेकिन प्रचलित समय में यही चल रहा है तो उसी शब्द का प्रयोग कर रहा हूं। सनातन पद्धति में ‘धर्म’ शब्द का शाब्दिक व लाक्षणिक अर्थ व्याकरण के नियमानुसार, ‘मनुष्य जिसको धारण करें, वह धर्म है’ होता है। यदि आप धर्म की इस परिभाषा को मानेंगे तो आपको यह भी मान लेना चाहिए कि आपके सदाचारी कर्म ही आपका धर्म हैं।

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं भी हिंदू, हिन्दुत्व और हिंदू धर्म (रिलिजन) का उल्लेख नहीं है। पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिंदू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के श्रेष्ठतम महाकाव्य हैं, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, जिनमें मानव जीवन का एक आदर्श स्वरूप दिखाया गया है। भगवत गीता को धर्म का चश्मा उतारकर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ़ आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक अर्थ समझ में आता है। भगवत गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि है। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिंदू, हिंदू धर्म अथवा हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है। हमारा देश तो भारत है और यहां के मूल निवासियों का धर्म (पूजा पद्धति एवं जीवनशैली का सम्मिलित रूप) सनातन है।

कहां से आया ‘हिंदू’

ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की ‘स’ ध्वनि ईरानी भाषाओं की ‘ह’ ध्वनि में बदल जाती है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। पारसियों की धर्म पुस्तक ‘अवेस्ता’ में ‘हिंदू’ और ‘आर्य’ शब्द का उल्लेख मिलता है।

कुछ इतिहासकारों द्वारा एक अन्य तर्क भी दिया जाता है कि चीनी यात्री ह्वेन सांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को ‘इन्तु’ या ‘हिंदू’ कहने लगे।

इन दोनों में से सच कुछ भी हो या कुछ और भी सच हो तो भी फर्क क्या पड़ता है? हमारा देश तो भारत है और हमारी नागरिकता भारतीयता। जरा रुकिए! मैं अब भी कह रहा हूं कि भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ है।

हमने भारत देश कहा, एक बालक के शौर्य के आधार पर इस देश का नाम पड़ा भारत। वह भारत आज एक राजनीतिक और भौगोलिक इकाई के रूप में प्रतिष्ठित है। नाम तो कोई भी रख सकता है, लेकिन ईरानियों ने जब हमें ‘हिंदू’ पुकारा तो उनका सीधा सा अर्थ था, सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले लोग जो एक विशेष प्रकार की संस्कृति में विश्वास रखते हैं या आत्मसात करते हैं। उसी के आधार पर देश का नाम पड़ा ‘हिंदुस्थान’ यानी हिंदुओं के रहने का स्थान, बाद में जिसका अपभ्रंश शब्द ‘हिंदुस्तान’ इस्तेमाल किया जाने लगा।

इसी को एक अलग तरह से समझिए। हमारे देश का एक अन्य नाम आर्यावर्त भी कहा गया, यानी आर्यों के रहने का स्थान। यहां ‘आर्यों’ के बाहर से आने का कुतर्क मत करिएगा क्योंकि ‘आर्य’ कोई जाति या कहीं के निवासी नहीं थे। जो इस पवित्र भूमि पर रहते हैं, वे सभी आर्य हैं और आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ। हमारी श्रेष्ठता का आधार हमारी संस्कृति थी। उसी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के कारण हमें ‘आर्य’ और हमारे देश को ‘आर्यावर्त’ कहा गया।

इसे और आसानी से समझें तो ‘हिंदुस्तान’ एक राष्ट्र है तो ‘हिंदू’ वहां की राष्ट्रीयता, साथ ही ‘हिंदुत्व’ हमारी जीवन शैली। इसमें किसी को क्या आपत्ति है और यदि है तो क्यों है? हिंदुस्तान की संस्कृति को आत्मसात करने वाला प्रत्येक व्यक्ति हिंदू है और इसी आधार पर यह एक हिंदू राष्ट्र है। राष्ट्र का संबंध किसी पूजा पद्धति से नहीं है, कोई किसी भी पूजा पद्धति को मानता हो, फॉलो करता हो या ना भी करता हो, यदि वह भारतीय संस्कृति को मानता है और फॉलो करता है तो वह हिंदू है। सामान्य तौर पर भारत में निवास करने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारत की संस्कृति को फॉलो करता है और यदि कोई इसका विरोध करता है तो मुझे लगता है कि उसे इस देश में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इस देश की आत्मा यहां की संस्कृति है। यदि ‘राष्ट्र’ मृत हो गया तो ‘देश’ और भौगोलिक सीमाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। आप कहेंगे कि थोड़ी देर पहले तो मैं भारत और हिंदुस्तान को अलग-अलग बताने की कोशिश कर रहा था, फिर भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ क्यों कह रहा हूं? सवाल जायज है, लेकिन साथ ही हमें यह समझना पड़ेगा कि भारत की सांस्कृतिक सीमाएं तो बहुत दूर तक फैली हैं लेकिन भारत की संस्कृति का आधार स्वीकार्यता है, हमने सभी को स्वीकार किया है जबकि अन्य भौगोलिक क्षेत्रों में हमारी संस्कृति को लगभग नष्ट कर दिया गया है, वहां कभी मजहब, तो कभी राजनीति का सहारा लेकर स्वीकार्यता के सिद्धांत की हत्या कर दी गई है। ऐसे में सिर्फ भारत ही है, जिसे ‘हिंदू राष्ट्र’ माना जा सकता है।

समग्र रूप से सभी को राष्ट्र के प्रति उनके कर्तव्यों का बोध जरूर होना चाहिए। अगर देशवासी अपने कर्तव्यों के प्रति सजग एवं उत्तरदाई नहीं होंगे तो राष्ट्र की रक्षा पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग जाएगा। आज जरूरत है कि संगठित होकर अथवा व्यक्तिगत रूप से सभी को अपने स्तर पर राष्ट्र रक्षा एवं राष्ट्र निर्माण का कार्य करना चाहिए, जिससे हम फिर से ‘आर्य’ कहे जाने के लायक हो सकें और विश्वगुरु का अलौकिक गौरव प्राप्त कर अपने राष्ट्र की अनंत कीर्ति को विश्वपटल पर पुनर्स्थापित कर सकें।

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