हरियाणा जाट आरक्षण : गई भैंस पानी में

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-जग मोहन ठाकन-

हरियाणा में जाट आरक्षण का मामला फिर खटाई में पड़ता लग रहा है। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के निर्देशानुसार हरियाणा सरकार ने अपने कर्मचारियों का जातिगत विवरण तैयार कर राज्य के अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को आंकड़े मुहैया करवा दिए हैं। अब आयोग ने आम जन से इन आंकड़ों पर आपत्तियां मांगीं हैं। सितम्बर माह में पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा में जाट समेत छह जातियों जट सिख, मूला जाट, रोड, बिशनोई तथा त्यागी को पिछड़े वर्ग में आरक्षण देने पर 31 मार्च, 2017 तक रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने मामला स्टेट बैकवर्ड क्लास को रेफ़र कर दिया था और बैकवर्ड क्लास कमीशन को कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इन जातियों के सामाजिक आर्थिक आंकडे इक्कठे कर 31 मार्च, 2017 तक कमीशन अपनी रिपोर्ट कोर्ट में जमा करे। याचिकाकर्ता ने जाट आरक्षण का विरोध करते हुए मुद्दा उठाया था कि जाटों का सरकारी नौकरियों में पहले से ही ज्यादा प्रतिनिधित्व है। याचिका कर्ता ने जाट आरक्षण एक्ट की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट के सम्मुख प्रदेश के शिक्षा विभाग के आंकड़े पेश करते हुए कहा था कि विभिन्न पदों पर 30 से 56 फीसदी जाट पहले से ही काबिज हैं, तो फिर आरक्षण कोटा क्यों दिया जाए? अब सरकार ने जो आंकड़े कमीशन को मुहैया करवाए हैं, वो भी याचिका करता के ही पक्ष को मजबूत कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल सरकारी अमले 2.42 लाख में जाटों का वर्तमान प्रदेश की सरकारी नौकरियों में 27.27 फीसदी प्रतिनिधित्व पहले से ही है। प्रथम श्रेणी पद (24.47 फीसदी), द्वितीय श्रेणी (30.22 फीसदी), तृतीय श्रेणी (31.07 फीसदी) तथा चतुर्थ श्रेणी (14.12 फीसदी)। एक अनुमान के अनुसार हरियाणा प्रदेश में जाटों की संख्या 25 से 27 फीसदी तक बताई जाती है। परन्तु पुष्टि हेतु पिछड़ा वर्ग आयोग ने अब सरकार से प्रदेश में विभिन्न जातियों की जनसँख्या के सही आंकड़े मांगे हैं। उल्लेखनीय है कि देशभर में 2011 में जातिगत गणना करवाई गयी थी, परन्तु उसके आंकडे अभी तक सार्वजनिक नहीं किये गए हैं। अगर जातीय गणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाता है तो जाटों का आरक्षण खटाई में पड़ सकता है। दूसरी तरफ सरकार द्वारा आयोग को दिए आंकड़ों की वैधता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। एक आरोप है कि सरकार ने इस गणना में कॉन्ट्रैक्ट पर लगे कर्मचारियों को इसमे नहीं जोड़ा है, दूसरी तरफ कुछ स्थाई कर्मचारियों/अधिकारियों को भी सही ढंग से श्रेणीबद्ध नहीं किया गया है। उत्तर प्रदेश से हरियाणा की जाट आरक्षण की राजनीति करने वाले अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष यश पाल मलिक ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकार ने किस आधार पर ये आंकड़े पेश किये हैं इसकी स्टडी कर रहे हैं। हरियाणा से ही भाजपा के एक जाट नेता एवं केंद्र सरकार में मंत्री बिरेंदर सिंह ने अपनी ही पार्टी की हरियाणा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि प्रदेश में 23 प्रतिशत ऐसे जाट हैं, जिनकी आय अनुसूचित जाति के परिवारों से भी कम है, उन्हें आरक्षण की जरुरत है।

अगर आंकड़ों के आधार पर ही जाट आरक्षण तय होना है, तो इसकी संभावना कम ही है कि जाट आरक्षण ले पाएंगे। क्योंकि हरियाणा में जाट पहले से ही अपनी जातीय गणना के बराबर सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व ले चुके हैं। संविधान तथा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के मुताबिक 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता, जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि अनुच्छेद 15(4) एवं 16(4) के तहत किसी समाज या वर्ग का शैक्षणिक एवं सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। परन्तु क्या आंकड़ों के हिसाब से हरियाणा सरकार द्वारा इकोनोमिकली बैकवर्ड पर्सन यानि इबीपी के नाम पर दस प्रतिशत का आरक्षण सही है? हरियाणा में 23 जनवरी, 2013 को एक ही दिन हरियाणा सरकार ने दो नोटिफ़िकेशन पत्र 59 एस डब्लू (1)-2013 तथा 60 एस डब्लू (1) -2013 जारी किए थे । क्रमांक 59 के तहत राज्य में पाँच जातियों जाट, बिशनोई, जट्ट सिक्ख, रोड व त्यागी को दस प्रतिशत का आरक्षण विशेष पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत दिया था तथा क्रमांक 60 के तहत अन्य सर्वोच्च अगड़ी सवर्ण जातियों यथा ब्राह्मण, बनिया व राजपूत आदि को इकोनोमिकली बैक्वार्ड पर्सन (ईबीपी) श्रेणी के अंतर्गत 10 फीसदी का आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान किया गया था। जबकि हरियाणा सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार इन अग्रणी जातियों को पहले से ही इनकी जन संख्या से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व सरकारी नौकरियों में मिला हुआ हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक ब्राह्मण जाति हरियाणा में 7 प्रतिशत है, परन्तु इसका प्रतिनिधित्व प्रथम श्रेणी सरकारी सेवाओं में 10.47 फीसदी तथा द्वितीय श्रेणी में 13.46 फीसदी है। पंजाबी (अरोडा/खत्री ) का 11.77 फीसदी प्रथम श्रेणी पदों पर तथा 10.16 फीसदी द्वितीय श्रेणी पदों पर पहले से ही कब्ज़ा है, जबकि इनकी जन संख्या केवल 7 फीसदी ही है। बनिया जाति की जन संख्या केवल 5 फीसदी है परन्तु हरियाणा के प्रथम श्रेणी के 13.01 फीसदी पदों पर इनका प्रतिनिधित्व है, जो सभी जातियों से अधिक है, जबकि जाटों का प्रथम श्रेणी में भागीदारी 24.47 फीसदी ही है। हालाँकि जाटों का आरक्षण का मामला तीस लोगों की जान जाने तथा करोड़ों की संपत्ति सवाह होने के बावजूद सरकारों की लाली पॉप वाली टरकाऊ नीति के चलते कोर्ट व कमीशन के बीच झोले ले रहा है। जबकि हरियाणा में ई बी पी आरक्षण के नाम पर सामाजिक रूप से अग्रणी जातियों के व्यक्तियों को संविधान तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को अंगूठा दिखाते हुए आज भी धड्ले से चालू है। हरियाणा में आर्थिक आधार पर आरक्षण की यह अनूठी पहल है, जहां सुप्रीम कोर्ट की 50 फीसदी की सीमा रेखा का भी उल्लंघन होता है तथा इन्दिरा साहनी मामले में 1992 में सर्वोच्च न्यायालय के अगड़ी जातियों के आर्थिक रूप से गरीबों के लिए अलग से आरक्षण को अमान्य करार दिया जाने के बावजूद यह आरक्षण दिया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि आंकड़ों के हिसाब से भी इन अगड़ी जातियों का पहले से ही हरियाणा में जन संख्या से फालतू प्रतिनिधित्व होने के बावजूद कैसे विशेष सवर्ण जातियों ब्राह्मण, बनिया, राजपूत आदि अन्य जातियों को आर्थिक आधार पर ईपीबी (इकोनोमिकली बैक्वार्ड पर्सन) श्रेणी के तहत 10 फीसदी का विशेष आरक्षण सुप्रीम कोर्ट की दोनों आपतियों (50 फीसदी से अधिक आरक्षण की सीमा रेखा के बाहर तथा अगड़ी सवर्ण जातियों के आर्थिक आधार पर आरक्षण अमान्य) को किनारा कर हरियाणा में यह आरक्षण अभी भी दिया जा रहा है?

जाट आरक्षण का मामला सभी राजनैतिक दलों के लिए एसवाईएल की तरह वोट बटोरने का एक विकल्प बना हुआ है। भारतीय जनता पार्टी हरियाणा राज्य में जाटों के आरक्षण में ‘चित भी मेरी पट भी मेरी’ की पालिसी के तहत दोनों हाथों में लड्डू रखने की चाल चल रही है। अभी नवम्बर माह में एक ही दिन दो समानांतर रैलियों का आयोजन किया गया, एक जाट आरक्षण के पक्ष में तथा दूसरी विरोध में। परन्तु विशेष बात यह रही कि दोनों ही रैली भाजपा द्वारा प्रायोजित एवं समर्थित थी। जहाँ रोहतक के गाँव जस्सिया में यशपाल मालिक द्वारा जाट आरक्षण के पक्ष में आयोजित रैली में अपने आप को जाट हितेषी स्तम्भ मानने वाले भाजपा सरकार में केंद्रीय मंत्री बिरेंदर सिंह ने दहाड़ लगाईं कि हम आरक्षण लेकर रहेंगे। दूसरी तरफ उसी दिन उसी समय हरियाणा की मध्य स्थली जींद में भाजपा के सांसद राज कुमार सैनी चिल्ला रहे थे कि किसी भी कीमत पर आरक्षण नहीं लेने दिया जायेगा। इस रैली में केंद्र की भाजपा सरकार में शामिल मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंदर कुशवाहा आरक्षण विरोधी रैली में सैनी के समर्थन में भाषण दे रहे थे।

राजनैतिक विश्लेषक मानते हैं कि हरियाणा में जाट–गैर जाट का विभाजन भाजपा को खूब रास आ रहा है और भाजपा अगले 2019 के लोकसभा चुनाव तक, जिसके साथ ही पार्टी हरियाणा विधान सभा चुनाव भी करवाने की नीति पर चल रही है, इस विभाजन को और मजबूत करना चाहती है ताकि उसे प्रदेश में गैर-जाटों की नाव के माध्यम से एक बार फिर बैतरनी पार करने का सफल अवसर मिल सके। वह अगले लोकसभा चुनाव तक अपना सांप सीढी का ऐसा खेल जारी रखना चाह रही है कि जाटों को लगे कि बस अब आरक्षण मिलेगा और गैर–जाटों को दृढ विश्वास हो जाये कि जाटों को आरक्षण बिलकुल नहीं दिया जायेगा।

हाल के गुजरात विधान सभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा पटेल आरक्षण की घोषणा पर भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा की गयी प्रतिक्रिया स्पष्ट संकेत दे रही है कि भाजपा 50 फीसदी की आरक्षण कैप का उल्लंघन करने के मूड में नहीं है। अरुण जेटली का यह कहना कि कांग्रेस द्वारा 50 फीसदी से अधिक के आरक्षण की घोषणा अपने आप को धोखे में रखने वाली है तथा संवैधानिक रूप से असंभव है एवं कभी भी कानूनी रूप से अनुमत्त नहीं है, सीधे सीधे 50 फीसदी से अधिक आरक्षण पर भाजपा का रूख बतला रही है। कांग्रेस द्वारा पटेलों को आरक्षण देने की घोषणा पर पहले से ही आरक्षण ले रहे अनुसूचित जाति, जनजाति (आदिवासी) एवं ओ बी सी श्रेणी के मत दाताओं को पटेलों के खिलाफ लामबद्ध कर भाजपा से जोड़ने के उद्देश्य के तहत भाजपा ने जातीय विभाजन की खूब लकीर खीची। इन जातियों को यह समझाने के पूरे प्रयास किये गए कि यदि पटेलों को आरक्षण मिलता है तो पूर्व में आरक्षण ले रही जातियों के हिस्से को काटकर ही आरक्षण दिया जायेगा। लुनावाडा डेटलाइन से इकनोमिक टाइम्स में छपी पीटीआई की एक खबर (दिसंबर 09, 2017) के मुताबिक प्रधान मंत्री नरेंदर मोदी ने एक जन सभा में कहा, “मैं अपने मुस्लिम मित्रों से पूछना चाहता हूँ, क्या कांग्रेस ने उन्हें देश में कहीं भी आरक्षण दिया है? क्या यह उनका झूठा वायदा साबित नहीं हुआ? अब वे गुजरात की एक अन्य कम्युनिटी को आरक्षण का वायदा कर रहे हैं। वे उन्हें कहाँ से आरक्षण देंगे? क्या वे ओ बी सी, आदिवासी तथा अनुसूचित जाति के कोटे से इसे छिनेंगे?” मोदी के इस तर्क ने न केवल पटेलों के बिछोह से हुए वोट नुकसान की भरपाई की, अपितु पूर्व में आरक्षित श्रेणी के लोगों को भाजपा से जोड़ने का काम भी सफलता पूर्व किया। हरियाणा में भी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के तहत पूर्व में आरक्षण ले रही जातियों को भी जाटों के आरक्षण देने के मुद्दे पर गैर–जाट वर्ग के झंडे के नीचे भाजपा के ही एक सांसद राज कुमार सैनी द्वारा लामबद्ध किया जा रहा है और काफी हद तक सैनी को इसमें सफलता भी मिली है। क्यों भाजपा के ही सांसद द्वारा तीन साल से अधिक समय से किये जा रहे इस जातीय विभाजन पर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व मौन साधे हुए है? क्या यह सब उपरी निर्देश के तहत ही हो रहा है? कहीं गुजरात नीति की तरह ही जाटों की प्रभावी राजनैतिक शक्ति के संतुलन के लिए हरियाणा में गैर-जाटों को भाजपा से जोड़ने के लिए तो भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व का कोई एजेंडा तो नहीं है? मामला कुछ भी हो जाट आरक्षण की भैंस एक बार तो पानी में गोता लगाती प्रतीत हो ही रही है।

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