गुजरात का संदेश क्या?

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-अजित द्विवेदी-

गुजरात का विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय महत्व का था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर लगी थी तो कांग्रेस के नए बने अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी यह चुनाव बेहद अहम था। यह पहले से तय था कि नतीजा कुछ भी उसका असर राष्ट्रीय स्तर पर होगा और अगले लोकसभा चुनाव की व्याख्या इस नजरिए से होगी। इससे दो चीजें तय होंनी निश्चित है।
पहली चीज तो यह कि अब भाजपा या नरेंद्र मोदी की वैसी लहर या सुनामी नहीं है। सिर्फ उनकी छवि, उनके भाषण के आधार पर भाजपा नहीं जीत सकती है। आखिर उन्हें भी अपने भाषण में विकास की जगह पाकिस्तान का जिक्र करना ही पड़ा था। दूसरी चीज विपक्ष की एकजुटता है। गुजरात चुनाव के नतीजों से सबक लेकर विपक्षी पार्टियां एकजुट होंगी। उनको यह आभास हो गया होगा कि अगर साझा विपक्ष हो तो भाजपा को टक्कर दी जा सकती है।
गुजरात में भाजपा को चुनाव जीतने के लिए पहले कभी भी शायद इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद से ही राज्य में पार्टी के नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति रही। भाजपा ने पहले आनंदी बेन पटेल को बनाया और फिर उनको हटा कर विजय रूपाणी को सीएम बनाया।
प्रदेश का नेतृत्व कमजोर होने की वजह से ही मोदी और अमित शाह को राज्य में इतनी मेहनत करनी पड़ी। दूसरी ओर कांग्रेस ने स्थानीय और जातीय नेताओं के साथ समीकरण बना कर जीत का फार्मूला तैयार किया था। उसका जवाब देने के लिए भी भाजपा और उसके काडर को बिल्कुल जमीनी स्तर पर सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण के लिए प्रयास करना पड़ा ताकि जाति का फार्मूला कामयाब न हो। सो, कह सकते हैं कि भाजपा का फार्मूला कामयाब रहा और कांग्रेस का फार्मूला आंशिक रूप से ही कामयाब रहा।
इस चुनाव में विपक्षी पार्टियों के बीच तालमेल नहीं बन पाया था। आम आदमी पार्टी ने दो दर्जन सीटों पर उम्मीदवार उतारे तो एनसीपी ने भी काफी सीटों पर चुनाव लड़ा। अगर विपक्ष के बीच तालमेल होता तो शायद तस्वीर अलग होगी।
कांग्रेस को जितने प्रतिशत वोट मिले हैं, उतने पर भी चुनाव जीता जा सकता था। सो, नेतृत्व से लेकर सांप्रदायिकता के फार्मूला और विपक्षी गठबंधन के नजरिए से इसकी व्याख्या करनी होगी।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस चुनाव में बड़ी मेहनत की थी। उनकी मेहनत और उनके मिल रहे रिस्पांस की वजह से पूरे चुनाव प्रचार में मोदी और शाह की सांस फूली रही। दोनों को हर नुक्ते पर खुद नजर रखनी पड़ी। तभी यह कहा जा रहा है कि चुनाव नतीजों ने राहुल गांधी का नेतृत्व स्थापित कर दिया है। पर लाख टके का सवाल है कि क्या विपक्ष उनका नेतृत्व स्वीकार करेगा?
क्या विपक्ष में यह धारणा बनी है कि राहुल का नेतृत्व अगले लोकसभा चुनाव में मोदी के मुकाबले वोट खींचने वाला गठबंधन बन सकता है? बहरहाल, नेतृत्व को लेकर जो कंफ्यूजन रहे, पर यह मैसेज समूचे विपक्ष को होगा कि भाजपा से मुकाबले के लिए उनका एकजुट होना जरूरी है। दूसरा मैसेज संगठन को मजबूत करने का है। भाजपा ने इस बार गुजरात का चुनाव किसी करिश्मे या लहर के दम पर नहीं जीता है।
उसने होशियारी से कांग्रेस के जातीय फार्मूले के मुकाबले धर्म का फार्मूला रखा और अपने मजबूत संगठन के आधार पर अपने वोट डलवाए। दूसरी ओर कांग्रेस सारी लहर के बावजूद उसके वोट में नहीं बदल पाई। इससे कांग्रेस के संगठन की कमजोरी जाहिर हुई है।
गुजरात के विधानसभा चुनाव नतीजों से देश की राजनीति पर बड़ा असर होगा। भाजपा गुजरात के साथ साथ हिमाचल प्रदेश भी जीत गई है। इस तरह भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के शासन वाले राज्यों की संख्या 19 हो गई है, जबकि कांग्रेस अब सिर्फ पांच राज्यों तक सिमट गई है।
इसमें से भी सिर्फ दो बड़े राज्य पंजाब और कर्नाटक उसके पास हैं। तभी कहा जा रहा है कि कांग्रेस अगले साल होने वाले चुनाव में कर्नाटक बचाने की जीतोड़ मेहनत करेगी। इसके साथ साथ कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को यह मैसेज भी मिल गया है कि उनको साथ आना चाहिए।
दूसरी ओर भाजपा को यह मैसेज मिला है कि मोदी का करिश्मा अकेले जीत नहीं दिला सकता है। उनकी सरकार के फैसलों से नाराजगी भी जाहिर हुई है। सो, भाजपा को इस बारे में सोचना होगा। भाजपा को भी नेतृत्व से लेकर चुनावी मुद्दों और अपनी सरकार के कामकाज पर ध्यान देना होगा।

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