कुलभूषण से मुलाकात और शीशे की दीवार के पीछे का सच

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-डॉ हिदायत अहमद खान-

महज सात दशक पूर्व भारतभूमि रुपी शरीर का एक अहम हिस्सा रहे पाकिस्तान के अलग होने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन अंग्रेजों के द्वारा बोए गए फूट डालो और राज करो के बीज ने कुछ ऐसा कमाल दिखाया कि न सिर्फ पाकिस्तान अलग देश बना बल्कि जन्मजात दुश्मनी के पौधे अमिट शजर में तब्दील हो गए। नफरत की ये जड़ें इतनी गहरी जा बैठीं कि उनका उखड़ना भी नामुमकिन हो गया। अब हालात ये हैं कि दोनों देशों के कथित नेता और राजनीतिक पार्टियां दुश्मनी और नफरत के नाम पर अपनी-अपनी रोटियां सेंकती तो नजर आ जाती हैं, लेकिन कड़वाहट को मिठास में बदलने की कोशिशें दूर-दूर तक दिखाई नहीं देतीं। इसका सबसे ज्यादा नुक्सान दोनों ही देशों में रहने वाले आमजन का हुआ है। दरअसल ऐसे न जाने कितने परिवार हैं जिनके सगे-संबंधी सीमापार रहते हैं और चाहते हुए भी वो आत्मीयता के साथ एक-दूसरे से नहीं मिल सकते हैं। हालात खराब होने के नाम पर सीमा पर जो प्रपंच रचा जाता है उसमें अपने ही मारे जाते हैं। हमारे जवान शहीद होते हैं तो वहीं दूसरी तरफ मजबूर नौजवान जो कि राह से भटके हुए होते हैं आतंकवादी के तौर पर मार दिए जाते हैं। ऐसे में इंसानियत को कुछ इस कदर रौंदा जाता है जिसे देखकर और सुनकर कलेजा मुंह को आ जाता है। फिलहाल पाकिस्तान की जेल में बंद कुलभूषण जाधव का मार्मिक मामला है, जिसमें हम जैसे मानवतावादी न्याय की गुहार लगाते हुए उनकी रिहाई की मांग करते हैं। इसके लिए तो बकायदा सुबूत दिए जाते हैं कि जैसा पाकिस्तान के अधिकारी और मीडिया उनके संबंध में आरोप लगा रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है। बावजूद इसके उन्हें पाकिस्तान दुनिया के सामने एक गुप्तचर के तौर पर पेश करता और फांसी की सजा सुनाकर, मेल-मुलाकात का एक बड़ा नाटक खेलता नजर आता है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय अदालत को सुनवाई करते हुए सुबूतों और गवाहों के आधार पर दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिए। इससे पहले कहने को तो पाकिस्तान की सरकार ने कायदेआजम मोहम्मद अली जिन्ना के जन्मदिन पर दरियादिली दिखाते हुए जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव की मुलाकात उनकी मॉं और पत्नी से कराने जैसा फैसला लिया। जो जानते हैं वो तो यही कह रहे हैं कि यह मुलाकात एक दिन में आयोजित नहीं कर दी गई है, बल्कि इसके पीछे लंबे अंतराल की कोशिशें हैं और उस पर यह कि खुद जाधव ने अपनी पत्नी से मिलने की इच्छा जाहिर की थी। उसके बाद तमाम तरह के दबाव और अदालती प्रक्रिया ने इस मुलाकात को आसान बनाया है। बहरहाल आर-पार दिखाई देने वाली मजबूत दीवार के पीछे मुलाकात तो हुई लेकिन उसके बाद जो शुक्रिया वाला वीडियो जारी हुआ उसने सारी कहानी मानों खुद ही कह दी। हमारी नजर में यह मुलाकात इस मायने में भी बेमानी रही क्योंकि मॉं व पत्नी से मिलते वक्त जाधव के बीच में एक शीशे की दीवार थी, जिससे न तो सीधे उनकी आवाज सुनी जा सकती थी और ना ही उन्हें सांत्वना ही दी जा सकती थी। इस प्रकार यह दुनिया को दिखाने के लिए तो मुलाकात कही जा सकती है, लेकिन मानवीय आधार पर यह मुलाकात की परिधि में भी नहीं आती है। उस पर यह बताया जाना कि उनके कुछ दूर इंडियन डिप्लोमैट जेपी. सिंह भी मौजूद थे, लेकिन यहां यह भी बतलाया जाना चाहिए कि उनके सामने भी कांच की एक मोटी दीवार थी जिससे वो देख तो सकते थे लेकिन यह नहीं जान सकते थे कि उनमें बातचीत क्या हो रही है। इस प्रकार इनके बीच मौजूद शीशे की दीवार बहुत कुछ कहती नजर आती है। यह तो महज देखने और दिखाने वाला सुनियोजित सियासी कार्यक्रम था। यहां मशहूर शायर बशीर बद्र का शेर याद आता है जिसमें वो कहते हैं कि ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। ये नये मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।’ यह वही फासला है जिसे छुपाते हुए भी पाकिस्तान ने दिखा ही दिया है। उस पर पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ का यह कहना कि पाकिस्तान ने मौत की सजा पाने वाले भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव के साथ उनके परिवार की मुलाकात के दौरान एक भारतीय राजनयिक को मौजूद रहने की इजाजत दे कर जाधव को कूटनीतिक पहुंच प्रदान की है। अपनी खुद की पीठ थप-थपाने जैसा काम किया है। मोहम्मद आसिफ का यह बयान इसलिए महत्व नहीं रखता क्योंकि वो उस मुलाकात का हिस्सा ही नहीं थे। वहीं दूसरी तरफ जब कोई किसी पर दिली एहसान करता है तो उसे जताता नहीं है और न ही दुनियाभर में डिंडोरा ही पीटता है, जैसा कि इस समय पाकिस्तान ने किया है। याद हो कि इस हाईप्रोफाइल मुलाकात के बाद पाकिस्तान विदेश मंत्रालय ने वीडियो जारी किया है जिसमें कुलभूषण को इस मुलाकात के लिए पाकिस्तान सरकार के प्रति शुक्रिया अदा करते हुए दिखाया गया है। इसमें शक नहीं कि कुलभूषण धन्यवाद दे सकते हैं क्योंकि वो पाकिस्तान में कैद हैं और उनसे जैसा कहा जा रहा होगा वो उसके आधार पर ही अपनी बात रख रहे होंगे। यहां यह भी जरुरी नहीं कि जो उन्होंने कहा उसे ही दिखाया या सुनाया जा रहा हो। ऐसा भी हो सकता है कि वीडियो असली हो ही नहीं। बहरहाल यदि पाकिस्तान चाहता है कि वाकई कुलभूषण जाधव को न्याय मिले तो उसे इस मामले को अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ले जाना चाहिए और वहीं से इसका हल निकाला जाना चाहिए, इसके बगैर ये मुलाकातें और बातें महज ड्रामाई हैं और उसके अलावा कुछ नहीं।

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