क्या राजनीति में धर्म को साथ लेकर चल सकते हैं राहुल?

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-आशीष पांडे-

दिल्ली कैंट में मेन पंखा रोड से सटी एक मजार है जहां से गुजरते वक्‍त लगभग हर बाइक और कार की रफ्तार थम जाती है, सिर झुक जाता है। मजार के मेनगेट पर बड़ी घंटियां बंधी हैं। मंदिर पर तो घंटियां बंधी होना आम बात है लेकिन मजार पर आने वाले अधिकतर लोग हिंदू हैं, इसलिए यहां भी इनकी गूंज है। यह हिंदुस्तान कुछ ऐसा ही है। आप न धर्म को किसी दायरे में बांध सकते हैं और न ही यहां की जिंदगी से धर्म को एक दायरे पर रख सकते हैं। सभी धर्मों से समान दूरी का कॉन्सेप्ट इस मुल्क के सेक्युलरिजम  को रिफ्लेक्‍ट नहीं करता, सभी धर्मों के साथ समान भाव हमारे लिए ज्यादा सहज है।

गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान जब राहुल गांधी ने मंदिरों में जाना शुरू किया तो राजनीतिक तौर पर यह शुरुआत में अटपटा लगा। क्या सेक्युलर नेता के तौर पर खुद को पेश करने वाले नेता का जनेऊधारी अवतार दो नाव की सवारी तो साबित नहीं होगा? गुजरात के वोटर सॉफ्ट हिंदुत्व को क्यों चाहेंगे जब उनके बीच बीजेपी जैसा विकल्प है और क्या यह देशभर में मुसलमानों को भी उनसे दूर तो नहीं कर देगा? न सिर्फ बीजेपी ने सवाल उठाए बल्कि सेक्युलर खेमों में भी असहजता आई लेकिन नतीजों से ऐसा लगता है कि वोटर्स ने इसे रिजेक्ट नहीं किया। राहुल जिन 24 जगहों पर मंदिरों में गए, कांग्रेस ने उनमें से 18 जगहों पर जीत हासिल की।

भारत जैसे देश में धर्म-निरपेक्षता का मतलब धर्म से दुश्मनी नहीं, सभी धर्मों के साथ समभाव होना चाहिए। यहां राहुल हर धर्म में सम्मान जताकर एक उदार हिंदूवादी चेहरा बन सकते हैं जो बीजेपी के उग्र हिंदुत्व का जवाब बनेगा और कांग्रेस के परंपरागत व्यापक जनाधार को अपील करेगा। वास्तव में भारत ऐसा ही है- आपस में घुली-मिली आस्थाओं का एक सागर। यहां तीखे धार्मिक मतभेद सिर्फ राजनीति में उभरकर आते हैं। राहुल इस समभाव के प्रतिनिधि बन सकते हैं और बेहतर होगा कि वह अपने वरिष्ठों से इसकी शिक्षा लें, मसलन प्रणब मुखर्जी। वैसे इस मामले में महात्मा गांधी से बड़ा गाइड कौन हो सकता है?

हालांकि, उनके इस संदेश पर कुछ सवाल भी बाकी हैं। क्या इसे चुनाव के उस पैंतरे के तौर पर देखा जाए जो वोटर्स को लुभाने के लिए इस्तेमाल किया गया था? यूपी में भी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले राहुल अयोध्या में रामलला समेत कई मंदिरों में गए लेकिन उसे भी चुनाव से ठीक पहले ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने की कोशिश के तौर पर देखा गया। लोग देखना चाहेंगे कि क्या वह यह रूप ठीक चुनाव के दौरान ही अपनाते हैं या यह उनका स्थायी रूप रहेगा। यह नए कांग्रेस अध्यक्ष की जीवनशैली के तौर पर उभरता है तो लोग इसे ज्यादा आसानी से स्वीकार करेंगे।

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