सही मायने में गुजरात की जीत किसकी है!

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निर्भय कुमार पाण्डेय ” नीरज ”

गुजरात विधानसभा चुनाव भाजपा जीत गई है, पर दहाई के अंक पर सिमट गई है। जीत का शेहरा प्रधामनंत्री नरेंद्र मोदी के सिर बंधा जाना सो बांध दिया गया। हर बार की तरह इस बार भी मोदी ने अपने धन्यवाद भाषण में कहा कि यह जीत सही मायने में गुजरात की जनता की जीत है। साथ ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत और चुनावी रणनीति का परिणाम है। पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली के अशोका रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में पहले मोदी को मिठाई खिलाई बाद में खुद भी खा का मुंह मीठा किया और सब का भार व्यक्त किया। खैर चुनाव में हार जीत लगी रहती है। कोई पार्टी हारती है तो कोई एक पार्टी जीत दर्ज का पांच साल के लिए राज्य की सत्ता पर काबिज होती है। पर सवाल यह उठता है कि सही मायने में यह किसकी जीत है। भाजपा की या फिर पीएम नरेंद्र मोदी के गुजरात वासियों से भावुक होकर अपील की या चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह की मेहनत की या फिर गुजरात की जनता की, जो मोदी को प्रधानमंत्री रहते हुए यह नहीं चाहती थी कि उनकी हार हो और भाजपा समर्थन किया।

इसमें कोई दो दो राय नहीं है कि अन्य राज्यों की तुलना में गुजरात से पलायन करने वाले मजदूरों की संख्या कम है। देश की राजधानी में कई राज्यों के लोग मजदूरी कर जीवनयापन करते हुए मिल जाएंगे, पर कही हद तक गुजरात के लोग नहीं मिलेंगे। यहां यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह सब मोदी के मैजिक का कमाल है। कांग्रेस के जमाने मे भी गुजरात मे काफी विकास हुआ है, पर इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि लगातार छह बार से किसी पार्टी पर राज्य की जनता भरोसा कर रही है तो उसमें जरूर ऐसी बात रही होगी। लोगों को मूलभूत सुविधा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पानी और रोजगार मेले होंगे। यहां यह कतई नहीं मान लेना चाहिए कि अब गुजरात मे कोई समस्या नहीं है। किसानों की समस्या हो या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की बात। कहीं न कहीं कुछ कमी जरूर रही होगी। नहीं तो यह कैसे संभव हो सकता है कि पार्टी दहाई के आंकड़े पर सिमट जाए। सत्ता संभालने के बाद भाजपा को इस पर विचार करना होगा, नहीं तो कुछ समय बाद लोक सभा चुनाव में इसका असर देखने को जरूर मिलेगा।

गुजरात चुनाव में हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश की भी राजनीति में एंट्री हुई है। जिग्नेश वाकायदा विधायक भी बन गए हैं। अब वो विधानसभा में सरकार की किस कदर बखिया उधेड़ते हैं यह तो समय ही बताएगा। अल्पेश भी जीत गए हैं और उन्होंने माना है कि एवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। वहीं, हार्दिक ने चुनाव के बाद कह दिया है कि वह पाटीदार समाज के आरक्षण के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे, जब तक उनके समाज को आरक्षण नहीं मिल जाता। कांगेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी दिल्ली लौट आए हैं। हिदुत्व की तरफ उनका झुकाव भी गुजरात की जनता को रास नहीं आया और 22 साल बाद भी कांगेस उस जादुई आंकड़ा तक नहीं पहुंच पाई, जो सत्ता पाने के लिए हर दल के लिए जरूरी होता है और हार जीत का फैसला उसके आधार पर होता है। चुनाव की नैया पार करने के लिए उनको यहां तक बतना पड़ा कि वह जनेऊ धारी हिन्दू हैं। बावजूद उन्हें पिछली चुनाव की तरह इस बार भी निराशा ही हाथ लगी। अब ये देखना बाद दिलचस्प होगा कि कांग्रेस विपक्ष की भूमिका कैसे निभाती है और गुजरात की जनता का भरोसा किस हद तक जीत पाती है और लोकसभा में क्या कमाल करती है।

अंत मे यही कहा जा सकता है कि गुजरात की जनता ने केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार के नोटबंदी और जीएसटी के फैसले को सही माना है और सत्ता में काबिज करा कर निर्णय पर मोहर लगा दी है। पर क्या जिस तरह के बयानबाजी पीएम मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान की थी उसे जायज माना जा सकता है। हालांकि, कांग्रेस के नेताओं ने तो जुमले बाजी की सारी हदें पार कर दी थी। यही कारण है कि कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली ने ऐसे बयानबाजी को गलत ठहराया और बोला कि इस तरह के बयान से पार्टी को नुकसान हुआ है और विपक्षी पार्टी को इसका फायदा हुआ है। पर सवाल पीएम पर भी उठ रहे हैं। हार जीत का दौर तो चुनाव होंगे तो होता रहेगा पर राजनीतिक मान मर्यादा भी बची रहनी चाहिए और यही एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी है। लोकतंत्र में जनता सब जानती है। सिर आंखों पर बैठने में भी समय नहीं लगती तो गिरने में भी वक्त नहीं लगती।

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