नैतिक कर्तव्यों के पालन से अपराध मुक्त होगा समाज!

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 -सुधीर कुमार-

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा तैयार की गई, ’क्राइम इन इंडिया-2016’ रिपोर्ट को देशवासियों के समक्ष सार्वजनिक किया। सलाना जारी की जाने वाली यह रिपोर्ट, इस बार वर्ष 2016 में देशभर में हुई हत्या, अपहरण, दंगा, महिलाओं के प्रति अपराध, मानव तस्करी, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों पर अत्याचार तथा बच्चों पर अपराध, साइबर अपराध और गुमशुदगी के दर्ज मामलों की सांख्यिकी पर आधारित है। इस रिपोर्ट में पहली बार, एनसीआरबी ने 19 महानगरों का अध्ययन कर पृथक आंकड़े जारी किये हैं। गायब व्यक्तियों और बच्चों के आंकड़ों को भी रिपोर्ट में पहली बार स्थान दिया गया है।

आर्थिक मोर्चे पर जबरदस्त तरक्की करने के बावजूद, सामाजिक तौर पर भारतीयों में मानव मूल्यों के होते ह्रास की प्रतिबिंब एनसीआरबी की इस रिपोर्ट में दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट में भारतीय समाज का विद्रूप चेहरा भी नजर आया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 में आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता के तहत कुल 29, 75, 111 मामले दर्ज किए गये, जो 2015 की तुलना में लगभग एक प्रतिशत अधिक है। 2015 में दर्ज मामलों की संख्या 29, 49, 400 थी। वहीं, एसएलएल यानी विशेष एवं स्थानीय कानून के उल्लंघन से जुड़े मामले 2015 की तुलना में 2016 में 5.4 प्रतिशत तक बढ़ गए। हत्या, दंगा, लूट, बटमारी और अपहरण जैसे अपराधों की बात करें, तो केवल अपहरण की वारदात में 6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है, शेष अन्य घटनाओं में 2015 की तुलना में कमी दर्ज की गई हैं। लगातार तीसरे साल हत्या दर में भी कमी देखी गई है। 2015 की तुलना में 2016 में हत्या का दर 5 प्रतिशत तक कम हुआ है। पूरे देश में गत वर्ष इस तरह की 30, 450 वारदातें सामने आईं। आए दिन, दिनदहाड़े हत्या करने की खबरें भी सुर्खियां बटोरती रहती हैं। बढ़ते अपराध की घटनाएं कानून-प्रशासन को कटघरे में खड़ा करती हैं।

एनसीआरबी की रिपोर्ट ने बीते वर्ष महिला अपराध में हुई वृद्धि को भी उजागर किया है। आज एक तरफ, जहां महिलाओं की उपलब्धियों पर जय-जयकार हो रही है। वहीं, दूसरी तरफ कई तरीकों से उन्हें प्रताड़ित भी किया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2016 में महिलाओं के प्रति अपराधों में सामूहिक रूप से काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। महिलाओं के प्रति अपराध में पति या उसके संबंधियों द्वारा महिलाओं की प्रताड़ना, अपहरण, दुष्कर्म आदि प्रमुख घटक थे। 2016 में महिला अपराध के कुल 3, 38, 954 मामले दर्ज किए गए। गौरतलब है कि 2015 में यही आॅकड़ा 3, 29, 243 था। 2014 की तुलना में 2015 में देश में महिलाओं के प्रति अपराध में 3 प्रतिशत की कमी जरुर आई थी, लेकिन 2015 की तुलना में 2016 में कमी आने की बजाय 2.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार भी अक्सर दंभ भरते रहती हैं, लेकिन उपरोक्त आंकड़ें सरकारी दावों की पोल खोलने को काफी हैं।

महिलाओं पर बढ़ता अपराध, पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के प्रति पुरुषों की संकीर्ण मानसिकता को परिलक्षित करती हैं। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद, बीते वर्ष महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में किसी तरह की कमी नहीं देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक, गत वर्ष महिला अपराध के कुल मामलों में दुष्कर्म का हिस्सा 11.5 प्रतिशत रहा। हालांकि, दुखद यह है कि 2015 की तुलना में 2016 में देश में दुष्कर्म के मामले में 12.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। सवाल यह है कि देश की ‘आधी आबादी’ पर जुर्म का सिलसिला आखिर कब थमेगा?चिंता तो इस बात की भी है कि महिलाएं न तो घरों में सुरक्षित हैं और न ही बाहर। ऐसे में, महिलाओं की सुरक्षा के बिना देश को उन्नति के राह पर बरकरार रखना मुश्किल होगा। महिलाओं के प्रति अपराध का बढ़ता ग्राफ सभ्य समाज की निशानी भी नहीं कही जा सकतीं।

इससे इतर, अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों पर बढ़ते अत्याचार की घटनाओं ने भी राष्ट्रीय चिंताएं बढ़ा दी हैं। अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार और अपराध के मामलों में 2014 की तुलना में 2015 में 4.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी। लेकिन, स्थिति में सुधार की बजाय 2016 में ऐसे मामलों में उल्टे साढ़े पांच फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि उसी साल अनुसूचित जनजाति के लोगों से जुड़े अत्याचार व अपराध के मामले भी लगभग पांच प्रतिशत तक बढ़े। हालांकि, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध अत्याचार को रोकने के लिए अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम-2015 को 26 जनवरी, 2016 से ही देश में लागू किया जा चुका है। इसके बावजूद, सामाजिक व आर्थिक रुप से पिछड़े इस तबके को मुख्यधारा में लाने के प्रयास किये जाने के बजाय, उनपर अत्याचार तथा आपराधिक घटनाओं में वृद्धि हो रही हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश, राजस्थान और ओडिशा में क्रमशः अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोग देश में सबसे अधिक सताए जा रहे हैं। एससी और एसटी लोगों की सामाजिक सुरक्षा के लिए राज्य सरकार को तत्परता दिखानी चाहिए।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने अपने अध्ययन का दायरा बढ़ाते हुए, इस बार 19 महानगरों के आंकड़े भी जारी किये हैं। 20 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरों को महानगर के अंतर्गत रखा जाता है। हत्या तथा महिलाओं के प्रति दुष्कर्म तथा अन्य अपराधों के मामले में दिल्ली सबसे ऊपर है, जबकि साइबर अपराध के मामले मुंबई में सबसे अधिक दर्ज किए गए। वहीं, इस रिपोर्ट में एनसीआरबी ने पहली बार लोगों की गुमशुदगी के आंकड़ें भी जारी किये हैं। गत वर्ष लापता होने के कुल 5, 49, 008 मामले दर्ज किये गये। हालांकि, दिसंबर तक की अंतिम रिपोर्ट बताती है कि गायब लोगों में से सवा दो लाख लोगों को प्रशासन ने ढूंढने में सफलता प्राप्त कर ली थी। लेकिन, तीन लाख से अधिक लोग कहां गायब कर दिये गये, यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है।

बहरहाल, शांति तथा सुरक्षा किसी भी सभ्य समाज की पहचान के दो महत्वपूर्ण पैमाने हैं। भय तथा अपराध मुक्त समाज का निर्माण किये बिना देश को सर्वांगीण विकास के पथ पर ले जाना मुश्किल है। दरअसल, बीते कुछ वर्षों में, समाज में आर्थिक विषमता, गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता, अंधाधुंध पश्चिमीकरण और जागरुकता की कमी की वजह से आपराधिक घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिली है। हालांकि, बार्नेस और टीटर्स जैसे स्थापित समाजशास्त्री भी हिंसा तथा अपराध को समाज का शाश्वत हिस्सा मानते हैं, लेकिन बढ़ते अपराध की घटनाएं ना सिर्फ चिंता की विषय है, बल्कि ये भारतीयों में आपसी प्रेम, भाईचारे, सहयोग तथा मानवता की भावना में निरंतर होती गिरावट तथा बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति की ओर भी संकेत करती हैं। अगर हमारा समाज मौजूदा स्थिति से उबरने के लिए सार्थक प्रयास नहीं करता है, तो इससे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘रामराज्य’ तथा बाबा साहेब आम्बेडकर के ‘शोषण मुक्त’ समाज की कल्पना को साकार करना और भी मुश्किल जाएगा। विडंबना है कि पारस्परिक सहयोग में वृद्धि, प्रेरक वातावरण के निर्माण तथा अंतर्विरोधों के दमन की बजाय, हम एक ऐसा सामाजिक माहौल तैयार कर रहे हैं, जहां एक-दूसरे के प्रति द्वेष, ईर्ष्या और कटुता के भावों ने तमाम तरह की विसंगतियों को जन्म दिया है। हालांकि, भयमुक्त समाज का निर्माण का काम केवल कानून पर जोर देकर नहीं किया जा सकता। देश के हरेक नागरिक द्वारा, अपने हिस्से के संवैधानिक दायित्वों तथा नैतिक कर्तव्यों के समुचित निर्वहन से भय-मुक्त भारत तथा अपराध-मुक्त समाज की स्थापना संभव है।

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